<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855</id><updated>2012-01-22T01:40:33.251-08:00</updated><title type='text'>कथा -गाथा</title><subtitle type='html'>सदियों से कहानियां सुनाई जाती रही हैं , गाथाओं का तिलिस्म कभी ख़त्म नहीं होगा , खूबसूरत पलों को कागज पर चित्रित करने का काम लेखक करता है , तभी मनोरंजक कहानियां , किस्से , कथा हम पढ़ पाते हैं .

शब्द और भावार्थ के साथ न उलझते हुए , अत्यंत रोचक कहानियां कथा -गाथा में प्रस्तुत हैं .</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>48</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-6872445238308762605</id><published>2011-12-15T23:00:00.000-08:00</published><updated>2011-12-15T23:00:41.312-08:00</updated><title type='text'>माँ की चाबी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;उत्तरांचल की वादियों में इस मौसम की पहली बर्फ गिरी है , तब लग रहा है कि शीत लहर क्या होती है ,ठण्ड से शरीर कांप रहा है , कम्बल के रोंये अहसास करते हैं जैसे किसी चौपाये के वजूद को ओड लिया हो .लम्बे -लम्बे दरख्त जो हरे दिखाई देते थे , वे अब सफ़ेद हो रहे हैं , दूर पहाड़ियों पर बर्फ की चादर फैलती चली जा रही है ,ऐसा लगता है जैसे शीत की &amp;nbsp;जडिया रात के सन्नाटे में सरे देवी -देवता यहाँ अवश्य चहल कदमी करने आते होंगे . तभी तो हवाएं दीवानी होकर सनसनाती हैं , नदिया , झरने कपकपाते हुए से बहते रहते हैं , पानी इतना शीतल है कि स्पर्श&amp;nbsp; करने से ही विद्ध्युत आवेग तन -मन को झंकृत कर दे , इन पर्वतों की विशालता को मापना कम से कम मेरा तो काम नहीं रहा , कभी उस पर्वत पर कभी उस पहाड़ पर दिव्य आकृतियाँ सी उभरती दिखाई देतीं हैं , यहाँ की प्रकृति निष्प्राण नहीं है , मुझे तो कण -कण से प्रणव ध्वनी उच्चारित सी प्रतीत होती है .&lt;br /&gt;जब से इस घाटी के पर्यावरण विभाग में पर्यवेक्षक का पद संभाला है सरकारी आवास के पत्थर और खपरैल के बने कमरे में मेरी आत्मा घुटती सी लगती है , बार -बार जी चाहता है हिमालय पर्वत की वादियों में एक गुफा खोज लूं और अनुभव करूँ, कैसे हमारे ऋषि -मुनि घोर तपस्या कर परमतत्व को प्राप्त हुए , शायद तभी माँ ने मेरा नाम शिवानन्द रखा है , माँ ,से याद आया , माँ अगर साथ होती तो कितना अच्छा होता , खुले आकाश टेल लकड़ी जलाकर दाल -रोटी बनती और मैं , माँ को नित नै कहानियां सुनाता .&lt;br /&gt;मैं पीपल के विशाल वृक्ष के नीचे चबूतरे पर कम्बल में शरीर को लपेटे गुनगुनी धुप का आनंद अपने ईष्ट देव के साथ ले रहा था ,तभी एक पैर से लंगड़ाता हुआ कलुआ वहां आ धमका , अरे !! आनंद राम जी !! &amp;nbsp;पूरी धूप आप ही बटोर लोगे या मेरे लिए भी छोड़ोगे ? आजा कालू !! यार , तुम्हारा नाम कालू किसने रखा ? बड़ा अजीब है जबकि तुम काले भी नहीं हो , अरे !! क्या बताऊँ स्वामी जी !! बचपन से ही बाबा बनने का शौक था , छोटा था तब गरीबी के कारण कपडे कभी तन न ढँक सके , तब नागा ही बना फिरता था , जब बड़ा &amp;nbsp;हुआ तो दादा का अंगोछा और पत्ते वाला घुटन्ना बस यही वस्त्र मेरी लाज रखा करते थे , एक दिन दोस्तों के साथ बम्बा नहाने चला गया , देर तक पानी में मस्ती चलती रही , कभी खेत से गाजर ,टमाटर बैगन , मटर तोड़ी और खाली जब कपडे पहनने की याद आई तब पता चला हमारे गाँव&amp;nbsp; का पहलवान , बजरंगवली का परम भक्त कैलाशी !! सबके कपडे उठा ले गया , अब क्या करते ? शाम होने का इंतजार किया और खेत पर जल रहे अलाव से सबने अपने शरीर पर राख लगा ली और घर की तरफ दौड़ लगा दी , माँ , दरवाजे पर खडी मिली ,डर गई जब तक उसे विश्वास नहीं हुआ कि मैं बाबा नहीं बना हूँ ,पूरी कहानी सुनकर मुझे कालूराम कहकर चिढाने लगी , तब से मेरा नाम कालू &amp;nbsp;ही पद गया , माँ , का दिया यही आशीर्वाद मेरे साथ आज भी है , उसके मरने के बाद मैं , इधर भाग निकला , अब देखो , पैर मेरा साथ नहीं दे रहा .&lt;br /&gt;कोई बात नहीं कालू !! दो एक दिन लगेगा ठीक हो जायेगा , मोच ही तो आई है , जरा घासीराम को आने दे खिंचवा दूंगा , साब !! आज आप ऑफिस नहीं गए ? यहाँ , पीपल के नीचे क्यों कम्बल के साथ धूनी जमाई है ? क्या बताऊँ ?कल से माँ , की याद आ रही है , माँ के साथ ही पुराणी यादों में खोया था , मुझे भी बताओ न , माँ की बात , रुको जी , जरा चाय का इंतजाम कर लूं , अरे !! ओ , चीमा !! जरा दो चाय अदरक वाली बना ला , साब की चा- जरा कड़क समझे !! जी , अब , बोलो जी , आप का कम तो पहाड़ , पर्वत , नदी ,झरने , घास -फूंस को निहारने का है , कहाँ सूखा पड़ा है ,कहाँ बर्फ पड़ रहा है , हवा का रुख क्या है ? देखो कालू !! तुम मेरी नौकरी का उपहास मत बनाओ , नहीं जी !! पर्यावरण ही जीवन है , प्रकृति है तो हम हैं , ईश्वर है , साधू -संत हैं और ---बस अब , चुप तभी चीमा , चाय लेकर आ गया साब !! ये आपकी चा -- और ये आपकी चा ---अरे !! चीमा , आधा क्यों बोलता है ? हा कहाँ गया ? चीमा वहां से भाग निकला .&lt;br /&gt;चाय की चुस्की के साथ शिवानन्द शुरू होते हैं , माँ , मेरे जीवन में चाय की प्याली सी शुरू होकर रात के एक गिलास दूध के बीच झूलती कर्मठ , भरपूर जीवन जीने वाली , साहसी और दैवीय महिला हैं , मुझे याद है , जब छोटा&amp;nbsp; था, हर जरूरत माँ के साये के पीछे दौड़ते -दौड़ते पूरी हो जाती थी , पिता का काम घर चलाना था , माँ का काम पूर्ण किफ़ायत के साथ घर चलाना ,सादगी , मरियादा और संस्कारों के बीच पिसती माँ ही हमारी तिजोरी थी , माँ , ही रसोई थी , माँ ही सजायाफ्ता कैदी को छुड़ाने के लिए वकील थी क्या नहीं थी माँ ,&lt;br /&gt;माँ , के पास वर्षों पुराना एक बक्सा था जिसमें टला लगाकर रखती थी , मैं , जनता था उसमें क्या है , कुछ जरूरी कागज , सोने चांदी के थोड़े से जेवर , पुराना एक फोटो , बस यही तो खजाना था उनका , मेरे एक परम मित्र सपत्नीक आ पधारे , हम सब लोग उपहास ही कर रहे थे कि अचानक फोटो की याद आ गई , बक्से की चाबी मांगने का खेल शुरू हो गया , भाभी भी मेरा साथ देने लगीं , तरह -तरह के प्रलोभन माँ को दिए जाते रहे और चाबी पाने का प्रयास हम लोग करते रहे पर मजाल है माँ , ने चाबी होने की बात भी स्वीकार की हो .&lt;br /&gt;भाभी , उनके छोटे ,दुबले शरीर पर आधुनिक लिवास देखकर मुस्करा रहीं थीं , एकटक उनके चेहरे को देख रहीं थीं , वे कभी सूजी हुईं आँखों को खुजलाने का प्रयास करती तो हंसाने पर और बंद हो जाती , माँ उस दिन&amp;nbsp; गुडिया सी दिख रहीं थीं , जब वे चाबी न देने के लिए बहाना बनातीं तो मधुर मुस्कान बिखेरता उनका चेहरा चाँद सा खिल जाता , कभी कहतीं अरे !! क्यों मेरे पीछे पड़े हो ? बक्से मैं कुछ भी नहीं है , जब भाभी फिर उन्हें कुरेदती तब बोलतीं लाली !! उसमें &amp;nbsp;कागज हैं बस , तो फिर माते !!&amp;nbsp;&lt;span&gt;&amp;nbsp;उसमें ताला क्यों लगा है ? हंसते हुए कहतीं ,चांदी के सिक्के भी हैं , ऐसा लगता मनो बगिया मैं हजारों फूल खिल गए हों , हम लोग देर तक माँ को चाबी के लिए परेशान करते रहे जबकि माँ , उस समय अथाह पीड़ा से गुजर रहीं थीं , उनके हाथ की सर्जरी हुई थी , दो अंगुलियाँ उनके शरीर से अलग कर दी गईं थीं , उस बेबसी की पीड़ा तो केवल माँ ही समझ सकतीं थीं .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;सर्जरी के हफ्ते भर बाद जब अपने ब्लाउज का बटन स्वयं नहीं लगा पाई तब उन्हें लगा कि अब मैं , परासत्तु हो गईं हूँ , मेरा कलेजा मुंह को आ गया अरे !! माँ आप ऐसी बात क्यों करती हो ? सुगड सलोनी बहु है , दो पोते हैं , बाबा हैं और मैं भी तो हूँ !! तुम्हारे लिए तो माँ , मैं खुदा से भी झगडा मोल ले सकता हूँ , क्या बात करती हो ? हम सब हंस रहे थे , शायद, वो हम सबके जीवन के हसीं पल थे , सब चुहलवाजी कर रहे थे पर मैं माँ , को आश्वस्त कर &amp;nbsp;देना चाहता था कि मैं , हूँ तुम्हारे साथ , अंततः माँ भी हठी&amp;nbsp; निकलीं चाबी का राज रहस्य बन गया .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कालिया !! अपनी आँखों की पोरों के छोर से आंसुओं को पौंछ रहा था , मैं , कम्बल तह करके प्रकृति के आगोश में मन सिंचित करने निकल पड़ा , शायद , उस चाबी की थाह पाने , जिसे खोजने हजारों सैलानी देवालयों , पहाड़ों , पर्वतों &amp;nbsp;गुफाओं में खिंचे चले आते हैं , माँ , की चाबी का राज इस चाबी बहुत कुछ मिलता है , विश्वास करता हूँ अब , यहाँ तक आया हूँ तो चाबी पाकर ही रहूँगा .&lt;br /&gt;रेनू विमल - ११-१२-0011&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-6872445238308762605?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/6872445238308762605/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=6872445238308762605' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/6872445238308762605'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/6872445238308762605'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='माँ की चाबी'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-6492914034608221916</id><published>2010-07-24T03:40:00.000-07:00</published><updated>2010-07-24T03:40:38.127-07:00</updated><title type='text'>बदी का खेल</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;पूर्वजों से सुना था , किस्मत का खेल अजब है , उस शक्ति के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता | कभी तो लगता था , हाँ , सच तो है , कभी पत्ता हिलता है ,कभी नहीं, फिर लगता है नहीं , यह तो हवाओं खेल है , हवा चलेगी तब,पत्ता&amp;nbsp; हिलेगा न , फिर, समझ नहीं&amp;nbsp; आया कि कर्म का फंडा क्या है ? कर्म किये जा फल की इच्छा मत कर , लेकिन इन्सान जो भी कर्म करता है उसका तो कोई न कोई फल&amp;nbsp; होता है |हम भोजन भी करते हैं ,तो जीवित रहने के लिए |हमारे जीवन में किये गए कार्य निष्फल नहीं हैं | बाद में समझ आया , यहाँ कर्म का अर्थ योग कर्म या ध्यान से है | योग को निष्ठां पूर्वक करता चल , यहाँ फल की कामना मत कर | योग करते हुए भी अन्यथा कर्म फिर&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;भी करने पड़ेंगे | इस युग में जीवित रहने के लिए न जाने कितने कर्म करने पड़ते हैं , कितने छल , प्रपंच , माया का जाल बुनना पड़ता है शायद योग कुछ पाप कम करदे | यही सब उधेड़ -बुन सुगनी के मन में भी चलती&amp;nbsp; रहती&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;&amp;nbsp;है |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;सुगनी &amp;nbsp;बदी के खेल में कुछ उलझी सी हुई है , कुछ बरस पहले तक सोचती थी , हमारा कर्म ही भाग्य बनाता-बिगाड़ता है | सब हम ही तैयार करते हैं , कैसे जीवन जीना है , लेकिन एक दिन सुगनी घर के आगे छप्पर के&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;नीचे खटिया की अदवाइन कस रही थी कि भीखू दौड़ता हुआ आया बोला - जिज्जी !! बदके भैया की टक्कर हुई है &amp;nbsp;,काहे से ? सायकिल और सड़क से , अरे !! का तेरी मत मारी गई है , सड़क से कैसे ही गई ?जिज्जी !! भैया , सायकिल से स्कूल जा रहे थे , चौराहे पर तांगा आया ससुरे ने घोडा हांक दिया , अब सायकिल तांगे से टकरा गई और भैया सडक पर घिसट गए| का चोट -फैंट लगी है ? नहीं जिज्जी !! हम सबने तांगेवाले को धुनाई मचा दी उसे जायदा चोट आई है , भैया तो ठीक है | कहाँ है ? वो छापरिया में |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;सुगनी &amp;nbsp; &amp;nbsp;दौड़ती हुई गई गौरव को देखा , ठीक लगा तो बोली - देखकर चलना चाहिए , कहाँ ध्यान था तुम्हारा ? अरे !! माँ , मैं तो ठीक चल रहा था , वो तो घोडा ही बिदक गया था , तो फिर उस तांगेवाले को &amp;nbsp;क्यूँ मारा ? माँ , मैं तो घबरा गया था , इन सब लोगों ने मारा , मैं तो उसे बचा रहा था | अरे ! जस्सो !! जाओ , गोवू के लिए दूध में हल्दी डालकर ला दे और वापस सगुनी खटिया के पास आ गई |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;सगुनी का मन परेशान था , अभी तो सब ठीक था फिर तांगा कहाँ से भिड गया? बेचारा पिट भी गया | ईश्वर की लीला जाने क्या है ? हर घटना के साथ एक रहस्य छुपा रहता है और सुगनी की समझ से परे चला जाता है | सुगनी , ईश्वर के सामने हठ जोड़कर प्रार्थना कर लेती है , भगवान !! सबको सद्बुद्धि देना और अपने काम में लग जाती है |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;वीर &amp;nbsp;प्रताप शाम को घर लौटते तो साथ में दोस्तों का झुण्ड होता , कोई भंग पीसता , कोई ठंडाई घोंटता , वीर की थाली में दाल के ऊपर ढेर सारा घी पड़ा रहता , गरम रोटी खाकर , आँगन में बिछी चारपाई पर पसर जाता , सुबह चार बजे जब चिड़िया कुनमुनाने लगती तब दिन भर के कर्म शुरू हो जाते |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;वीर साब को कभी समय मिलता तो सगुनी से माथा -पच्ची भी कर लेते , लगी रह अपने भगवान के साथ , देखता हूँ कौन , माई का लाल तेरे बुरे बखत में साथ देगा ? तू बुलाएगी और ये नहीं सुनेगा , अरे !! सब झंझट छोड़ , मस्त रह , ला , बढ़िया चाय पिला और सगुनी के मन में हलचल मचाकर चले जाते |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;कई बार सगुनी सोचती है , हाँ , सच तो है , उस दिन ईश्वर से गुहार लगा रही थी , गोनू की नौकरी लगा दो , बेचारा !! सुबह से कॉलेज में पड़ा है , दस कोस दूर है ऊपर से खाना भी नहीं खाया | रात को ग्यारह बजे फोन आया था माँ !! कंपनी वाले एक महीने बाद बताएँगे कब आना है , अभी मामा के पास आ गया हूँ | पूरे दो महीने तक पूजा करती रही कोई खबर आज तक नहीं आई | सगुनी का विश्वास हर पल बदलता रहता है , फिर सोचती है सब , भाग्य का लेखा -जोखा है , जो किया होगा ,वो तो , झेलना ही पड़ेगा | जाने कबसे यही तो सुनती आ रही है , भाग्य से अघिक न किसी को मिला है न मिल सकता है |फिर क्यों दुनिया भागम भाग लगी रहती है ? उसे समझ नहीं आता |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;इस बार जब , बरसात शुरू हुई तब , एक महात्मा &amp;nbsp;गाँव के मंदिर पर आकार रुक गए हैं , भीखू बता रहा था | चार महीने तक यहीं रहेंगे , जिज्जी !! गाँव वाले जो देंगे वही खा लेंगे , शाम को प्रवचन भी करेंगे | जिज्जी !! मंदिर आ जाना , क्या पता तुम्हारी समस्या भी सुलझ जाये |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;सुगनी ने सुना था , जीवन में गुरु का स्थान भी होता है , जिसका गुरु नहीं , उसका जीवन बेकार होता है | स्कूल में मास्टर को ही गुरु जी कहती थी , लेकिन उन्होंने अक्षर ज्ञान के अलावा कुछ नहीं बताया , दसवीं पास करने पर भी सगुनी को घर के काम से सर मरना पड़ता है , क्या फायदा हुआ ? मर्द लोग तो कुछ सुनते ही नहीं , सरकार ने कौन सी नौकरी देदी ? हाँ , बस एक फायदा हुआ है , गौरव , शहर से किताबें लाकर देता है उन्हें बड़े चाव से पढ़ती हूँ , अब देखो महात्मा जाने क्या बताये ?&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;टीकाटीक दुपहरी में गाँव वाले शाम का सामान मंदिर पर एकत्र कर रहे हैं , कोई दरीलाया है , कोई प्रसाद लाया है , कोई फल लाया है , आज मंदिर पर रौनक छा गई है | वीर प्रताप ने ही मंदिर पर एक बड़ा बरांडा बनवा दिया है , भीखू भी मंदिर में रम गया है , सगुनी पांच बजे मंदिर जा पहुंची , महात्मा दीवान पर पालथी मारे विराजमान है , गाँव वाले नीचे बैठे हैं , देवी -देवताओं के जयकारों के साथ ही महात्मा जी के बोल फूट पड़े - बोलो गुरु महाराज की जय !! बिना गुरु के जीवन व्यर्थ है , ईश्वर अंतर्यामी है , कर्मों का फल तो भोगना ही पड़ता है , माया आनी -जानी है , व्यक्ति का जन्म निश्चित है तो मृत्यु भी निश्चित है | इन्सान को सदैव सच बोलना चाहिए , दुनिया भर के नियम कानून ,जो हमारे पूर्वज सुनते आ रहे हैं वही सब उन्होंने बता दिया , शाम को भोजन का समय हुआ और औरतें जाने लगीं , महात्मा जी थोड़े बिचलित हो गए , दूसरे दिन दो बजे के बाद आने का कह कर , प्रवचन समाप्त कर दिए |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;सगुनी सोचने लगी गुरु तो घर बैठे ही आ गए हैं , क्यों न दीक्षा ले ली जाय ? कुछ तो ज्ञान जाग्रत होगा&amp;nbsp; , पता चले आखिर ज्ञान क्या है ? यूँ ही मर गए तो , अफ़सोस होगा गुरु नहीं बनाया इसलिए नरक जाना पड़ा |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;दूसरे दिन सगुनी भी इक्यावन रूपये लेकर गई और महात्मा को गुरु बना लिया | महात्मा ने गुरु मन्त्र दिया " ॐ नम : शिवाय " चार महीने तक गाँव भर में उत्सव मनाया जाता रहा | लेकिन ज्ञान तो वहीँ का वहीँ था , भाग्य का लिखा तो गुरु भी नहीं मिटा सकता था |अचानक वीर प्रताप को बुखार हुआ और उलटी लग गईं , गाँव के वैद्ध को दिखा दिया , कोई आराम नहीं हुआ , सगुनी भागती हुई महात्मा के पास गई , गुरु जी !! मेरी एक अरज सुन लो , मेरे मर्द को बुखार आ गया है , हालत ख़राब हो रही है , कुछ कृपा करो , ईश्वर को बुलाओ , अरे !! पगली !! ईश्वर तो तेरा भी है , तू ही पुकार तभी सुनेगा , में भी , कोशिश करूँगा , अनहोनी को कोई नहीं रोक सकता , सगुनी भोचक रह गई , अरे !! कैसा गुरु है ? सहारा देने के बजाय भाग्य के भरोसे छोड़ता है , सगुनी घर लौटी , तब तक वीर को शहर ले गए और अस्पताल में भर्ती किया जा चूका था | भीखू बता रहा था जिज्जी !! चिंता न करो , डाक्टर ने बोतल चढ़ा दी है | सब ठीक होगा |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;सगुनी , फिर असमंजस में थी , ज्ञान के लिए अपने भीतर देखे या महात्माओं के प्रवचन सुने या उनके दरवार के चक्कर लगाये , क्या करे समझ नहीं आ रहा ? सुना है ध्यान लगाने से अपने भीतर ही भगवान मिलता है , तब उसे ही देखती हूँ शायद , यही बदी का खेल है ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;रेनू शर्मा ....&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-6492914034608221916?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/6492914034608221916/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=6492914034608221916' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/6492914034608221916'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/6492914034608221916'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='बदी का खेल'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-8154970499616212135</id><published>2010-06-21T21:11:00.000-07:00</published><updated>2010-06-26T04:06:05.632-07:00</updated><title type='text'>फादर्स डे , का तोहफा ...</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: small;"&gt;कहा जाता है कि मानव ही सभी प्राणियों में अधिक संवेदनशील होता है , पशु , पक्षी , जीव ,जंतु भी संवेदनाओं को प्रेषित करने में पीछे नहीं रहते हैं , हम मानवीय संवेदनाओं की गिरावट पर बात कर रहे हैं , माता -पिता का जीवन में स्थान ,मंदिर में विराजे देवता से कम भी नहीं है , उन्हें हम दिन रात , हर पल पूजते हैं ,तो माता पिता को भी सम्मान देते हैं , शायद यही वजह है ,हम सब लोग फादर्स डे बड़ी धूम -धाम से मनाने लगे हैं , भारतीय संस्कृति में हजारों ऐसे उदाहरण हैं जब , बेटे ने ,या बेटी ने अपना सर्वस्व निछावर कर दिया , संयुक्त परिवार की यही परम्परा हम भारतीय लोगों को संसार में ऊँचा उठती है ,&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;कुछ ऐसी भी स्तिथि होती हैं जब , माता -पिता दर -दर की ठोकर खाने को मजबूर हो जाते हैं , अपने ही बच्चों के कारण , यही बिडम्बना है .&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;बूढी हड्डियों में ठिठुरन पैदा करने वाली , रात के सन्नाटे को चीरती हुई किसी की दर्द भरी आवाज से सेवा -धाम का परिसर मानो सिसकने लगा था , बाहर जाकर देखा ,तो एक वृद्ध पुरुष ,जो देखने से भले घर से लग रहे थे , अकेले खड़े डबडबाई आँखों से हम सबको देख रहे थे , शायद सोच रहे होंगे कि ये लोग जाने कैसे होंगे ? तभी , शारदा ,जो उस आश्रम की संचालिका थीं , मुझे भीतर ले गईं , उस दिन दरवाजे से भीतर आया तो बारह बरस तक , वहीँ जमा रहा ,&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;दिन -रात , सुबह -फिर -शाम यूँ ही निकलती गईं , धीरे -धीरे किसी का इंतजार करना भी बंद हो गया , आता भी कौन ? एक बेटा बहु थे , बेटी पराई हो गई ,सब लोग किनारे हो लिए , शायद मुझे आश्रम छोड़कर उन्हें सकून मिला होगा , एक दिन , सुबह से ही कुछ हुड़क छूट रही थी , आंसुओं का सैलाव सा बह रहा था , अचानक शारदा जी , आ गईं , पूछ ही लिया , दादा जी !! आज क्या बात है , बड़े सेंटी हो रहे हो , मेरी कांपती हथेली को अपने हाथों में थाम लिया और मेरे पास बैठकर , मेरे चहरे पर अपनी आँखें मानो चिपका दीं ,मैं , भीतर ही भीतर रिस सा रहा था , फूट सा गया , पहले तो , जी भरकर ,रोया क्योंकि इससे पहले कभी रोया नहीं , वे भी मुझे खुलने का मौका दे रहीं थीं .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;जिन्दगी की परते खोलने का आखिरी दांव हाथ लगा था , तो सब कुछ कह गया , शारदा जी !! हम जब ,शादी के बाद भोपाल आये , बस घर ही चला पाते थे , बेटा , हमारे जीवन में आया तो , पत्नी भी नौकरी करने लगीं , सब कुछ ठीक हो गया , जब मैं , घर पर होता तो , तो माता -पिता बन जाता , कभी खेलता , घोडा बनता , खाना खिलाता ,कभी बाहर ले जाता , कुछ समय बाद बेटी भी आ गई , अब , पत्नी ने काम छोड़ दिया , बच्चे जो देखने थे , बच्चे ही हमारी दुनिया बन गए थे .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;सब कुछ ठीक चल रहा था , बच्चे बड़े हो गए , बेटा सरकारी नौकर हो गया , बेटी का विवाह कर दिया , पत्नी का स्वास्थ ख़राब हो गया , हमारी जमा पूँजी ख़तम ही हो गई , सोचा बेटे के साथ जीवन काट लूँगा , बेटे का विवाह भी हो गया , मेरा आत्म बल और शारीरिक बल टूट रहे थे , पार्टियों की शौक़ीन बहु को मैं खटकने लगा था क्योंकि एक वृद्ध घर मैं हो तो , आजादी नहीं भोगी जा सकती , कहाँ जाता ? यूँ ही तो , कहीं जा नहीं सकता था , कई बार हमारी बात चीत हुई , लेकिन कोई समाधान नहीं निकला , तभी पता चला बेटे का तबादला हो गया है , मैं , खुश था कि चलो अब , सब ठीक हो जायेगा , नई जगह होगी ईश्वर सब ठीक कर देंगे ,लेकिन सब ठीक नहीं हुआ .जब सामान लेकर जाने लगे ,तब आपके दरवाजे पर लाकर खड़ा कर दिया और चले गए .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;मुझे पता था , शारदा जी !! बहुत दुखी हुईं थीं , रात भर मैं , सो नहीं सका , उन्होंने मेरे बेटे का पता उसके ऑफिस से लगवा लिया और उसे बताया कि पिता आपसे मिलना चाहते&amp;nbsp; हैं , जाने किस सुनहरे पल की उसे याद आई होगी , बेटा , बात करने को राजी हो गया और दो दिन बाद आने का वायदा भी कर दिया , मैं , दिन भर ऐसे अपने काम निबटा रहा था ,मानो मुझे पंख लग गए हों , खाना भी नहीं खाया ,सोच रहा था , आज तो बेटे के साथ ही खाना खाऊंगा , बहुत खुश था ,चाहे मुझे बारह बरस यहाँ बीत गए हों , धीरे -धीरे शाम से रात होने को आ गई ,पर बेटा नहीं आया , ९ बजे उसका फोन आया , मैं नहीं आ सकता , अगर पिता जी हमारे साथ आयेंगे तो पत्नी आत्महत्या कर लेगी , क्या करूँ ? अब ,पिता जी के लिए अपना घर तो नहीं तोड़ सकता ,&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;जब , मुझे पता चला तब , मेरे भीतर कुछ टूटने की आवाज आई थी , दिल बैठ सा गया था , सोचा था बेटे के हाथों अंतिम संस्कार होगा तो ,शायद मुक्त हो जाऊंगा ,लेकिन सब बिखर गया , फादर्स दे पर मेरे बेटे का दिया तोहफा मुझे लूट ले गया , मैं , एकदम से शांत हो गया और बिस्तर पर लेट गया , ईश्वर का शुक्रिया अदा किया , आँख बंदकर पत्नी को याद किया और साँस की डोर जाने कहाँ चली गई पता नहीं , मेरा शरीर सेवा धाम के बरांडे मैं पड़ा था , मैं, आजाद होकर बहुत ही खुश था , पहली बार लगा मुक्ति यही है .&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;रेनू शर्मा .... &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-8154970499616212135?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/8154970499616212135/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=8154970499616212135' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/8154970499616212135'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/8154970499616212135'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='फादर्स डे , का तोहफा ...'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-5918008660862931135</id><published>2010-01-11T09:42:00.000-08:00</published><updated>2010-01-11T09:42:16.343-08:00</updated><title type='text'>लुच्चा !!</title><content type='html'>औरत के वजूद को ढोते हुए सीतमा , रोज ही एक ही साड़ी मैं दीख पड़ती है . साड़ी का किनारा थोडा चौड़ा है , मैरून रंग और हरे रंग की साड़ी पर नीला पल्ला है . कई बार बता चुकी है बाई साब !! दो जोड़ा साड़ी खरीदी थी , मनकू !! कह रहा था अस्सी रुपये जोड़ा मिल गई है , मनकू उसका पति है . एक जोड़ा का रंग भी तो एक जैसा होता है जैसे उसके पति और उस सीतमा का रंग ताम्बई एक जैसा ही है . सीतमा पर सब फबता है .&lt;br /&gt;पति के साथ सुबह होते ही निकल पड़ती है काम पर , कभी गिट्टी तोड़ने का काम कराती है , कभी मसाला उठाने का काम , कभी ईंट उठाने का काम कराती है . सीतमा को सबसे अच्छा काम गिट्टी तोड़ना ही लगता है एक जगह बैठी रहती है , विचारों का जाल उसके चारो और एक रक्षा कवच सा बना लेता&amp;nbsp;&amp;nbsp;है , तभी तो कभी हंसती है , कभी खीन्जती है और कभी मुस्करा भर देती है . &lt;br /&gt;जब कोई सनकी मजदूरों का सरदार उसके सामने आकर खड़ा होता है और उसकी घुटनों तक खुली टांगों को घूरता हुआ , उसके बटन खुले पोलके पर नज़र गड़ता है , तब हथोडा हाथ मैं उठाकर जोर से पत्थर पर दे मारती है और गिट्टी सीधे उसके ललाट पर जा टकराती है , भडुए !! मैं ही मिली हूँ सुबह सुबह घूरने के लिए , हरामी !! कहीं के , जा चल , काम कर अपना . सीतमा !! अपना हाथ गिट्टी पर चलाती रहती है , वैसे सीतमा से सब घबराते हैं , एक बार शहर से एक ठेकेदार शर्मा आया था , कह रहा था , मेहनती मजदूरों को शहर लेकर जायेगा , जादा पैसे देगा , रहने को झुग्गी भी देगा . सीतमा के आगे पीछे घूम रहा था , मनकू उस समय दूसरे ठेके पर काम पर था , मुरलिया दौड़ कर गया और मनकू को खबर कर दी , नया साब आया है सीतमा से भिड़ने का जुगत लगा रहा है . मनकू हंस दिया , ससुरे !! का काल आवा होई , तसला हाथ मैं लेकर चल दिया , सीतमा हाथ मैं फावड़ा लिए कड़ी है देखो साब !! मुझे शहर नहीं जाना और न तुम्हार कोई मेहरवानी चाही , अब , तनिक काम देखो और काम करने दो , शर्मा वहां से चल दिया , अरे !! मनकू !! देखो तो सीतमा शहर जाने से मन कर रही है अब , तुम्हीं समझाओ , तो का करें साब !! हमर काम तो यहीं चल रहा है , ठेकेदार से बात करो साब . &lt;br /&gt;एक टांग पर पूरे&amp;nbsp;&amp;nbsp;शरीर का भार उठाता हुआ चौहान भी आ धमका अरे !! साब , सीतमा हमर पक्की लेबर है , आप हाट मैं जाकर देखो , शर्मा चला गया . बाई साब !! जब से काम किया है मनकू से कह दिया है , तू !! मेरे काम मैं टांग नहीं अड़ाएगा , नहीं तो तू काम कर मैं घर देखती , मनकू जनता है कि सीतमा अपने मान सम्मान से कोई समझोता नहीं कर सकती . &lt;br /&gt;अभी कुछ महीने पहले मनकू काम से लौटा तो , उसका मुंह पीला पद रहा था , मुरलिया ने बताया कि पेट दर्द हो रहा है , दो दिन से इसने खाना भी नहीं खाया है , बाई साब !! मनकू को लेकर&amp;nbsp; गाँव के वैद्ध के पास गई , गोली और चूरन फँकने को दिया था जब , कोई फायदा नहीं हुआ तब , ठेकेदार से पैसा लेने गई , दो सौ रूपया हाथ पर रख कर एक हफ्ता इन्तजार करने को कहा , बुरे बखत का मान कर माँ के पास गाँव गई , वहां भी निराशा हाथ लगी , इससे अच्छा तो उस शर्मा के साथ शहर चली गई होती तो अच्छा था . भाई ने दो सौ रूपया दिया था , माँ से फिर कभी नहीं मिलूंगी सोचकर वापस आ गई . मुरलिया को लेकर मनकू को शहर दिखाने उस चौहान की गाड़ी मैं हम आ गए . &lt;br /&gt;बाई साब !! यहाँ तो सब उलट -पलट था , भगवान के मंदिर सा साफ था , लम्बी कतार लगी थी लोगों की , बड़ी मुश्किल से डॉक्टर के पास जाना हुआ , मनकू का पेट दबा&amp;nbsp;&amp;nbsp;कर देख रहे थे , कभी आँख खोलकर देखते , कभी जीभ देखते , मैं तो घबरा गई थी , तभी डॉक्टर बोला - क्या खाया था ? अभी तो जाने अंगारु न खाए , डॉक्टर ने मनकू से पूछा - क्या बोली तेरी औरत ? कुछ नहीं साब !! कह रही है कुछ नहीं खाया , अरे !! मोहन !! देखो इन लोगों को दवा समझा दो , हम लोग मोहन के पीछे बाहर आ गए . &lt;br /&gt;हफ्ते&amp;nbsp;भर की दवा&amp;nbsp; हमारे हाथ पर रख कर बोला जाओ , सीतमा ने रुपये निकले और देने लगी तो बोला - तुम्हारे दाम आ गए हैं , कौन दे गया साब !! हम तो यहाँ किसी को नहीं जानते , अरे वो ठेकेदार दे गया था . बाई साब !! मेरी आँखें भर आईं , मनकू को लेकर हम गाँव आ गए , सोच रही थी ठेकेदार मिलेगा तो पाँव पड़ जाउंगी, उसने बड़ा&amp;nbsp;साथ दिया है , तभी मुरलिया चीखता हुआ आया , सीतमा गजब हो गया , अपना साब , ख़तम&amp;nbsp;हो गया , हम सब सुनना&amp;nbsp;हो गया , अरे !! भाई उसका टक्कर&amp;nbsp;हो गई ट्रक&amp;nbsp;से , हम लोग काम छोड़कर&amp;nbsp;भागे , रास्ता&amp;nbsp;जाम कर दिया या&amp;nbsp;तो&amp;nbsp;ड्राईवर&amp;nbsp;हमें&amp;nbsp;देदो&amp;nbsp;,या दस लाख&amp;nbsp;रूपया उसकी घरवाली को दो , दस घंटे तक हम लोग सड़क पर पड़े&amp;nbsp;रहे , हमारा&amp;nbsp;तो सब कुछ &amp;nbsp;चला गया , सरकार माँ गई . जब ठेकेदार को देखती तो , खून आँखों मैं उतर आता था , निपूता !!&amp;nbsp;देखता भी ,तो ऐसा&amp;nbsp;ही था , झरझर&amp;nbsp;गलियां बक&amp;nbsp;देती थी , हँसता&amp;nbsp;हुआ चला जाता था , ठिठोली&amp;nbsp;तो ऐसे करता&amp;nbsp;था मानो , घर मैं लुगाई ही न हो . बाई साब !! जो काम मेरी माँ न किया वो ,उस लुच्चे&amp;nbsp;ने किया . मैं दुआ&amp;nbsp;करती हूँ उसका परिवार&amp;nbsp;सुख&amp;nbsp;से रहे .&lt;br /&gt;एक दिन चौहान की लुगाई से मिलाने&amp;nbsp;हम गए थे , पूंछ&amp;nbsp;रही थी सीतमा कौन है&amp;nbsp;? मैं तो चौंक&amp;nbsp;गई , एक दिन पहले साब ने कहा था - सीतमा का आदमी बीमार&amp;nbsp;है , उसे&amp;nbsp;हजार&amp;nbsp;रूपया देना&amp;nbsp;है , मैं उस देवी&amp;nbsp;के पैर&amp;nbsp;पड़ गई . तब का दिन है कि आज का दिन उसी&amp;nbsp;चौहान के घर की होके&amp;nbsp;रह गई , पूरा&amp;nbsp;काम करती हूँ , उसकी औरत बड़ी नीकी&amp;nbsp;है , उसे कभी नहीं बताया कि उसे कितनी गलियां दिया करती थी &amp;nbsp;. इस जनम मैं तो , उस ठेकेदार का कर्ज नहीं चूका सकती , लुच्चा हमेशा के लिए बाँध कर चला गया . &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/S0ti2sOR0lI/AAAAAAAAArg/qw7W9VG1vVw/s1600-h/DSC05715.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" ps="true" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/S0ti2sOR0lI/AAAAAAAAArg/qw7W9VG1vVw/s320/DSC05715.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;रेनू .....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-5918008660862931135?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/5918008660862931135/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=5918008660862931135' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/5918008660862931135'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/5918008660862931135'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='लुच्चा !!'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/S0ti2sOR0lI/AAAAAAAAArg/qw7W9VG1vVw/s72-c/DSC05715.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-398779217786142646</id><published>2009-08-19T22:34:00.000-07:00</published><updated>2009-08-20T00:21:10.532-07:00</updated><title type='text'>कुटिनी</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/Soz2aYtUM1I/AAAAAAAAAo4/C7RSA1Sfblc/s1600-h/DSC04317.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5371939388715709266" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/Soz2aYtUM1I/AAAAAAAAAo4/C7RSA1Sfblc/s200/DSC04317.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;बारह बरस की कुटिनी जल्दी -जल्दी रसोई का काम समेट रही है , &lt;span class=""&gt;माँ &lt;/span&gt;ने ताकीद कर दी है , पढ़ाई के साथ खाना बनाना भी आना चाहिए । लड़कियों को कच्ची उम्र &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;ही काम पर न लगाओ तो &lt;span class=""&gt;ढीट &lt;/span&gt;हो जाती हैं , &lt;span class=""&gt;मां &lt;/span&gt;ऐसा मानती है । दो किलोमीटर दूर स्कूल है , सुबह होते ही बस्ता उठाया और वहां दौड़ पड़ती है , लेकिन जाने से पहले बाबा को चाय बनाकर देती है , दाल बनाने रख देती है । मां , अब बीमार रहने लगी है , उसके घुटने दर्द करते हैं । नहा धोकर बैठ जाती है , बताती है कुटिनी काम जल्दी से कैसे ख़तम करे । वैसे उसका नाम स्कूल में श्यामा देवी है , लेकिन दादी कहती है - घर में जब तक कुटिनी रहती है , पीटने के काम करती रहती है , इसलिए इसका नाम कुटिनी ही ठीक है । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;कुटिनी को अपने नाम से कोई फर्क नही पड़ता । कोई क्यों कहता है ? बल्कि वो ध्यान देती है उसका नाम कौन कितने प्यार से ले रहा है । बाबा तो , जब काम होता है तब बुलाते हैं । मां , को जब घर -ग्रहस्थी समझनी हो तब बुलाती है या कुछ गरमा -गरम बनाना हो , तब बुलाकर बताती है कैसे बनाना है । छोटी बहन गोला !! है , उसे तो कुटिनी का आशय ही नही पता , एक भाई है चौदह बरस का , कभी -कभी चिढाने के लिए कुटिनी बुलाता है । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;मां , भी तो जब , दादी की चिकचिक से &lt;span class=""&gt;परेशान &lt;/span&gt;हो जाती है , तब बाहर खेल रही कुटिनी को बुलाकर तडा&lt;span class=""&gt;तड &lt;/span&gt;जड़ देती है दो चार थप्पड़ । बेचारी बिलबिला जाती है , पर मां का कलेजा थोड़ा डंडा हो जाता है । &lt;span class=""&gt;भडांस &lt;/span&gt;तो ऐसे निकलती है जैसे दादी को ही धुन रही हो , पर जब सामने कुटिनी सुबकती है तब , सीने से लगाकर ख़ुद भी रोने लगती है । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;दादी वैसे तो ठीक है , पर मां जब पूरे दिन काम निबटाती रहती है , फ़िर भी उसके मां -बाबा को गाली देती है , उसे लगता है मां के पीहर से दहेज़ कम मिला है । मां , बताती है ढेर सारे बर्तन , कपडे , मिठाई , फल , मेवे , जेवर सब तो दिया था , पर जाने क्यों , &lt;span class=""&gt;कुटाट &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;बुढिया &lt;/span&gt;पीछा ही नही छोड़ती । जब दादी बीमार हो गई तब , मां ने ही सेवा की और मर गई तब मां ने ही गंगाजल मुंह में डाला । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;अब , तो कुटिनी सोलह बरस की हो गई है , सब अच्छा बुरा समझ लेती है । बाबा दिन भर खेत पर गुजार देते हैं , शाम को जब , घर आते हैं तब , दौड़ कर पानी का लोटा थमा देती है , गरम अदरक वाली चाय भी पिलाती है । बाबा के कपड़े धोकर प्रैस करती है । कभी -कभी बाबा से पूछ लेती है -बाबा हम शहर में क्यों नही रह सकते ? तब , बाबा बता देते हैं , सब लोग शहर में रहेंगे तो गाँव में कौन रहेगा ? गोला अपने काम से मतलब रखती है , कभी -कभी कुटिनी से लड़ भी लेती है । बाबा अपने यार दोस्तों में व्यस्त रहते हैं पर , जब मेला लगा हो तो , शहर भी ले जाते हैं । दो तीन दिन बाद बच्चों के लिए पेडे भी लाते हैं ।लेकिन श्यामा कुटिनी जब , शहर जाकर पढने की बात करती है तब , मुकर जाते हैं । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;गाँव में पढो , शहर में दाखिला लेलो , मां , अब बुजुर्ग हो चली है , न कुटिनी को मरने दौड़ती है और न दादी की झिकझिक रही । बैठ कर कभी स्वेटर बुनती है , कभी दरी बुनती है , कभी &lt;span class=""&gt;खाट &lt;/span&gt;बुन लेती है आस -पास की औरतें आकर हाथ बटा देती हैं । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;भाई किसना अब बाबा का काम सँभालने लगा है । पढ़ाई उसे नही &lt;span class=""&gt;भाती, &lt;/span&gt;बारहवीं पास कर ली है , फ़िर भी खेत में ट्रेक्टर चलाता है , माल जोखता है , &lt;span class=""&gt;मंडी &lt;/span&gt;ले जाता है , पैसे वसूलता है , उसे यही काम अच्छा लगता है । मां , बाबा से कहने लगी है -कुटिनी के लिए वर देखना शुरू करो , बड़ी हो गई है । बाबा भी चिंता करते हैं । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;इस फागुन में कुटिनी बीस बरस की हुई और बाबा ने उसे ब्याह दिया । शहर में ससुराल है , लड़का मास्टरी करता है पर , पक्का लीचड़ है । अपने को प्रोफेसर ही समझता है । कुटिनी ने सब संभाल लिया है । पीहर की याद आती है तो मां से आकर मिल जाती है , प्रोफेसर साब , कभी -कभी सोमरस पान भी कर लेते हैं , फ़िर कुटिनी से पूछ बैठते हैं , श्यामा मैडम !! तुम्हारे बाबा , तुम्हें बुलाते क्यों नही , तुम्हारा भाई , तुम्हारे पास क्यों नही आता ? क्या अपनी कुटिनी को भूल गए ? तुम्हारा भाई भी भूल गया साला !! कहीं का , बेटी ब्याह दी , बस हो गया काम । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;कुटिनी दिल मसोस कर रह जाती है , जानती है बाबा और भाई उसके घर का पानी भी नही पीयेंगे , आने -जाने का तो प्रश्न ही नही है ,किसना आता है कभी -कभी , &lt;span class=""&gt;माँ &lt;/span&gt;उसके हाथ मिठाई ,कपडे भेजती रहती है फ़िर भी प्रोफैसर साब जैसा चाहते हैं वैसा नही हो पाता । बाबा ने गोला का ब्याह भी कर दिया , किसना की शादी भी हो गई चार साल हो गए , एक बेटा है , बाबा ने खेत बेच दिया और पैसे बैंक मैं डाल दिए ।सब कुछ ठीक चल रहा है पर , जाने क्या हुआ अब न कुटिनी का नाम लेते हैं और न गोला का । बेटियाँ तो जैसे अब इस दुनिया मैं उनके लिए रही ही नहीं । माँ , अकेली बैठी तड&lt;span class=""&gt;फती &lt;/span&gt;रहती है , गोला और कुटिनी से मिलने के सपने संजोती रहती है । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;कुटिनी जब गाँव गई तब , माँ ने बताया -तुम्हारे बाबा को पाता चला है पिता की दौलत मैं बेटी का भी बराबर का हक़ होता है , तभी से दूर हो गए हैं । वे संपत्ति मैं हिस्सा नही चाहते । हाँ , माँ , मुझे तो कोई दौलत नही चाहिए फ़िर ऐसा क्यों ? एक बार पूछ तो लेते । उन्हें बता देना माँ , कुटिनी ने अपनी मंशा दिखा दी । गोला तो गाँव आती ही नही फ़िर भय कैसा ? माँ ने कुटिनी को सीने से लगा लिया और सुबकने लगी । माँ , बाबा से मजाक भी करो तो , उल्टा जबाव देते हैं , अब समझ गई हूँ संतान से जादा दौलत का मोह होता है । बेटा खुश रह अपने घर मैं । माँ , &lt;span class=""&gt;तो &lt;/span&gt;भरे गले से कुटिनी को बिदा कर अन्दर चली गई । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;कुटिनी आज भी बाबा की टेर सुनती है , नाम भी तो ऐसा चिपक गया है जो चाहते हुए भी यादों को दूर नही होने देता । माँ , की तरह कुटिनी भी कभी दरी बुनती है ,तब आंसुओं की धार नदी सी बह उठती है , अब तो कुटिनी श्यामा आंटी बन गई है उसका असली नाम कोई नही &lt;span class=""&gt;जानता , &lt;/span&gt;श्यामा घर के बरांडे &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;गौरैया के बच्चों को उड़ते हुए देखती है और लम्बी साँस खींचकर रह जाती है । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;रेनू .....&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-398779217786142646?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/398779217786142646/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=398779217786142646' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/398779217786142646'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/398779217786142646'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='कुटिनी'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/Soz2aYtUM1I/AAAAAAAAAo4/C7RSA1Sfblc/s72-c/DSC04317.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-5030187376602811362</id><published>2009-07-05T00:39:00.000-07:00</published><updated>2009-07-05T01:31:08.675-07:00</updated><title type='text'>सन्यासी</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SlBkHnFuiII/AAAAAAAAAnU/cHrwDqSfAnA/s1600-h/03022008489.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354890038858385538" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SlBkHnFuiII/AAAAAAAAAnU/cHrwDqSfAnA/s200/03022008489.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#663366;"&gt;एक बार जंगल &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;सूखा पड़ गया , &lt;span class=""&gt;सारे &lt;/span&gt;जानवर पानी और भोजन की तलाश में इधर -उधर भागने लगे । कोए ने अपने दोस्त चूहे से कहा - चलो हम भी यहाँ से भाग चलें । मगर कहाँ ? बुद्धिमान लोग अपना ठिकाना ढूंढ़ कर ही निकलते हैं । कौआ बोला - स्थान मेरा देखा हुआ है , तुम चिंता मत करो । चूहा बोला - मुझे भी बता दो , कहाँ जाना है । पास वाले सरोवर में मेरा एक दोस्त कछुआ रहता है , वह हमारा स्वागत करेगा , वैसे भी कहा गया है &lt;span class=""&gt;कि -&lt;/span&gt;कर्जा देने वाला &lt;span class=""&gt;साहूकार , &lt;/span&gt;औषधि देने वाला वैद्ध , पूजा &lt;span class=""&gt;पाठ &lt;/span&gt;वाला &lt;span class=""&gt;ब्राह्मण , &lt;/span&gt;जल से भरी नदी , यह चार गुण न हों उस स्थान पर नही रहना चाहिए ।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#663366;"&gt;चूहा सोचने &lt;span class=""&gt;लगा-&lt;/span&gt; जहाँ रोजगार न हो उस स्थान से कैसा मोह ? दोनो मित्र वहां से चल दिए । लंबा रास्ता तय कर वे लोग सरोवर तक पहुँच गए । कछुए ने कौए को दूर से ही पहचान लिया और गले से लगा लिया । कैसे आना हुआ ? पहले कौए ने चूहे का परिचय दिया फ़िर चूहा कछुए को किस्सा सुनाने लगा - एक जंगल में सन्यासी रहता था , उसके भक्त बहुत कम थे , एक भक्त रोज ही स्वादिष्ट भोजन गुरु के लिए लाया करता था । बचा हुआ भोजन एक पोटली में बांधकर , ऊपर खूंटी पर लटका कर , उसी के नीचे आसन लगाकर सन्यासी सो जाता था । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#663366;"&gt;जब सन्यासी सो जाता तब , चूहा उस पोटली से खाना खा लेता था , क्रोधी साधू ने चूहे को भागने के लिए लाठी का प्रबंध किया । कुछ दिनों बाद उस सन्यासी का मित्र वहां आ गया , अपने दोस्त को भोजन कराने के बाद , बचा हुआ खाना पोटली में बांधकर वहीं लटका दिया , साधू बार -बार लाठी को जमीन पर ऐसे मारता कि चूहा डर जाता । नया साधू बोला - तुम क्यों लाठी मारते हो ? सन्यासी ने सारी बात बता दी । लेकिन नया साधू सोचने लगा कि अवश्य ही इसमें धन छुपाकर रखा है । शायद चूहा अपने बिल में छुपा लेता होगा । क्योंकि धन ही प्रभुता का मूल होता है । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#663366;"&gt;दौनों साधुओं ने मेरा बिल खोदना शुरूकर दिया , मेरा खजाना लेकर चले गए । मेरी बुरी हालत को देखकर , साधू बोला - प्राणी धन से ही इस संसार में महान बनता है , इस चूहे को देखो धन जाते ही निष्प्राण हो गया है , चूहे को &lt;span class=""&gt;देखकर, &lt;/span&gt;एक साधू ने लाठी से उस पर वार कर दिया । चूहा सोचने लगा - धन के लोभी लोग बहुत बेसब्र होते हैं , इनकी इन्द्रियां साथ नही देतीं लेकिन जो लोग संतुष्ट होते हैं उन्हें चिंता नही सताती । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#663366;"&gt;कोई संदेह नही कि हमें संचय नही करना चाहिए , चूहे ने सन्यासी को सबक सिखा दिया था । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#663366;"&gt;रेनू ....&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-5030187376602811362?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/5030187376602811362/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=5030187376602811362' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/5030187376602811362'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/5030187376602811362'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/07/blog-post_4857.html' title='सन्यासी'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SlBkHnFuiII/AAAAAAAAAnU/cHrwDqSfAnA/s72-c/03022008489.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-4609276954825095470</id><published>2009-07-05T00:15:00.000-07:00</published><updated>2009-07-05T00:39:34.355-07:00</updated><title type='text'>अपने जैसा दोस्त</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SlBYjBAZx1I/AAAAAAAAAnM/kqSMxoBIObw/s1600-h/DSC01913.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354877315532310354" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SlBYjBAZx1I/AAAAAAAAAnM/kqSMxoBIObw/s200/DSC01913.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;हिरन और कौआ पुराने दोस्त थे , इनके प्यार को देखकर जगल के दूसरे जानवर भी ईर्ष्या करते थे । एक बार एक गीदड़ जगल &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;आ गया , उसने जब हिरन को देखा तो लार टपकाने लगा , गीदड़ हिरन के पास गया बोला - &lt;span class=""&gt;मैं &lt;/span&gt;यहाँ नया आया हूँ , तुम यदि मेरे दोस्त बन जाओ तो अच्छा होगा । चलो ठीक है हिरन ने उसकी दोस्ती स्वीकार कर ली । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;दिन भर साथ रहने के बाद रात को भी गीदड़ उसके साथ जाने लगा , मृग एक बरगद के पेड के पास रहता था । उसी बरगद के ऊपर कौआ भी अपना घोंसला बनाकर रहता था । गीदड़ को देखकर कौआ बोला - अरे !! मित्र , इसे कहाँ से ले आए , यह हमारा दोस्त है , आज से हमारे साथ ही रहेगा । कौआ बोला - हिरन भाई ! किसी भी अजनबी से दोस्ती ठीक नही , धोखा हो सकता है । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;गीदड़ समझ गया और वहां से चुपचाप निकल गया , वह सोचने लगा यदि मैने हिरन को नुकसान पहुँचने का प्रयास किया तो ये काओं का झुंड मुझे जिन्दा नही छोडेगा । दोस्ती हमेशा बराबर वालों से ही करनी चाहिए ।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;रेनू ....&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-4609276954825095470?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/4609276954825095470/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=4609276954825095470' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/4609276954825095470'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/4609276954825095470'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/07/blog-post_05.html' title='अपने जैसा दोस्त'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SlBYjBAZx1I/AAAAAAAAAnM/kqSMxoBIObw/s72-c/DSC01913.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-2829910654179503888</id><published>2009-07-04T23:52:00.000-07:00</published><updated>2009-07-05T00:15:03.539-07:00</updated><title type='text'>लालच बुरी बला है</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SlBR5V95UAI/AAAAAAAAAnE/Fhc-8FP0ZI4/s1600-h/1193594710uk28S8.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354870002534666242" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 157px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SlBR5V95UAI/AAAAAAAAAnE/Fhc-8FP0ZI4/s200/1193594710uk28S8.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;जंगल मैं एक बूढा शेर शिकार की तलाश कर रहा था , उसे जब शिकार नही मिला तब उसने झील &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;नहाने का मन बना लिया , &lt;span class=""&gt;बाहर &lt;/span&gt;निकलकर उसने लोगों को आवाज लगाई -ओ , जाने वालो सोने के कंगन दान में ले लो , शेर ने अपने कंगन सामने रख लिए थे , सब लोग सोच रहे थे &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;शेर मूर्ख बना रहा है , इसके पास कंगन नही हो सकते , कोई कहता कि शेर लालच दे रहा है , कोई कहता - चलो देखते हैं क्या माजरा है । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;एक आदमी शेर के पास चला गया और बोला -बताओ कहाँ है कंगन ? ये रहे , शेर ने कंगन दिखा दिए । आदमी बोला - तुम्हारा विश्वास कैसे करुँ , तब शेर ने कहा - देखो मेरा पूरा परिवार ख़तम हो गया है , में अकेला हूँ , अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए ही में यह धर्म -कर्म कर रहा हूँ । इसलिए सरोवर में स्नान करो और कंगन ले जाओ , आदमी बूढे शेर &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;बातों में आ गया , सरोवर में जाते ही वह दलदल में फंस गया । शेर बोला - अरे !! तुम तो फंस गए ? शेर अन्दर गया और आदमी को बाहर खींच लिया , एक झटके में ही आदमी को खा गया । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;इसलिए कहा जाता है &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;बिना बिचारे कोई काम नही करना चाहिए । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;रेनू ....&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-2829910654179503888?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/2829910654179503888/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=2829910654179503888' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/2829910654179503888'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/2829910654179503888'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='लालच बुरी बला है'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SlBR5V95UAI/AAAAAAAAAnE/Fhc-8FP0ZI4/s72-c/1193594710uk28S8.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-8754715722474289191</id><published>2009-06-13T03:00:00.000-07:00</published><updated>2009-06-13T05:23:19.777-07:00</updated><title type='text'>सजला</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SjOSNAM4DlI/AAAAAAAAAmU/fh0uXCW5-1Y/s1600-h/DSC02618.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5346777934708870738" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 157px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SjOSNAM4DlI/AAAAAAAAAmU/fh0uXCW5-1Y/s200/DSC02618.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सजला दनदनाती ऑफिस &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;घुस गई , आज फ़िर आने में देर जो हो गई । चटक काला सलवार कुरता जिस पर सुनहरे रंग की जयपुरी प्रिंट से बेल्बुतियाँ छ्पी हुई हैं । झक्क सफ़ेद कुरता फव रहा है , बालों को कसकर बाँध दिया है , उसे इधर -उधर उड़ते बालों से बड़ी चिद लगती है । बार -बार चहरे पर झूलते बालों को सँभालने में ही विचार &lt;span class=""&gt;श्रृंखला &lt;/span&gt;टूट जाती है । आज भी मनोयोग से काम करना उसे बता है । कितनी बार विरमा ने कहा -सजला दी ! घर पर कोई काम करने वाला रख लो तो , सुनती ही नहीं । कहती हैं - एक प्राणी का काम ही कितना होता है , कभी जब &lt;span class=""&gt;माँ &lt;/span&gt;आ जाती है तब , दस लोगों के बराबर काम निकलता है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सजला बिंदास तो है &lt;span class=""&gt;पर, &lt;/span&gt;नियम कायदे से चलना उसे पसंद है । ऑफिस के काम में यदि किसी ने कोताही बरती तो , उसे बर्दास्त नही होता । कल ही भूपेश से भीड़ गई , साफ़ कह दिया था मिस्टर !! यदि काम नही करना तो , दूसरी जगह तलाशिये । मिस्टर भंडारी ने उसे यूँ ही प्रधान संपादक का काम नही दे दिया । चार साल से नर्गिस नामक पत्रिका संभल रही है । कविता , कहानी , लेख बूँद के नाम से छापती है । सजला को जाने कब लिखने का समय मिल जाता है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;विरमा जब सजला से मिली थी , तब नौकरी के लिए आवेदन लेकर आई थी । जाने क्या बात हुई सजला ने उसे काम दे दिया । एक छोटी बहन को कायदे से कैसे रखा जाता है यह सजला से अधिक कौन जान सकता है । विमी को वह बहन ही मानती थी , एक बार झमाझम पानी बरस रहा था , सजला तेज बुखार में तप रही थी ।तभी विमी के पास फोन आया - हेलो !! विमी &lt;span class=""&gt;मैं &lt;/span&gt;सजला , यार !! तू अभी दावा लेकर आजा , और सुन दो तीन दूध के पैकेट भी ले आना । हाँ , कैसे आएगी ? पानी आ रहा है , तुम चिंता मत करो मैं , गीत को लेकर आती हूँ । आधा घंटे के भीतर विमी आ धमकी । गीत रैन कोट पहने बाहर खड़ा है दीदी !! बुखार कैसा है ? माँ ने कहा है विमी दी रात को आपके पास ही रुक जाएँगी । मैं , जाता हूँ , कुछ लाना तो नही , अरे ! सुन गीत ! बेटा नीचे से थोडी सब्जी ला दे , विमी कह रही थी दी !! अब मैं आ गई हूँ देख लुंगी क्या चाहिए , क्या नही । आप आराम करो ।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;विमी ने अस्त -व्यस्त घर को ठीक किया , दावा देकर दूध भी गरम कर दिया । अब आप सो लो , ताकि कुछ बुखार उतर जाए । मैं अपने लिए दो पराठे बना लेती हूँ , दो नही चार बना लेना , जब बुखार नही होगा तब मैं भी कहूंगी तुम्हारे साथ । ठीक है , और विमी काम करने लगी । सजला भी निश्चिंत होकर सो गई । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;विमी रसोई का काम समेत कर सजला की टेबल ठीक करने लगी । तभी उसकी नज़र एक डायरी पर पड़ी , घूम कर देखा सजला सो रही थी , घीरे से डायरी के पन्ने पलटने लगी । बेहद कोमलता से लिखी गईं कवितायें किसी करीबी के लिए लिखी लग रहीं थीं । लगा , जैसे सजला दी ! किसी को बेइंतहा चाहती हैं । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;मैं , दरिया बन &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;बह जाउंगी ,&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;तुम्हारी रूह &lt;span class=""&gt;में । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;तुम सागर बन , &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;समेत लेना मुझे । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span class=""&gt;मैं , &lt;/span&gt;हिरनी सी &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;कुलांचें भर लुंगी &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;तुम , बहेलिये से &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;जाल फैला देना ..... , &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;क्या है , यह सब । दी ! क्यों अकेली रहतीं हैं ? कुछ समझ नही आता । हजारों सवाल जहाँ &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;कौंध गए , सजला ने करवट बदली विमी सामने ही खड़ी थी । अब कैसी हो दी , बुखार कम है अब , तुमने खाना खाया या नही ? कितने घंटे सो ली आज &lt;span class=""&gt;मैं, &lt;/span&gt;अधिक नही , चलो हम साथ खाना खायेंगे और सुनो दो गिलास दूध लाना समझी । विमी खुश हो गई , उसे लगा आज पहली बार किसी ने उसे भी दूध लेने को कहा है , वरना माँ , तो कभी कह ही नही पाती । जब बारहवीं पास किया तो नौकरी करने आ गई । गीत अभी छोटा है , सीमा पढ़ रही है उफ़ !! मैं कहाँ अटक गई ?&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;विमी !! &lt;/span&gt;तुम कितना अच्छा खाना बनाती हो , माँ से सीखा , हाँ माँ , बहुत अच्छा खाना बनती है । मेरी माँ को पता चलेगा &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;आठ दिन पहले बुखार आया था , तब भी भागी चली आएँगी । सजला दी !! एक बात पूंछू - हाँ , बोल न , आपकी डायरी देखि मैंने , क्या लिखती हो ! आप नाराज तो नही होगी ? यूँ ही लिख लेती हूँ , कोई तो है , जिसके लिए आप लिखती हो । दी !! आपको &lt;span class=""&gt;परेशान &lt;/span&gt;नही करना चाहती , कोई बात नही पगली ! आज कोई तो मेरे पास है जिससे बात कर पा रही हूँ । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;देखो बारिश बंद होने का नाम ही नही ले रही है , हम लोग चाय पीयें क्या ? हाँ , मैं अभी लती हूँ । सजला बालकनी &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;निकल आई , कन्धों को शाल से ढकती हुई कुर्सी पर बैठ गई । बरसती बूंदों के साथ ही सजला भी किसी ख्वाव में समाती चली गई । विमी चुपके से पास आकार बैठ गई दी , चाय , हाँ , विमी !! &lt;span class=""&gt;मैं &lt;/span&gt;जब कॉलेज से निकली माँ ने सोच लिया अब , इसकी शादी कर देंगे । बिना बाप &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;बेटी कहाँ नौकरी के लिए भटकती रहेगी । एक दिन मामा को बुलाकर फोटो और जनम पत्री पकड़ा दिए , दो महीने के भीतर मामा ने एक बेंक &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;क्लर्क को पकड़ लिया । भरा पूरा परिवार था , गौरव उसका नाम था । पन्द्रह दिन के भीतर सारे &lt;span class=""&gt;काम &lt;/span&gt;हो गए और शादी भी हो ली । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;जाने क्या बात हुई , फोटो देखा तब , खुश हुई थी , पर दूसरे ही पल मेरा खून &lt;span class=""&gt;मानो &lt;/span&gt;जम गया । माँ से कुछ नही कहा , भीतर कुछ रिस रहा था , बन्दा बिल्कुल नही जमा । मुझे लगता था वह संवेदनाओं को अपने लिए ही जिन्दा रखता है , दूसरों के लिए मार देता है । जब नौकरी की बात की , तो साफ़ मुकर गया । कहने लगा घर संभालो , कहाँ लोगों के बीच भागती फिरोगी । दोस्तों के साथ मस्ती करता और रात भर पार्टियाँ करता । घर आकर मुझसे लड़ता , एक दिन बोल रहा था - तुम्हारी माँ का पैसा भी तो , हमारा ही है । &lt;span class=""&gt;मैं , &lt;/span&gt;हतप्रभ रह गई । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;माँ , से कुछ भी नही कह पाई । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक बार माँ के पास आई तब बता दिया माँ , गौरव ! तुम्हारे पैसे पर नजर रखता है । माँ , हंसने लगी । बेटा ! हँसी मजाक तो चलता रहता है । वो , तुम्हारा पति है , मिलकर रहो । माँ ,जब बीमार हो गई तब , मैं , आकर वापस नही गई , उसके घर वालों ने भी कोई प्रयास नही किया , शायद अपने बेटे के लिए दूसरी बहु चाहते थे । दी !! कैसी बात करती हो , विमी , आँखें फाड़ कर सजला का चेहरा देख रही थी । इतना बड़ा फैसला , एक झटके मैं ले लिया । हाँ , विमी तुम नही जानतीं सुनीता नाम की एक औरत से उसके रिश्ते थे । एक बेटा भी था उसका । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;पूरा परिवार मुझसे यह बात छुपाना चाहता था , मैं , जब सुनीता से जाकर मिली तब लगा मुझे ही वापस हो लेना चाहिए और माँ के पास आकर फ़िर नही गई उस गौरव के पास । माँ के पास मिलने आ जाता है कभी -कभी । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;माँ , मेरे पास आ जातीं हैं , खेती का काम न होता तो माँ , कभी मुझे अकेला न छोड़तीं । ओह दी ! आपने कितना कुछ सहन किया और लगता नही आप को देखकर । मेने आपको दुखी किया है शायद , नही ऐसा कुछ नही है । तुम कमरे मैं सो &lt;span class=""&gt;जाना &lt;/span&gt;अब , बारिश भी बंद होने को है , पहले से ठीक हूँ । दी आप दवा ले लो ,तभी फोन की घंटी बज गई । विमी ने ही फोन उठा लिया , हेलो !! मैं कपिल बोल रहा हूँ , सज्जी से बात हो सकती है क्या ? सजला देर तक फोन पर बातें करती रही । डायरी वाले महाशय यही थे शायद , वो कह रहे थे मैं , आ रहा हूँ । एक हफ्ते की छुट्टी लेकर और सजला चहकती हुई बिस्तर पर लुढ़क गई । विमी सोने का प्रयास करने लगी । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू शर्मा ......&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-8754715722474289191?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/8754715722474289191/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=8754715722474289191' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/8754715722474289191'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/8754715722474289191'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='सजला'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SjOSNAM4DlI/AAAAAAAAAmU/fh0uXCW5-1Y/s72-c/DSC02618.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-3405794554951448289</id><published>2009-05-26T22:49:00.000-07:00</published><updated>2009-05-26T23:12:25.261-07:00</updated><title type='text'>लोमडी और मुर्गा</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShzZNypooRI/AAAAAAAAAl8/KjSLK51OpB4/s1600-h/Cole_Indian_at_Sunset_1845_47.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5340382089112494354" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 152px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShzZNypooRI/AAAAAAAAAl8/KjSLK51OpB4/s200/Cole_Indian_at_Sunset_1845_47.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक जंगली मुर्गा पेड पर बैठा बांग दे रहा था । मौसम बहुत अच्छा था और मुर्गे का पेट भी भरा हुआ था । तभी पेड के नीचे एक लोमडी आई , वह दो दिन से भूखी थी , मुर्गे को देखकर उसके मुंह मैं पानी आ गया । लोमडी ऊपर चढ़ नही सकती थी अत : उसने सोचा मुर्गे को नीचे उतरा जाय । उसने मुर्गे से कहा - देखो नीचे कितने दाने बिखरे हैं , फ़िर भी तुम ऊपर बैठे हो , मुर्गा बोला तुम भी तो मुझे खाने के लिए ही बैठी हो । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;लोमडी बोली - अरे ! तुमने जंगल की मुनादी नही सुनी , अब कोई एक दूसरे को नही खायेगा । भाईचारे से &lt;span class=""&gt;रहेंगे । &lt;/span&gt;अब , तुम डरो मत । मुर्गा बोला - यह तो अच्छा हुआ , अब कोई किसी से नही डरेगा । तुम भी तो शेर से डरती थीं । अब तुम भी आराम से रहना । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;लोमडी ने कहा - अब मुझे किसी का डर नही , कल ही तेंदुए के साथ हमारा खेल हुआ था । अब , तुम पेड पर ही क्यों बैठे हो , नीचे आ जाओ , हाँ , आता हूँ , अरे !! पीछे देखो - जंगली कुत्ते आ रहे हैं । लोमडी भागने लगी । अब , भाग क्यों रही हो ? इन कुत्तों का क्या भरोसा , तुम्हारी तरह मुनादी न सुन पाये हों तो , मुर्गा हंसने लगा । लोमडी की झूंठी बातें मुर्गे को फंसा नही सकी । धोखा देने वाला अपने ही जाल &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;फंस जाता है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू शर्मा ...&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-3405794554951448289?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/3405794554951448289/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=3405794554951448289' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/3405794554951448289'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/3405794554951448289'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/05/blog-post_4374.html' title='लोमडी और मुर्गा'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShzZNypooRI/AAAAAAAAAl8/KjSLK51OpB4/s72-c/Cole_Indian_at_Sunset_1845_47.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-3969355982819150240</id><published>2009-05-26T22:27:00.000-07:00</published><updated>2009-05-26T22:49:13.808-07:00</updated><title type='text'>मजाक की हद</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShzT4FMn2KI/AAAAAAAAAl0/62lX1HflvWA/s1600-h/elephant.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5340376218575820962" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 140px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShzT4FMn2KI/AAAAAAAAAl0/62lX1HflvWA/s200/elephant.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;किसी नगर &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;एक रईस के पास एक &lt;span class=""&gt;हाथी &lt;/span&gt;था । उसकी देखभाल के लिए एक महावत भी रखा हुआ था । महावत अपने हाथी को नहाने और &lt;span class=""&gt;टहलाने &lt;/span&gt;के लिए रोज शहर की गलियों और सड़कों से ही ले जाता था । महावत जिस रस्ते से हाथी को ले जाता था , वहां एक दरजी की दुकान भी पड़ती थी । दरजी की &lt;span class=""&gt;दुकान &lt;/span&gt;सिले हुए कपडों से भरी रहती थी । महावत और दरजी एक ही गाँव के रहने वाले थे इसलिए उनकी दोस्ती भी सब जानते थे । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;महावत और दरजी हर दिन बातें किया करते थे , दरजी हाथी के लिए कभी केले , कभी रोटी , गुड और कभी हरी घास रख लेता था । हाथी अपनी सूंड दुकान की खिड़की से अन्दर करता और दरजी उसे कुछ न कुछ खाने को दे देता था । एक दिन दरजी को मजाक सूझ गई , उसने हाथी की सूंड में सुई चुभो दी , हाथी ने अपनी सूंड बाहर खींच ली । महावत इस बात से &lt;span class=""&gt;अनजान &lt;/span&gt;था । हाथी &lt;span class=""&gt;तालाब &lt;/span&gt;पर खूब नहाया और पानी को गन्दा करने के बाद , अपनी सूंड में भी &lt;span class=""&gt;भरलिया। &lt;/span&gt;वापस लौटते समय उसने दरजी की दुकान में सूंड डाली और और साडी दुकान में पानी छिटक दिया । &lt;span class=""&gt;सारे &lt;/span&gt;कपडे गंदे हो गए , दरजी भी गंदे पानी के &lt;span class=""&gt;कारण &lt;/span&gt;बौखला गया । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;महावत समझ गया &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;जरूर दरजी ने कोई शरारत &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;होगी । कभी -कभी छोटी शरारतें भी महँगी पड़ जाती हैं । मजाक भी हद में होना चाहिए ।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू .....&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-3969355982819150240?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/3969355982819150240/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=3969355982819150240' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/3969355982819150240'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/3969355982819150240'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/05/blog-post_2619.html' title='मजाक की हद'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShzT4FMn2KI/AAAAAAAAAl0/62lX1HflvWA/s72-c/elephant.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-5702167497351436262</id><published>2009-05-26T04:02:00.000-07:00</published><updated>2009-05-26T04:26:08.368-07:00</updated><title type='text'>बैल और गधा</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShvQtdjfuKI/AAAAAAAAAls/lZTeguykCxA/s1600-h/painting_8685.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5340091262624053410" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShvQtdjfuKI/AAAAAAAAAls/lZTeguykCxA/s200/painting_8685.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक किसान के घर &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;बैल और गधा दो जानवर थे , गधे का कोई काम नही था , कभी -कभी बच्चे उस पर सवारी करते थे , बैल को बहुत &lt;span class=""&gt;मेहनत &lt;/span&gt;करनी पड़ती थी , कभी गाड़ी में जुत कर शहर जाता था , कभी हल में जुत कर खेत जोतता था । गधा दिन भर खा -खा कर मोटा हो रहा था । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक दिन बैल ने गधे से कहा - &lt;span class=""&gt;यार!!&lt;/span&gt; तुम तो किस्मत वाले हो , आराम करते रहते हो , &lt;span class=""&gt;मैं &lt;/span&gt;काम करके परेशान हूँ । गधे ने कहा -लोग मुझे मूर्ख कहते हैं , तुम मुझसे अधिक मूर्ख हो , तुम मेरी बताई तरकीब पर अमल करो , तो काम से बच जाओगे । तुम झूंठ -मूंठ को बीमार होने का नाटक करो , खाना मत खाना , किसान मरे भी तो मत उठाना । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बैल ने ऐसा ही किया , किसान ने सोचा - गधे को ही लेकर जाता हूँ , शायद तब तक बैल की तबियत भी ठीक हो जायेगी । अब गधा पछताने लगा । अब दिन भर हल जोतना पड़ रहा था , मार भी खानी पड़ रही थी सो अलग । गधे की बुरी हालत हो गई । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;दूसरे दिन भी यही &lt;span class=""&gt;हाल &lt;/span&gt;रहा । रात को उअसने बैल से कहा - भाई !! तुम अब बीमारी का नाटक छोड़ दो । क्योंकि किसान कह रहा था की तुम्हें वह कसाई को बेच देगा । उसे पैसों की सख्त जरूरत है । बैल ने खाना खाना शुरू कर दिया , गधे की जान बच गई , वह फ़िर से मस्ती करने लगा । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सीधे व्यक्ति को गुमराह नही करना चाहिए । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू ....&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-5702167497351436262?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/5702167497351436262/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=5702167497351436262' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/5702167497351436262'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/5702167497351436262'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/05/blog-post_4727.html' title='बैल और गधा'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShvQtdjfuKI/AAAAAAAAAls/lZTeguykCxA/s72-c/painting_8685.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-8620017134150282281</id><published>2009-05-26T03:31:00.000-07:00</published><updated>2009-05-26T04:00:03.776-07:00</updated><title type='text'>मगर और बन्दर</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShvK8-z2UoI/AAAAAAAAAlk/LSzeXgSdTRM/s1600-h/DSC02806.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5340084932179284610" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShvK8-z2UoI/AAAAAAAAAlk/LSzeXgSdTRM/s200/DSC02806.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक नदी के किनारे बहुत सारे जामुन के पेड थे , बन्दर उन पेडों पर खूब उछल -कूद मचाया करते थे । नदी &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;एक मगर भी अपने परिवार के साथ रहता था । कभी धूप &lt;span class=""&gt;सेकने &lt;/span&gt;नदी किनारे आ जाया करता था , ललचाई आंखों से बंदरों को देखा करता था । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक बन्दर ने मगर से दोस्ती कर ली थी , कभी -कभी उसे जामुन खाने को दे देता था । बन्दर के साथियों ने उसे आगाह किया &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;मगर से सावधान रहना , पर सोनू ने कोई परवाह नही &lt;span class=""&gt;की। &lt;/span&gt;मगर अपनी पत्नी से जामुन की बड़ी तारीफ करता था । पत्नी की फरमाइश मगर ने बन्दर तक पहुँचा दी । बन्दर बड़ा खुश हुआ । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बन्दर के स्वादिष्ट मांस का भोजन करने के लिए पत्नी बेचैन हो गई । उसने पति से कहा - किसी तरह बन्दर को हमारे पास लेकर आओ । उसका कलेजा हमें खाना है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मगर ने बन्दर को खाने के लिए निमंत्रण दिया , बन्दर ने कहा में कैसे जा सकता हूँ ? नदी गहरी है , अरे !! तुम मेरी पीठ पर बैठ &lt;span class=""&gt;जाना &lt;/span&gt;और हम पहुँच जायेंगे । बीच नदी में पहुँच कर मगर ने कहा - दोस्त मुझे तुम्हारी जान लेनी पड़ेगी । मेरी पत्नी तुम्हारा कलेजा खाना चाहती है । बन्दर को अपने दोस्तों की बात याद आ गई । उसने धीरज नही खोया और मगर से बोला - यार तुमने पहले क्यों नही बताया , मेरा कलेजा तो पेड पर सूख रहा है । वापस चलो , &lt;span class=""&gt;मैं &lt;/span&gt;तुम्हें कलेजा दे दूंगा । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मगर उसकी बातों में &lt;span class=""&gt;आ &lt;/span&gt;गया , बन्दर तुंरत पेड पर चढ़ गया और बोला - मूर्ख !!! धोखेवाज !! तुमने मुझे धोखा दिया , अब तुमसे मेरी दोस्ती भी ख़तम । में ही ग़लत था , मैंने अपने दोस्तों की बात पर विश्वास नही किया । बन्दर अपने साथियों के पास गया और सारी बात बता दी । सब लोग मगर को धिक्कारने लगे ।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;धोखा देने वाला भी कभी- कभी मूर्खतावश जाल में फंस जाता है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू ...&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-8620017134150282281?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/8620017134150282281/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=8620017134150282281' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/8620017134150282281'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/8620017134150282281'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/05/blog-post_2730.html' title='मगर और बन्दर'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShvK8-z2UoI/AAAAAAAAAlk/LSzeXgSdTRM/s72-c/DSC02806.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-3805121064378931350</id><published>2009-05-26T03:07:00.000-07:00</published><updated>2009-05-26T03:31:54.837-07:00</updated><title type='text'>रंगीन सियार</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShvEwoWGgUI/AAAAAAAAAlc/DPgvTwixdv0/s1600-h/1193594710uk28S8.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5340078122920739138" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 157px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShvEwoWGgUI/AAAAAAAAAlc/DPgvTwixdv0/s200/1193594710uk28S8.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;किसी जंगल &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;एक सियार रहता था , एक दिन उसे कुछ भी खाने को नही मिला &lt;span class=""&gt;तो, &lt;/span&gt;रात को एक गावं में आ गया । गाँव के कुत्तों से बचता हुआ वह कपडे रंगने वाले के घर में घुस गया । वहां एक नांद में नीला रंग घुला हुआ रखा था , सियार ने सोचा &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;इसमें कुछ खाने का माल होगा , लेकिन पैर फिसलने से सियार उस नांद में गिर गया । बड़ी मुश्किल से नांद से बाहर आ पाया , सुबह उसने अपने को मृत जैसा दिखाया , रंगरेज ने उसे बाहर फैंक दिया । सियार उठकर भाग गया । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;धुप में उसका रंग नीला हो गया , एक तालाब के पानी में उसने अपना मुंह देखा , तो उसके दिमाग में चालाकी घूम गई । उसने जंगल के जानवरों से कहना शुरू किया &lt;span class=""&gt;कि, &lt;/span&gt;में ही जंगल का राजा हूँ । मुझे देवताओं ने जंगल पर राज करने के लिए ही भेजा है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सारे जानवर मान गए , लेकिन उसके साथ रहने वाले सियार समझ गए कि यह वही सियार है । उन्होंने नीले सियार से कहा कि तुम यह सब मत करो , पछताना पड़ेगा । लेकिन सियार नही &lt;span class=""&gt;माना। &lt;/span&gt;एक दिन नए राजा ने हुक्म दिया कि मेरे दरवार में कोई सियार न आने पावे । उसके हुक्म पर बड़े -बड़े जानवर उसके लिए शिकार मारकर लाने लगे । उसके लिए एक गुफा भी साफ़ कर दी गई , उसके पुराने दोस्तों ने सोचा कि यह सबको पागल बना रहा है , इसे सबक सिखाना ही पड़ेगा । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक बार जंगल में दरवार लगा था , तभी कुछ दूर से &lt;span class=""&gt;हुआं- &lt;/span&gt;हुआं &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;आवाजें आने लगीं । रंगे सियार राजा को &lt;span class=""&gt;भी &lt;/span&gt;हुआं -हुआं करने की इच्छा होने लगी । वह भी जोर से आवाजें निकालने लगा । पहले तो जानवर लोग सोचने लगे यह क्या हुआ ? सब लोग समझ गए &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;यह सियार है । शेर ने एक झटके में ही उसे मार डाला । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;धोखेवाज को अक्सर उसके साथी ही मार डालते हैं । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू ......&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-3805121064378931350?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/3805121064378931350/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=3805121064378931350' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/3805121064378931350'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/3805121064378931350'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/05/blog-post_26.html' title='रंगीन सियार'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShvEwoWGgUI/AAAAAAAAAlc/DPgvTwixdv0/s72-c/1193594710uk28S8.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-9173512669231660077</id><published>2009-05-18T02:36:00.000-07:00</published><updated>2009-05-18T03:03:36.287-07:00</updated><title type='text'>सच्चा बंधन</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShExknhuUxI/AAAAAAAAAlE/ojsJjVX9Uu4/s1600-h/pic6.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5337101538566230802" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 140px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShExknhuUxI/AAAAAAAAAlE/ojsJjVX9Uu4/s200/pic6.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;किसान के खेत पर कई गधे आकार रात &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;उत्पात मचाते थे । किसान जब बहुत परेशान हो गया तब , सोचने लगा क्या उपाय करूँ ? तभी एक दिन एक सन्यासी उसके खेत से गुजरे । किसान ने उन्हें रोका और जलपान कराया , विश्राम की व्यवस्था कर दी गई । समय देख कर किसान ने अपनी समस्या सन्यासी के सामने रख दी । सन्यासी बोले - आज रात उनका इलाज कर लेंगे । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;आधी रात जब बीत गई , तब गधों का झुंड फ़िर आ गया , किसान डंडा लेकर भगा , ताबड़तोड़ धुनाई मचा दी । फ़िर भी दो गधे उनकी गिरफ्त में आ गए बाकी भाग गए । सन्यासी ने कहा - इन्हें रस्सी से बाँध दो । किसान के पास एक ही रस्सी थी , पहला गधा बाँध दिया गया । दूसरे के लिए सन्यासी ने कहा इसे प्रतीकात्मक रस्सी से बाँध दो । किसान ने बंधने का अभिनय किया और गधा बैठ गया । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सुबह जब दाने -पानी का समय हुआ तब , सन्यासी ने कहा - अब इन्हें खोल दो । जाने दो । इनके लिए इतनी प्रताड़ना ही अधिक है । किसान ने रस्सी खोल दी और गधा खुलते ही भाग गया । दूसरा गधा वहीं बैठा रहा , किसान बोला -महात्मा जी !! यह क्यों नही भगा ? तुमने इस गधे को भी तो बांधा था , विश्वास के बंधन से बांधा है , इसे भी खोल दो , किसान ने फ़िर वही अभिनय किया और गधा धीरे -धीरे गंतव्य की &lt;span class=""&gt;ओर &lt;/span&gt;चल दिया । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;किसान हतप्रभ था , सन्यासी ने कहा - हम सब गलतियाँ करते हैं , लेकिन विश्वास , ईमानदारी , वफादारी सबसे बड़े गुन हैं । इन्ही गुणों के कारण हम ग़लत होकर भी आदर पाते हैं , सम्मान पाते हैं । यह गधा , अपने गुणों के कारण सम्माननीय हो गया है । अपराध से मुक्त हो गया है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू शर्मा ...&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-9173512669231660077?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/9173512669231660077/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=9173512669231660077' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/9173512669231660077'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/9173512669231660077'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html' title='सच्चा बंधन'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShExknhuUxI/AAAAAAAAAlE/ojsJjVX9Uu4/s72-c/pic6.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-7191583378986655682</id><published>2009-05-18T01:22:00.000-07:00</published><updated>2009-05-18T02:36:18.874-07:00</updated><title type='text'>पश्चात्ताप</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShErKyecWCI/AAAAAAAAAk8/1ZSHRGLq43s/s1600-h/kentuckyroad.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5337094497758894114" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 152px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShErKyecWCI/AAAAAAAAAk8/1ZSHRGLq43s/s200/kentuckyroad.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;नन्ही गिलहरी गोपा इधर -उधर फुदक कर जगल के रास्तों को &lt;span class=""&gt;याद &lt;/span&gt;कर रही थी । हर दिन अपने दोस्तों के साथ खेलने &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;समय &lt;span class=""&gt;निकालती &lt;/span&gt;है , कभी नृत्य करती है , कभी संगीत छेड़ती है । गोपा की सबसे प्यारी सखी सोना बुलबुल है , एक दिन बुलबुल ने बताया &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;पास के गाँव में एक किसान रहता है , उसकी पत्नी घर के पिछवाडे दाना -पानी रखती है । वहां जाकर खूब मजे करेंगे । गोपा तैयार तो हुई मगर माता -पिता से आज्ञा लेना टेडी खीर था । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;गोपा अपनी मस्ती में चूर उछलती जा रही थी कि मेढ़क हीरा से टकरा गई , मेढ़क ध्यान में था तो भड़क गया । देख कर नही चल सकती ?गोपा ने मुंह चिडाया और भाग गई । हर दिन गोपा किसी न किसी पडौसी से भीड़ जाती , सोना ने कई बार समझाया पर कोई असर नही हुआ । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक रोज सोना के साथ गोपा गाँव तक चली गई , ढेर सारा दाना पानी देखकर दोस्तों का झुंड वहां हर दिन जाने लगा । शैतान गोपा धीरे से किसान के घर में घुस गई और मक्का के भुट्टे से दाने कुतरने लगी । अचानक घर में गिलहरी देख किसान &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;पत्नी नाराज हो गई । हड़बड़ी में गोपा के गले में दाना अटक गया । गोपा बाहर भागी तबतक , सोना उड़ चुकी थी । उसका दम घुट रहा था । किसी तरह छलांग लगाकर उडी तो , गड्डे में गिर गई । वहां हीरा मेढ़क अपने दोस्तों के साथ दावत उड़ा रहा था , आज उन्हें ढेर &lt;span class=""&gt;सारे &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;कीडे &lt;/span&gt;मकोडे दावत में सर्व किए गए थे । गोपा की हालत देखकर हीरा मुस्कराया , क्यों साहबजादी !! कैसे ? गोपा की आवाज नही निकली और बेसुध हो गई । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;हीरा दोस्तों के साथ गोपा को जंगल तक लाया , सोना भी रास्ते में मिल गई । सब लोग गोपा को &lt;span class=""&gt;वैद्य &lt;/span&gt;मूला बन्दर के पास ले गए । गले से मक्के का दाना निकाला गया , वैद्य ने बताया &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;गोपा दो दिन तक बाहर नही जा सकती । सबने मूला का शुक्रिया अदा किया । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;घर पर गोपा अपने दोस्तों के व्यवहार की समीक्षा करती रही ।मैंने सबको परेशान किया फिरभी हीरा ने मेरी मदद की । अब &lt;span class=""&gt;मैं &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;प्रण &lt;/span&gt;करती हूँ , कभी किसी को दुखी नही करुँगी , अभद्र व्यवहार नही करूंगी । पश्चात्ताप के दिन बिता कर गोपा &lt;span class=""&gt;स्वस्थ्य &lt;/span&gt;हो गई । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू .....&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-7191583378986655682?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/7191583378986655682/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=7191583378986655682' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/7191583378986655682'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/7191583378986655682'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='पश्चात्ताप'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ShErKyecWCI/AAAAAAAAAk8/1ZSHRGLq43s/s72-c/kentuckyroad.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-4925593836452084115</id><published>2009-04-17T00:43:00.000-07:00</published><updated>2009-04-17T01:15:39.698-07:00</updated><title type='text'>नम्रता की जीत</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/Seg6PPXl5dI/AAAAAAAAAj8/08wCG2Qrmmo/s1600-h/DSC01402.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5325570592863544786" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/Seg6PPXl5dI/AAAAAAAAAj8/08wCG2Qrmmo/s200/DSC01402.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक बार समुद्र ने वेत्रवती नदी से कहा -हे सरिते !! मैं समस्त नदियों के मधुर व्यवहार से पूर्ण संतुष्ट हूँ , सभी नदियाँ उपहार स्वरूप कुछ न कुछ अवश्य लाकर देतीं हैं । एक तुम ऐसी कंजूस हो , जो मुझे कभी कुछ नही लाकर देती हो । मुझे तुम्हारी कठोरता पर आश्चर्य होता है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;नदी ने कहा - देव !! मैं कैसे कुछ ला सकती हूँ ?&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;समुद्र ने कहा - अरे !! तुम्हारे तीर पर बैंत के पेड लगे हैं , फ़िर भी एक भी बैंत लाकर नही दिया । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;नदी बोली - इसमें मेरा कोई कसूर नही , जब मैं प्रबल तेज के साथ बहती हूँ , तब सारे बैंत मुझे झुक कर प्रणाम करते हैं ।जब मेरा प्रवाह कुछ कम हो जाता है , तब वे ज्यों के त्यों खडे हो जाते हैं । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;समुद्र ने कहा - हे सरिते !! तुम ठीक कहती हो विनय और नम्रता &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;बड़ी शक्ति होती है । जो झुकना जानते हैं ,वे कभी नही टूटते । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;नम्रता शक्तिशाली और महान गुन है । नम्र व्यक्ति हमेशा विजयी होते हैं । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू ...&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-4925593836452084115?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/4925593836452084115/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=4925593836452084115' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/4925593836452084115'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/4925593836452084115'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/04/blog-post_17.html' title='नम्रता की जीत'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/Seg6PPXl5dI/AAAAAAAAAj8/08wCG2Qrmmo/s72-c/DSC01402.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-7963689839623157975</id><published>2009-04-14T05:21:00.000-07:00</published><updated>2009-04-17T00:42:56.989-07:00</updated><title type='text'>धर्म ज्ञान</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SegynitwoQI/AAAAAAAAAj0/UiPzJiOHO-s/s1600-h/38.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5325562214280634626" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 165px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SegynitwoQI/AAAAAAAAAj0/UiPzJiOHO-s/s200/38.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक नगर मैं , सेठ जी अपने खुश हाल बच्चों सहित रहते थे । उनका बेटा जब बड़ा हुआ तब ,विवाह संस्कार होने पर अत्यन्त सुंदर सुशील बहु घर आ गई । संस्कार उसके व्यवहार से ही झलकते थे । बहु का नाम लक्ष्मी था । उसने देखा ससुर करोदिमल बड़े सज्जन हैं लेकिन बड़े कंजूस हैं । लक्ष्मी का मन दुखी हो गया । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक दिन बाजरे और ज्वर के आते की मोटी रोटी बना कर ससुर जी को परोस दी । भोजन देखते ही सेठ जी बहु से बोले -बेटी !! लक्ष्मी , घर &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;आता तो गेहूं का है , पर मुझे बाजरे ज्वर की रोटी क्यों परोसी है ? बहु ने नम्रता पूर्वक जवाब दिया - पिताजी , आपने जो भंडारा गरीबों के लिए खोल रखा है , उसमें भूखे , गरीब लोग तो किसी तरह अपना पेट भर लेते हैं । सुना है - यही भोजन आप दान करते है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;ज्ञानी पुरूष कहते हैं &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;जैसा इस लोक में दान किया जाता है , वैसा ही परलोक में मिलता है । आप परलोक में ऐसी रोटी कैसे खा पाएंगे , यही सोच कर आपकी थाली में यह रोटी परोसी है । सेठ जी समझ गए , कि मुझे दान भी उत्तम और स्वच्छ ही करना चाहिए । लक्ष्मी के धर्म ज्ञान पर सेठ जी प्रसन्ना हो गए और भंडारे &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;बागडोर बहु को सौप दी गई । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू ...&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-7963689839623157975?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/7963689839623157975/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=7963689839623157975' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/7963689839623157975'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/7963689839623157975'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='धर्म ज्ञान'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SegynitwoQI/AAAAAAAAAj0/UiPzJiOHO-s/s72-c/38.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-8022188971175930748</id><published>2009-03-22T00:42:00.000-07:00</published><updated>2009-03-22T00:52:30.517-07:00</updated><title type='text'>मास्टर जी</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ScXt1GehrII/AAAAAAAAAgY/6HQNUAot48o/s1600-h/DSC02596.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5315916431708236930" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 150px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ScXt1GehrII/AAAAAAAAAgY/6HQNUAot48o/s200/DSC02596.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बिन्दू और धीरू दो मित्र थे। दोनों एक ही कक्षा में पढ़ते थे। चौथे घंटे में उनको जो अध्यापक गणित पढ़ाते थे वह बहुत मोटे थे। मोटे आदमियों को देखकर अक्सर हंसी आ जाती है। मगर उनकी शक्ल इतनी डरावनी थी कि उनको देखकर विद्यार्थियों के होश उड़ जाते थे। वह डांटते-मारते भी बहुत थे। बेंच पर खड़ा कर देना तो उनकी आदत हो गई थी।? कोई दिन ऐसा नहीं जाता था, जिस दिन पांच-दस लड़के बेंच पर न खड़े किये जाते हों। जो जरा सा हंसा या देर से कक्षा में आया या हाजरी देने में गड़बड़ाया, उसे तुरंत बेंच पर खड़ा होना पड़ता था। बेंच पर खड़ा होना एक नियम हो गया था। जो लड़का किसी दिन बेंच पर नहीं खड़ा होता था तो उसको किसी न किसी बहाने डांट-फटकार सुननी पड़ती थी। या मार खानी होती थी। यही कारण था कि उनका शरीर मोटा होने पर भी लड़कों को हंसी नहीं आती थी। और जब तक वे उनकी कक्षा में रहते थे, बड़े सहमे-सहमे रहते थे। जो भी काम वह देते थे वे पूरा करके लाते थे। एक दिन की बात है। बिन्दू उनके दिये हुए सवाल नहीं कर पाया। कक्षा में आते ही उसने धीरू की कापी से सवाल अपनी कापी में उतार लिए। असल में बिन्दू को समय ही नहीं मिल पाया था कि वह सवाल लगा लेता। कक्षा में आकर उन्होंने जब सबसे कापी मांगी तो धीरू ने भी दे दी। बिन्दू ने भी दे दी। और विद्यार्थियों ने भी दे दी। कापी जांचते-जांचते उन्होंने पता नहीं कैसे पकड़ लिया कि बिन्दू ने नकल की है। 'क्यों बिन्दू, तुमने ये प्रश्न नकल किये है न?' 'जी नहीं, सर! मैं... मैं... मैंने तो नहीं सर।' 'सही सही बताओ। की है कि नहीं।' उन्होंने अबकी जोर से बेंत मेज पर पटक कर पूछा। बिन्दू एकदम चौंककर पीछे हट गया। कक्षा के सारे लड़के बिन्दू की तरफ देखने लगे। फिर कोई अपनी कापी पलटने लगा, कोई किताब में अपनी आंखें गड़ा कर बैठ गया। गणित के अध्यापक की तरफ देखने की हिम्मत किसी की नहीं हुई। क्या पता किसको डांट पड़ जाए। धीरू भी भीतर ही भीतर डर रहा था कि कहीं उसको भी न लपेटा जाये। क्योंकि बिन्दू ने उसी की कापी से नकल की थी। बिन्दू घबरा रहा था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह हां कहे या न कहे। पहले पूछने पर वह मना कर चुका था कि उसने नकल नहीं की है। अत: अगर वह हब स्वीकार कर लेता है तो गणित के अध्यापक उसे झूठा कह कर अपमानित और दण्डित करेंगे। बिन्दू इसी उधेड़ बुन में कोई जवाब नहीं दे पाया। गणित के अध्यापक ने उसकी कापी मेज पर फेंकते हुए कहा, 'एक तो नकल करता है, ऊपर से गूंगा बनता है। पाजी!... और धीरू, तुमने इसे नकल करवाई है। खड़े हो जाओ बेंच पर!' धीरू जल्दी से बेंच कर खड़ा हो गया। वह जानता था कि अगर जरा भी हील-हुज्जत की कोई और भी सजा भुगतनी पड़ जाएगी। लेकिन गणित के अध्यापक ने बिन्दू को बेंच पर नहीं खड़ा किया। न मारा ही। मानीटर को बुला कर आदेश दिया, 'बिन्दू के माथे पर स्याही से लिखो 'चोर' और इसे सब कक्षाओं में घुमा लाओ!' सारी कक्षा एकदम से सन्न रह गई। यह तो बहुत बड़ा अपमान था। सभी कक्षाओं के छात्रों के सामने बिन्दू जलील होगा। नकल तो लगभग सभी करते हैं। बिन्दू कुछ देर चुप रहा, फिर उसने कहा, 'माशाब, मैंने नकल इसलिए नहीं की है कि सवाल मुझे आते नहीं हैं।' सारी कक्षा बिन्दू की सूरत देखने लगी। गणित के अध्यापक से इस प्रकार कोई बात नहीं करता था। उन्होंने गरज कर पूछा, 'तब किसलिए की?' 'इसलिए...इसलिए कि काम पूरा न होने पर आप सजा देने लगते हैं।' बिन्दू ने निडर हो कर उत्तर दिया। और बात भी सच थी। 'तो सजा न देकर तुम्हें लड्डू दिया जाए? एक तो काम नहीं करते, ऊपर से नकल करते हैं!... मानीटर लिखो इसके माथे पर चोर!' मानीटर अपनी जगह से नहीं हिला तो वे और जोर से गरजे, 'मैं कहता हूं लिखते हो कि नहीं?' मानीटर ने बिन्दू की आंखों में देखा और सोचा कि यह तो सबकी बेइज्जती की सवाल है। फिर यह कोई बड़ी भारी गलती नहीं है। तो उसने साफ मना कर दिया, 'मैं नहीं लिखूंगा!' गणित के अध्यापक क्रोध से थरथर कांपने लगे। वह समझ नहीं पाये कि आज यह क्या जादू हो गया है। मानीटर भी उसका आदेश नहीं मान रहा है। उन्होंने एक अन्य लड़के से कहा, उसने भी मना कर दिया। इस पर वह स्वयं आगे बढ़े। तब तक कुछ लड़कों ने एक दूसरे को देखा फिर बस्ता समेट-समेट कर कक्षा से बाहर निकल पड़े। और जोर-जोर से नारे लगाने लगे- 'गणित के मास्टर!' 'मुर्दाबाद'। 'गणित की कक्षा!' 'नहीं पढ़ेंगे!' 'मुटकऊ मास्टर।' 'मुर्दाबाद!' पूरे स्कूल में तहलका मच गया। सभी कक्षाओं के लड़के बाहर निकल-निकल कर देखने लगे। कुछ अध्यापक भी बाहर आ गए। गणित के मास्टर का माथा ठनका। उनकी समझ में आ गया कि अब उनकी बेंत और सख्त वाणी का असर इन लड़कों पर नहीं पड़ेगा। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-8022188971175930748?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/8022188971175930748/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=8022188971175930748' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/8022188971175930748'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/8022188971175930748'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/03/blog-post_2066.html' title='मास्टर जी'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ScXt1GehrII/AAAAAAAAAgY/6HQNUAot48o/s72-c/DSC02596.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-5793894511856630565</id><published>2009-03-22T00:35:00.000-07:00</published><updated>2009-03-22T00:41:53.481-07:00</updated><title type='text'>अमर शहीद</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ScXrmwL85VI/AAAAAAAAAgQ/BISg_q3Qogo/s1600-h/DSC02167.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5315913986183325010" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ScXrmwL85VI/AAAAAAAAAgQ/BISg_q3Qogo/s200/DSC02167.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;अमर ज्योति सन् उन्नीस सौ पैंसठ की एक शाम हर तरफ शान्ति का वातावरण था, किसी तरह की कोई आशंका नहीं थी कि तभी पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण कर दिया। इस अचानक हुए हमले ने भारतीय सेना को चौंका दिया। छुट्टियाँ बिताने अपने-अपने घर गये सैनिकों पर तुरन्त वापस आने के आदेश प्रेषित किए गये।छुट्टियाँ बिता रहे भारतीय सेना के ही एक मेजर को जब सूचना मिली तो प्रस्थान की तैयारी कर उन्होंने माँ को प्रणाम कर पैर छूए। माँ का ममत्व जाग उठा, ऑंखों में जल-कण झलक आये, और उन्होंने बेटे को सीने से लगा लिया। मेजर का गला भी रूँधा गया, पर तुरन्त ही मातृ-भूमि का स्मरण हो आया।युध्द-भूमि को जाते हुए पुत्र के सिर पर हाथ रख, आशीर्वाद देते हुए मां ने कहा-''बेटे, इस समय राष्ट्ररक्षा ही सर्वोपरिर् कत्ताव्य है प्रत्येक भारतीय का, जाओ और अपनेर् कत्ताव्य को दृढ़ता से पालन करो। याद रहे-भारतीय परम्परा सीने पर गोली खाने की है पीठ पर नहीं।''युध्द की विभीषिका भीषण रूप से फैलती जा रही थी। इच्छोगिल नहर का मोर्चा भारतीय सेना के लिए चुनौती की दीवार बना खड़ा था। प्रश्न उठा-इस अभेद्य दीवार को तोड़ने का उत्तारदायित्व कौन संभालेगा?कार्य आसान न था, साक्षात् मौत के साथ जूझना था। पर वीर कभी मौत के भय से रुके हैं! तुरन्त एक वीर ने इसका दायित्व स्वीकार कर लिया। ये गांव से आये हुए वही मेजर थे। मौत की परवाह किए बगैर मेजर ने मोर्चा संभाल लिया और धाीरे-धाीरे आगे की तरफ बढ़ने लगे। सूइंग-सूइंग'-धाड़ाम-धाड़ाम-का दिल दहलाने वाला शोर कानों के पर्दों को फाड़ने की कोशिश कर रहा था।मेजर पर देशभक्ति का जोश पूरी तरह छाया हुआ था। मौके का इन्तजार किया जाय, इतना समय था भी नहीं इसलिए वे धाड़ाधाड़ गोलाबारी कराते हुए, दुश्मन के टैंकों को धवस्त करते आगे बढ़ रहे थे कि तभी दुश्मन की एक साथ कई गोलियां सन-सनाती हुई आई और मेजर के हाथ व पेट में घुस गईं मगर माँ के शब्द ''भारतीय परम्परा सीने पर गोली खाने की है पीठ पर नहीं'' ज्वलन्त प्रेरणा दे रहे थे। वे चोट की परवाह किए बगैर आगे बढ़ते रहे और गोलियाँ आ-आकर उनके सीने में घुसती रहीं। स्थिति को समझते हुए उनके पीछे हटने का आदेश जारी किया गया। पर कदम रुके नहीं, दुश्मन के सारे टैंकों को धवस्त कर, विजयश्री को गले लगाकर ही दम लिया उन्होंने।तुरन्त ही अमृतसर के सैनिक अस्पताल में लाया गया उन्हें। पर अब तक पूरा सीना गोलियों से छलनी हो चुका था। रुंधो गले से अधिाकारियों ने पूछा-''आपकी कोई अन्तिम इच्छा है?''गोलियाँ सीने में कसक रही थीं पर मेजर ने चेहरे पर मुस्कान लाते हुए कहा-''हाँ है, मेरी माँ तक संदेश पहुँचा देना- तुम्हारे बेटे ने गोलियां सीने पर ही खाई हैं, पीठ पर नहीं।''जानते हैं ये बहादुर कौन थे? ये भारतीय सेना के आफीसर-मेजर आशाराम त्यागी थे, जिन्होंने माँ के वचनों का पालन करते हए अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगा दी।दीपक बुझ गया पर उसकी अमर ज्योति युगों तक देश-भक्तों को राह दिखाती रहेगी।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-5793894511856630565?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/5793894511856630565/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=5793894511856630565' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/5793894511856630565'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/5793894511856630565'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/03/blog-post_9595.html' title='अमर शहीद'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ScXrmwL85VI/AAAAAAAAAgQ/BISg_q3Qogo/s72-c/DSC02167.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-6624419624463926532</id><published>2009-03-22T00:29:00.000-07:00</published><updated>2009-03-22T00:34:58.123-07:00</updated><title type='text'>दो मेढक</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ScXqBpnK8AI/AAAAAAAAAgI/e-9oxn9Xu24/s1600-h/well.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5315912249251655682" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ScXqBpnK8AI/AAAAAAAAAgI/e-9oxn9Xu24/s200/well.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;दो मेढक कुछ समय पहले की बात है दो मेढक थे। वे जंगल में तालाब के किनारे एक पेड क़े नीचे रहते थे। एक दिन उन दोनों ने सोचा ''हमने तो बाहर की दुनिया देखी ही नहीं ज़ंगल के बाहर भी तो कुछ होगा। चलो जरा इनसानों की दुनियां में घूम कर आते है।''खाने पीने का थोडा सा सामान लेकर वे दोनो निकल पडे।फ़ुदकते-फुदकते वे जंगल की सीमा को पार करके शहर पहुंचे। वहां उन्होंने बहुत कुछ देखा- बडी बडी ऊंची इमारतें प्रदूषण फैलाते हुए वाहन रोटी कमाने की दौड में भागते हुए लोग ख़ेल कूद और पढाई में मस्त नन्हें नन्हें बच्चे शोर शोर और बहुत शोर। उन्हें अपने घर की याद आने लगी। वे बहुत थक भी गए थे। उनका दिल कर रहा था कि उन्हें पानी मिल जाये और वे एक गीली जगह पर थोडा आराम कर लें। खोजते-खोजते वे एक दूध वाले की दुकान में घुस गए। वहां एक बाल्टी रखी थी। उन्हें लगा कि इस बाल्टी में पानी होना चाहिये फिर क्या था झट से दोनों ने एक ऊंची छलांग लगाई और पहुंच गए उस बाल्टी के अन्दर।पर यह क्या? बालटी में तो पानी नहीं था वह तो मलाई से भरी हुई थी।बेचारे दोनो मेढक उस मलाई में डूबने लगे उनका दम घुटने लगा सांस फूलने लगी आखें पलट कर बाहर आने लगीं।एक मेढक ने सोचा'' मेरा तो अंतिम समय आ गया है हाय रे मेरी किस्मत! शहर आकर इन अनजान लोगों के बीच ही मरना था।'' उसने अपने ईश्वर को याद किया और मौत का इन्तजार करने लगा।परन्तु दूसरा मेढक हार मानने को तैयार नहीं था। वह कोशिश करने लगा कि किसी तरह उस मलाई भरी बाल्टी में से वह बाहर निकल आये। वह अपने पैर जोर से चलाने लगा।बहुत कोशिश करने पर भी वह बार्रबार फिसल जाता। फिर भी उसने अपना दिल छोटा नहीं किया हिम्मत का दामन नहीं छोडा वह लगातार कोशिश करता रहा और अपने पैर चलाता रहा।अरे यह क्या! अचानक उसने देखा कि वह ऊपर उठने लगा। उसके लगातार ज़ोर से पैर चलाने से मलाई भी लगातार हिल रही थी और वह मक्खन बनने लगी। मेढक में उम्मीद की लहर दौड ग़ई। वह बहुत थक चुका था पर फिर भी पैर चलाता रहा।फिर क्या था! मक्खन बनता गया और आखिर में उस मक्खन के ढेर पर सवार वह साहसी मेढक ऊपर उठने लगा। जब मक्खन छाछ के ऊपर तैरने लगा तब उस साहसी मेढक ने बाल्टी से बाहर छलांग लगा दी। अपनी हिम्मत लगन मेहनत और जीने की उमंग के कारण वह बच गया परन्तु निराशावादी मेढक उसी मलाई की बाल्टी में डूब कर मर गया।मुश्किलें सब के रास्ते में आती हैं पर ईश्वर ने हमें उनका मुकाबला करने की शक्ति भी दी है। इसलिये शक्ति से काम लेते हुए साहस बनाए रखना चाहिये। अंत मे जीत उसी की होती है जो कभी हार नही मानता।अधिक बुध्दि या बल ही केवल काम नहीं आते हैं।हिम्मत वाले जीवन का संग्राम जीत जाते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-6624419624463926532?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/6624419624463926532/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=6624419624463926532' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/6624419624463926532'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/6624419624463926532'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/03/blog-post_8499.html' title='दो मेढक'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ScXqBpnK8AI/AAAAAAAAAgI/e-9oxn9Xu24/s72-c/well.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-8044472539655082588</id><published>2009-03-22T00:24:00.000-07:00</published><updated>2009-03-22T00:29:40.366-07:00</updated><title type='text'>बहादुर खरगोश</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ScXoxLYDA2I/AAAAAAAAAgA/kMoFiemWYuA/s1600-h/nat2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5315910866745623394" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ScXoxLYDA2I/AAAAAAAAAgA/kMoFiemWYuA/s200/nat2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बहुत बहुत समय पहले कुछ दुष्ट राक्षसों ने सोचा कि क्यों न सूरज को ही चुरा लिया जाए। वे चाहते थे कि सूरज केवल उनके पास रहे और उनके लिये चमके और बस उन्हें ही गर्मी दे। उन्हें बाकि की दुनिया की जरा भी चिन्ता न थी कि बाकि के स्थानों के लोग क्या करेंगे सूरज के बिना?जब उन्होंने सूरज चुराने का निर्णय कर ही लिया तब उन्होंने एक आसमान तक पहुँचने वाली लम्बी, बहुत लम्बी सीढी बनाई और एक लम्बा, बहुत लम्बा भाला बनाया। सीढी पर चढ वे आसमान पर पहुँचे और भाले को जोर से फेंक कर सूरज के अन्दर धंसा दिया। अब भाले पर मजबूत रस्सी बांध कर वे उसे पूरी ताकत से खींचने लगे। और घंटों की खींचातानी के बाद आखिरकार वे सूरज को आसमान से जमीन पर खींच लाने में सफल हो गये।ऐसे में आर्कटिक की बर्फ से घिरे क्षेत्र टुण्ड्रा के लोग बहुत नाराज और दु:खी हुए। सूरज के बिना उनका स्थान और ठण्डा और अंधेरा और हो चला था। खाने के सामान, पौधे, फलों और शिकार कर खाये जाने वाली मछलियों तथा जानवरों की कमी से वे भूखे मरने लगे। सूरज की अनुपस्थिति की वजह से न तो चन्द्रमा और न तारे निकल रहे थे। वे भी तो सूरज के प्रकाश से चमकते हैं। घनघोर अंधेरे में कभी कभी उत्तर में चमकने वाले प्रकाश से थोडा बहुत प्रकाश आ जाया करता था।तब परेशान होकर बुध्दिमान और समझदार स्नोई उल्लू ने जानवरों की सभा बुलाई और कहा -'' भाईयों, हम सब घने संकट में है। यह वह समय है जब कि किसी एक बहादुर जानवर को सामने आना होगा और सूरज को लाने का कठिन और साहसिक काम करना ही होगा। वह कौन हो, आपमें से सामने आए।पहले सामने आने का साहस करने वाला भालू था। वह निकल पडा सूरज लाने। जब वह थोडी दूर तक गया तो उसे भूख लगने लगी। भूख के मारे उसके पेट में से आवाजें आने लगीं। वह भोजन के बारे में ही सोचता रहा और यह सोच कर खाना ढूंढने निकल पडा, कि वह पेट भर कर ही आगे जाएगा, न जाने कितना समय लग जाए सूरज लाने में। उसे बहुत देर लगी खाना ढूंढने तथा उसके बडे मोटे पेट को भरने में। इस चक्कर में वह सूरज लाने के बारे में भूल ही गया। सारे जानवर उसकी प्रतीक्षा करते रहे पर वह पेट भर कर खाकर आलस में घिर कर सो गया था।उसके बाद भेडिया आगे आया। उसने बोला -'' मैं बहादुर और मजबूत हूँ।वह भी सूरज लाने चल पडा। पर हवा इतनी ठण्डी, तेज और तीखी थी कि वह काँपने लगा। वह ठण्ड से बचने के लिये एक गुफा में जाकर सो गया।बहुत हफ्ते गुजर गये, भेडिया शर्म के मारे लौटा ही नहीं। जानवरों की हालत ठण्ड और अंधेरे तथा भूख से बहुत खराब हो चली थी। तब एक और सभा बुलाई गयी। स्नोई उल्लू ने कहा कि -''हम स्नोशू खरगोश जो कि बर्फ में देर तक चलने में माहिर है को भेजते हैं। वह तेज गति से चलता है और वह जरा भी स्वार्थी नहीं है।स्नोशू खरगोश कूदता-भागता, फांदता पहाडों पर चढ ग़या। वहाँ बहुत ठण्ड थी और तीखी ठण्डी हवा तीखी सुईयों की तरह चुभ रही थी। उसके जूते जम गये थे बर्फ में, पर वह रुका नहीं, जूते वहीं छोड चल पडा। उसे भूख लगी उसने हरी घास देखी जो कि टुण्ड्रा में मिलना दुर्लभ थी पर उसने खाने में समय गंवाना उचित न समझा और वह आगे चल पडा।अब एक बर्फीली सुरंग में उसे सूरज की किरणें झांकती दिखाई दीं। वह सुरंग के अन्दर गया। जब सुरंग खत्म हो गयी तो उसने आगे झांका - सूरज एक बडे हांडी नुमा बर्तन में रखा था। वो राक्षस सूरज को घेरे सो रहे थे। वह चुपके से भागता हुआ गया और उसने उस बडे ग़ोल बर्तन को धक्का मारा, सूर्य उसमें से फिसल कर निकल गया और लुडक़ने-पुडक़ने लगा, एक आग के बडे ग़ोले की तरह। उसने सूरज को एक और धक्का मारा तो वह और तेजी से लुडक़ने-पुडक़ने लगा।स्नोशू खरगोश भी तेजी से उसके पीछे भागा। हलचल से वे राक्षस जाग गये। वे स्नोशू खरगोश के पीछे भागने लगे। स्नोशू खरगोश को पता था कि अगर राक्षस उसे पकड लेंगे तो जरूर उसे मार डालेंगे, वह और तेजी से भागा। वे उसके पास पहुंचने को थे। उसने हिम्मत से काम लिया उसने सूरज को पैर से एक जोरदार धक्का लगाया कि उसके बहुत से टुकडे तो बिखरे मगर वह आसमान में अपने स्थान पर पहुंच गया। सबसे बडा टुकडा बना सूरज, और दूसरा बडा टुकडा बना चन्द्रमा और बाकि जो छोटे टुकडे बिखरे वह तारे बन आकाशगंगा में चले गए।उसके बाद स्नोशू खरगोश वापस लौटा तो सारे जानवरों ने उसका जोरदार स्वागत किया।सबने धन्यवाद कहते हुए उसकी तारीफ के पुल बांध दिये। टुण्ड्रा के जंगल में फिर से खुशहाली छा गई।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-8044472539655082588?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/8044472539655082588/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=8044472539655082588' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/8044472539655082588'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/8044472539655082588'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/03/blog-post_3120.html' title='बहादुर खरगोश'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ScXoxLYDA2I/AAAAAAAAAgA/kMoFiemWYuA/s72-c/nat2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-1258232702343085992</id><published>2009-03-22T00:10:00.001-07:00</published><updated>2009-03-22T00:16:26.369-07:00</updated><title type='text'>कौआ और बटेर</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ScXlsz_CsxI/AAAAAAAAAf4/43R8ZmvNnEQ/s1600-h/brhma.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5315907493212369682" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ScXlsz_CsxI/AAAAAAAAAf4/43R8ZmvNnEQ/s200/brhma.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक पेड़ पर एक कौआ और एक बटेर रहते थे। एक बार पक्षियों को यह सूचना मिली कि गरूड़ भगवान सागर तट पर पधार रहे हैं, तो सब पक्षी इकट्ठे होकर उनके दर्शनों के लिए सागर तट की ओर चल दिए। जिस मार्ग से वे दोनों जा रहे थे, उसी राह पर जाता उन्हें एक ग्वाला मिला। उसने अपने सिर पर दही का मटका रखा हुआ था। कौए ने ग्वाले के सिर पर रखे दही के मटके को देखा तो उसके मुंह में पानी भर आया। फिर क्या था, कौआ उस दही को खाने के लिए नीचे उतर आया। खाने के लोभ में वह यह भी भूल गया कि वह इस समय गरूड़ जी के दर्शनों के लिए जा रहा है। कौआ उस मटके पर बैठकर बड़े मजे से दही खाने लगा। कुछ देर बाद ही ग्वाले को भी पता चला गया कि उसके मटके में से कोई दही खा रहा है। कौआ बहुत चालाक होता है, वह पल भर में दो-चार चाेंच दही में मारता और उड़ जाता। थोड़ी देर के बाद फिर आ जाता। इसी प्रकार ग्वाले के चलते-चलते कौआ अपना काम करता रहा। बटेर ने कौए को ऐसा करने से मना भी किया, परन्तु कौआ कहां किसी की बात सुनता है, वह तो सदा यही सोचता है कि मुझसे बड़ा बुध्दिमान कोई नहीं। ग्वाले ने कई बार चलते-चलते हाथ उठाकर दही चोर को पकड़ने की चेष्टा भी की, किन्तु कौआ उसके हाथ नहीं आया। ग्वाले से जब दही चोर पकड़ा नहीं जा सका तो उसने दही का मटका सिर से उतारकर नीचे रख दिया। फिर वहीं एक ओर छुपकर बैठ गया और दही चोर का इंतजार करने लगा। उसने देखा कि ऊपर वृक्ष पर कौआ और बटेर बैठे हैं। ग्वाला समझ गया कि यही दही के चोर हैं। क्रोध से भरे ग्वाले ने पास पड़ा एक पत्थर उठाकर उन पर खींच मारा, जैसे ही कौए ने ग्वाले को पत्थर उठाते देखा तो वह झठ से उड़ गया मगर बटेर बेचारा उड़ न सका और वह पत्थर सीधा जाकर बटेर को लगा। पत्थर लगते ही बटेर के मुंह से एक दर्द भरी चीख निकली। इसके साथ ही वह धरती पर गिर पड़ा और अपने जीवन की अंतिम सांस लेते हुए बोला-'पापी कौए। तूने मुझे बेकार मरवा दिया।' &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-1258232702343085992?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/1258232702343085992/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=1258232702343085992' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/1258232702343085992'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/1258232702343085992'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/03/blog-post_22.html' title='कौआ और बटेर'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ScXlsz_CsxI/AAAAAAAAAf4/43R8ZmvNnEQ/s72-c/brhma.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-9193256434398995054</id><published>2009-03-21T23:59:00.000-07:00</published><updated>2009-03-22T00:02:05.350-07:00</updated><title type='text'>आत्म विश्वास</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ScXiTiZc9PI/AAAAAAAAAfw/-_xMf3BWPAM/s1600-h/37.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5315903760459691250" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 144px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ScXiTiZc9PI/AAAAAAAAAfw/-_xMf3BWPAM/s200/37.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;आत्म विश्वास&lt;br /&gt;''आत्म विश्वास'' व्यक्ति को महान बना देता है। व्यक्ति को जीने की तरीका सिखाता है। उसे जिंदगी की कठिन राहों पर दृढ़ विश्वास के साथ चलना सिखाता है। ये सब बातें किताबी ढकोसला लगती थीं। क्योंकि जब व्यक्ति स्वयं उन स्थितियों से गुजरता है तब उसे समझ आता है कि आत्मविश्वास बहतु बढ़ी धरोहर है।&lt;br /&gt;घर से चार, पांच किलोमीटर दूर एक कालेज में साइकिल से जाया करती थी क्योंकि उस समय स्कूल कालेज साइकिल से जाना बड़े गौरव की बात मानी जाती थी। कालेज के रास्ते में एक बस्ती में हमारे दूर से भी दूर के एक रिश्तेदार रहते थे बड़े मनचली प्रवृत्ति के स्वामी थे। एक बार किसी पारिवारिक उत्सव में छोटी सी मुलाकात होने पर उन्होंने अपने मन में जाने क्या क्या ख्वाब बुनना शुरू कर दिया। जब भी मौका मिलता हमारे घर आ टपकते शुरू में तो रिश्तेदारी का लिहाज चलता रहा लेकिन शीघ्र ही उनकी प्रकृति को समझकर उन्हें दूर कर दिया और हम सभी भाई बहनों ने उन्हें घास डालना बंद कर दिया। सिर्फ मां, पापा उनकी चिकनी चुपड़ी बातें में रस लिया करते थे। काफी समय तक अपनी इच्छा अधूरी ही रहती देख महाशय ने अपने एक गुण्डे दोस्त को हमें परेशान करने के लिये पीछे लगा दिया। उन दिनों कालेज से वापस आने का समय दोपहर 2 बजे के करीब होता था। कुछ समय तक तो कई सहेलियां साथ रहती और आगे चलकर सब अपने-अपने मुकाम पर मुड़ जाती। मैं सरपट साइकिल दौड़ती और धूर्त लड़का मेरा पीछा करता हुआ जाने क्या-क्या बोलता रहता। उसकी ये सब हरकतें कभी पसन्द नहीं आतीं। कभी सोचती कितना पागल इंसान है, ईश्वर इसे सद्बुध्दि दे, लेकिन दिन पर दिन वह अपनी सभ्यता और संस्कृति और अपने संस्कारों से परिचित कराता रहा। चूंकि मैं अपने घर में सबसे बड़ी थी, इसलिए किससे शिकायत करती कि कोई मूर्ख मुझे परेशान कर रहा है। मां को सब बातें बताई तो बोली बेटा सबके साथ आया करो, तुम्हारे पापा से क्या कहूं, कहीं दो धर्म से झगड़ा न हो जाय किसी को पता चलेगा तो बात बढ़ जावेगी इसलिए तुम चुप ही रहना एक न एक दिन वो समझ जायेगा और मान जायेगा। उस दुष्ट व्यक्ति का डर इस तरह मन में समा गया कि हर जगह वहीं दिखाई देने लगता उसका असर पढ़ाई पर भी होने लगा। आखिर एक दिन सोचा कि पुलिस में रिपोर्ट कर दूंगी लेकिन दूसरे पल सोचा लड़की हूं सब लोग मुझे ही गलत समझेंगे कालेज जाना बंद हो जायेगा और चुप रह जाती।&lt;br /&gt;इसी तरह बड़ी संघर्षमय स्थिति चल रही थी कि एक दिन कालेज में एक लड़की जो मेरे विषय में ही पढ़ाई कर रही थी किसी दूसरे शहर से आने जाने के कारण परेशान थी और कालेज के पास ही रहना चाहती थी। मैं उसकी समस्या से इतनी द्रवित हो गई कि अपने घर में रहने का निमंत्रण दे दिया और इम्तहान होने तक करीब दो माह उसे आसरा दे दिया। अभी तक तो मैं ही इस स्थिति से जूझ रही थी अब वो भी इसमें शामिल हो गई और मेरे साथ कालेज से घर तक दौड़ लगाती रहती। एक बार भीड़ भरे, माहौल में उस असमान्य व्यक्ति ने पास में अपनी गाड़ी रोकी और बोला कि ''जो चीज हमें आसानी से नहीं मिलती उसे हम छीन लेते हैं।'' उसने किसी पिक्चर का डायलाग बोला और हमारे दिल दिमाग पर ज्वालामुखी जैसे फोड़ दिया हो। उसे हमारा रोज का रास्ता मालूम था इसलिए आज एक नया तीसरा रास्ता घर तक जाने के लिए चुना उस समय बराबर इस चीज का अनुभव हो रहा था कि लड़कियों को समाज में स्वयं अपना वजूद जिंदा रखने के लिए क्या कुछ नहीं करना पड़ता। बेटी होना अभिशाफ ही लगने लगा था। अब हम दो लड़कियां अपनी लड़ाई स्वयं लड़ रही थीं, अपने सम्मान की लड़ाई। आत्मविस्वास को दृढ़ करने की अदा सीख रहीं थीं। पहले सोचा रिक्शा कर लेते हैं, रिक्शा भी धीरे-धीरे में चलता है तब हम कैंटूनमैंट के रास्ते से पैदल ही एक नया रास्ता बनाते हुए घर की ओर जाने लगे। उस दिन हमारा आखिरी इम्तहान था। सूनी सड़कों पर घूमने वाले सिपाही बार बार हमारी तरफ देखते थे कि लड़कियां यहां क्यों घूम रही हैं कुछ ऐसे रास्तों पर भी घुस गये जहां प्रवेश निषेध था। बड़ी मुश्किल से घर तक गये। रास्ते में ईश्वर का शुक्रिया अदा करते रहे।&lt;br /&gt;कैसी विलक्षण स्थिति पैदा हो जाती है कि अपने ऊपर अत्याचार, किसी के द्वारा जबर्दस्ती करते देखते हुए भी इंसान कुछ कर पाने में असमर्थ होता है। उस संघर्षमय स्थिति का वो आखिरी दिन था लेकिन मैंने कहीं भी किसी भी स्थिति में स्वयं को टूटने नहीं दिया। प्रथम श्रेणी में पास हुई, लेकिन आत्मविश्वास रूपी जो मोती मेरे अंदर जन्मा वो जीवन पर्यन्त अमर रहेगा ऐसा विश्वास है। बुध्दि और हिम्मत से कार्य करें तो सफलता अवश्य मिलेगी। आत्मविश्वास सुदृढ़ रखें तो जीत होगी ही। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-9193256434398995054?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/9193256434398995054/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=9193256434398995054' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/9193256434398995054'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/9193256434398995054'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/03/blog-post_21.html' title='आत्म विश्वास'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ScXiTiZc9PI/AAAAAAAAAfw/-_xMf3BWPAM/s72-c/37.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-1013901328411266913</id><published>2009-03-11T02:09:00.000-07:00</published><updated>2009-03-11T03:59:12.804-07:00</updated><title type='text'>बेटी</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SbeXEUZsPQI/AAAAAAAAAfA/Ael5Las0qTU/s1600-h/DSC00747.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5311880385958526210" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SbeXEUZsPQI/AAAAAAAAAfA/Ael5Las0qTU/s200/DSC00747.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;भारतीय समाज मैं बेटी को ऊँचा दर्जा प्राप्त है , बेटी को लक्ष्मी , दुर्गा , काली , कल्याणी आदि न जाने कितने नामों से पुकारा जाता है । इसके बावजूद घर मैं यदि बेटी आ जाय तो साँस खींच ली जाती है । जबकि बेटी पैदा करने वाली भी एक बेटी ही होती है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बाबूजी को तो छः बार साँस खीचनी पड़ी थी , एक के बाद एक छः लड़कियों से घर भर गया था । जबकि वे चाहते थे की चार पञ्च लड़के हों , जो जमीन जायदाद संभालें । बड़ी मुश्किल से दो बेटे ही हाथ लग पाए । बड़े जतन के बाद बड़ी बेटी की शादी हो गई । सब सोचते थे अब , सब आसन हो जाएगा ।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;दूसरी बेटी पढ़ाई के बाद घर बैठी थी , रोज सुबह उठाना , दैनिक कार्य करना और चची के घर दौड़ लगा देना , शाम तक यही &lt;span class=""&gt;क्रम &lt;/span&gt;चलता था । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मैं , पुँछ बैठती क्यों ? कहीं लड़का देखा जा रहा है या नहीं , तो बोल देती अरे !! हम तो गाय हैं जहाँ बाँध देंगे , वहीं बाँध जाएँगी । जाने कब तक मिल पायेगा , देखते ही हैं बस , ठंडी साँस लेकर हम सब एक दूसरे का चेहरा देखने लगते और जोर से हंस पड़ते । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;हम सबके बीच मुनिया इतनी अपनी थी &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;माँ &lt;/span&gt;उसके लिए खाने का हिस्सा अलग रख देतीं । हमारे कपड़े &lt;span class=""&gt;निकाल &lt;/span&gt;कर पहन लेती , कभी जब स्कूल कि फीस के लिए बाबूजी मन करते तब मुनिया माँ के पास आकार हाथ फैला देती । माँ , हमारे साथ उसकी फीस भी भर देतीं । किताबें दिला देतीं । पुराने बक्से की तली से पैसों को बटोर कर माँ उनका काम चला देतीं । कभी हम कहते माँ , इतना क्यों करती हो ? अरे !! एक दिन याद करेंगी &lt;span class=""&gt;चाची &lt;/span&gt;को । और अपने काम मैं मशगूल हो जातीं ।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मेरी शादी को दस बरस बीत गए लेकिन मुनिया अभी तक मुझे दरवाजे की ओट से ही खड़ी मिल जाती है ।एक शादी के अवसर पर मुनियाँ के साथ कुछ पल बिताने को मिल गए । मिलते ही गले से चिपक गई , देर तक रोटी रही , तुम लोग तो अपने घर चली गई हो , पर मैं तो अभी भी एक विधवा जैसा समय बिता रही हूँ । न कोई खुशी , न कोई उत्साह । मैं सोचने लगी हाँ , हम सब एक साथ पढ़ाई करते थे , बड़े हुए , शादी हो गियो लेकिन मुनिया अभी तक क्यों नही मुक्त हो पा रही है अपने कौमार्य से । अगर बेटा होती तो जायदाद से हिस्सा मांग लेती और ठाठ से जीवन जी लेती लेकिन एक लड़की हूँ वो भी जमीदार खानदान तो , कही जा भी नही सकती । न तो पूजापाठ &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;मन लगता है और न घर के काम में ही । छोटी बहनें मुझे रोड़ा समझती हैं । अब तू ही बता , क्या करून ? देखती हूँ ईश्वर कबतक परीक्षा लेता है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बाबूजी तो कोई कसर नही छोड़ रहे लेकिन क्या करें ? कहीं रिश्ता ही नही जुड़ रहा ।सुबह निकाल जाते हैं रात को घर में घुसते हैं , मुझे उन पर भी तरस आता है । मुनिया बाबूजी को साफ़ बचा ले गई । बेटी का बाप के प्रति प्यार की यही इन्तहा है । जो किसी भी कीमत पर कम नही होता । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रात भर बिना अवरोध के मुनिया अपने दिल की बात मेरे सामने उडेलती रही । &lt;span class=""&gt;मैं &lt;/span&gt;निःशब्द सी हाँ हूँ करती रही । गलों तक बहे आंसुओं को पोंछती रही । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;अब मेरे पास भी दो बेटियाँ हैं , मुनिया ने उन्हें प्यार से पाला है । कभी जब बाहर बरांडे &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;बैठी पौधों को निहारती हूँ या घर के ओटले पर चिडिया के हर साल बनाये घोंसले से बेटी के जीवन का सच दिखाई पड़ जाता है । अंडे से चूजे , फ़िर छोटे -छोटे पंख और एक दिन चिडिया बन जो हवा में उडी तो फ़िर साल भर बाद घोंसला बनाने ही छत की मुडेर पर दिखाई पड़ती है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;जब कमरे में &lt;span class=""&gt;मैं &lt;/span&gt;सोई होती तब मुनिया मेरे सिरहाने उठने का इंतजार करती रहती और करवट बदलते ही पुँछ लेती चाय पीनी है मैडम !! कभी सरीला राग छेड़ देती , कभी आस -पास की खबरें सुनाने लगती । मैं , सोचती कितनी अच्छी माँ बनेगी मुनिया । मेरे साथ पूरा काम ख़तम करवा लेती । आज पन्द्रह साल बाद भी वही शिकायते , वही एकाकीपन , घुटन , पीड़ा और जाने क्या -क्या बबाल लिए हमेशा दरवाजे पर खड़ी मिल जाती । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मेरा दिल उसके लिए नतमस्तक होता है । भारतीय बेटी ऐसी ही होतीं हैं । बिल्कुल पृथ्वी जैसी विशाल &lt;span class=""&gt;ह्रदया। &lt;/span&gt;ईश्वर उसके जैसी बेटी सभी को दे । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मानवीय रिश्तों की प्रगानता भारतीय परिवेश में ही बसी है । रिश्ते एक जादुई शक्ति से बंधे रहते हैं । कष्ट सहकर भी बेटी माता -पिता के मान को खंडित नही होने देती । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू ......&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-1013901328411266913?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/1013901328411266913/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=1013901328411266913' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/1013901328411266913'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/1013901328411266913'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/03/blog-post_7260.html' title='बेटी'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SbeXEUZsPQI/AAAAAAAAAfA/Ael5Las0qTU/s72-c/DSC00747.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-2225683180942367111</id><published>2009-03-11T01:21:00.000-07:00</published><updated>2009-03-11T02:07:42.672-07:00</updated><title type='text'>डर</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/Sbd-X8EqhKI/AAAAAAAAAe4/cSX_-wnLovo/s1600-h/16022008578-001.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5311853235234571426" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/Sbd-X8EqhKI/AAAAAAAAAe4/cSX_-wnLovo/s200/16022008578-001.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बाल्यावस्था मेंबच्चे कुछ गलती करते हैं , उससे बचने के लिए या बड़ों की डांट से बचने के लिए कुछ ऐसा के बैठते हैं जो बाल अपराध की श्रेणी में आ जाता है । मनोवैज्ञानिक कहते हैं &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;बच्चा डर के कारण गलती कर देता है । माता -पिता से छुपाने के लिए झूंठ भी बोलता है । एक गलती को छुपाने के लिए अनेक गलतियों के चक्र में फंसता जाता है ।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;उत्तर प्रदेश का जल हीन गाँव , जहाँ कोसों दूर तक पीने का पानी नही मिलता था । सातवीं क्लास में आने पर हम लोग कूंए से पानी लेकर आते थे क्योंकि मीठा पानी होगा तभी खाना बन पायेगा । &lt;span class=""&gt;माँ , &lt;/span&gt;घर &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;बहु थीं इसलिए घर से बाहर नही जा सकती थीं । फ़िर भी कभी -कभी माँ हमारे साथ कूए तक जतिन थीं । कही बेटी कूंए में गिर न जाए । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;परिवहन का कोई साधन नही था , सड़कें बनी नहीं थीं , पहली बार जब गाँव वालों ने बिजली &lt;span class=""&gt;देखी &lt;/span&gt;तो खुशी का ठिकाना ही नही रहा । गाँव से तीन मील दूर से पानी भरकर लाना पड़ता था । सुबह माँ नाश्ता बनाकर देती और हम अपने काम पर लग जाते थे । कोयले की अंगीठी &lt;span class=""&gt;जलाना &lt;/span&gt;ही टेडी बात होता था , गली के बाहर रखी अंगीठी सबकी आँखें लाल कर देती थी । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सुबह की भागम भाग में स्कूल जाते , नौ बजे स्कूल की घंटी बज जाती , रास्ते में सरपट दौड़ लगाई जाती जैसे किसी मैराथन में भाग लेना हो । कई बार गेट के बाहर ही खडा रहना पड़ता । देर से आने वाले बच्चों को प्रधानाचार्य के रूम के बाहर ही उठक बैठक लगनी पड़ती । कभी जब , भीड़ बढ़ जाती तब गेट पर खड़ी &lt;span class=""&gt;बुडिया &lt;/span&gt;को खिसकाकर अन्दर घुस जाते । अजीव स्तिथि थी हम , दांव खेलने में माहिर हो गए थे । परिपक्व इन्सान क्या कुछ नही कर सकता सोचनीय है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;ऐसी काम के बोझ से घिरी जिन्दगी में अंग्रजी का होमवर्क करना भूल गए । रास्ते में एक सहेली ने बता दिया की टीचर बहुत सख्त है , सजा देतीं हैं । बस फ़िर क्या &lt;span class=""&gt;था, &lt;/span&gt;काटो तो खून नही , अंग्रेजी विषय वैसे ही हमारे लिए रोज शूली पर चड़ने जैसा काम था , एक तो समझ से बाहर ऊपर से न पढने की गलती । हम उसी समय घर वापस आ गए । रास्ते में ही सोच लिया ,माँ से कह देंगे छुट्टी हो गई थी । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;घर आकार माँ से बड़ी सफाई से झूंठ बोल दिया । माँ भी समझ नही पैन । दूसरे दिन भी स्कूल नही गई तब माँ का दिमाग ठनक गया । उन्होंने पास के बच्चों से पता लगाया &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;माजरा क्या है ? पता चला छुट्टी नही है । माँ ने अपने सामने बिठाया और पूछा अब , बताओ क्या बात है , कब तक झूंठ बोल पाती , सारी बात सच बता दी ।माँ ने कहा डरने &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;बात नही है हम जाकर मिल लेंगे तुम अपनी पढ़ाई का हर्जा मत करो । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;उस दिन माँ की बात दिल के भीतर तक बैठ गई । जब स्कूल गई तब टीचर को याद भी नही था क्या काम दिया था । &lt;span class=""&gt;मैं &lt;/span&gt;अपने आप से दूर हो गई थी , डर के कारण किसी से बात नही कर रही थी । माँ ने ऐसा साहस भर दिया &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;पढ़ाई के प्रति चैतन्य हो गई । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बच्चे हमेशा इस तरह &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;स्तिथि से गुजरते हैं , हमें अधिक समय तक डर के साये मैं नही रहना चाहिए । किसी बड़े को अपनी बात जरूर बता देनी चाहिए । डर कभी हमारा दुश्मन नही बन पायेगा । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;डर हमारी मानसिक कमजोरी को दर्शाता है , हमें स्वयं पर और बड़ों पर भरोसा रखना चाहिए । कभी कमजोर नही पड़ना चाहिए । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू ......&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-2225683180942367111?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/2225683180942367111/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=2225683180942367111' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/2225683180942367111'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/2225683180942367111'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/03/blog-post_11.html' title='डर'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/Sbd-X8EqhKI/AAAAAAAAAe4/cSX_-wnLovo/s72-c/16022008578-001.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-1140632567245283709</id><published>2009-03-10T06:55:00.000-07:00</published><updated>2009-03-10T07:32:17.361-07:00</updated><title type='text'>जंगल की होली</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SbZ5c7OypnI/AAAAAAAAAeo/rluTT_OBBZQ/s1600-h/bechara_sher.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5311566348373108338" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 196px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SbZ5c7OypnI/AAAAAAAAAeo/rluTT_OBBZQ/s200/bechara_sher.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;नंदनवन &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;भी इस बार होली की तयारी शुरू हो गई हैं , ऊँट और जिराफ तो खुश है क्योंकि उन्हें तो कोई रंग लगा ही नही सकता , ऊँचे कद वाला कोई दोस्त ही रंग लगा सकता है । मणि हाथी जरा शैतान है , अपनी सूंड में गन्दा पानी भरकर सबके ऊपर डाल देता है । तभी गीदड़ और लोमडी जंगल के राजा शेरखान के पास आ गए , और होली के बहाने दावत उडाने की योजना पर विचार करने लगे । पास ही एक झाड़ में छुप कर मन्नू खरगोश सारी बात सुन रहा था । उसे सिर्फ़ समझ आ रहा था &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;गाय , नीलगाय ,हिरन का गोस्त ...तब उसे लगा कि यह कोई घिनोनी योजना बनाई जा रही है ।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मन्नू भागता हुआ मणि के पास गया , मन्नू खरगोश डर से काँप रहा था , मणि ने उसे पानी पिलाया फ़िर पूछा अब बता क्या हुआ ? मन्नू ने शेरखान वाली सारी बात बता दी । मणि बोला -तुम अब किसी से बात मत करना , &lt;span class=""&gt;मैं &lt;/span&gt;सब देख लूँगा । सभी जानवर एक खुले मैदान &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;एकत्र होने लगे और एक दूसरे को रंग डालने लगे , खाने के लिए रखी ढेर सारी मिठाई , कीडे , भंग ,सब चीजें मजे के साथ खाई जा रहीं थीं । हिरन के पास लोमडी आकार उसे भंग खिला रही थी , यह देखकर मणि ने , राजा बन्दर को उसके पास भेजा , जाओ और लोमडी को इतनी भंग पिला दो कि दो दिन तक उठ न सके । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;तभी गीदड़ नशे में आकार बोलने लगा - तुम सब , मानलो कितनी होली मनाना चाहते हो , शेरखान को आने दो तब पता चलेगा , तुम सब का नामोनिशान मिट जाएगा । नशे में सारी बातें जोर से कहने लगे , शेरखान के आने पर मणि ने होली कि बधाई दी , शेरखान धीरे से खरगोश की &lt;span class=""&gt;ओर &lt;/span&gt;बढ़ा तो मणि &lt;span class=""&gt;सामने &lt;/span&gt;आ गया , हिरन की ओर गया तो गैंडा आगे आ गया , लोमडी औरसियार नशे में धुत्त बोलते ही जा रहे थे । शेरखान समझ गया &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;हमारी योजना ध्वस्त हो गई है । सभी बड़े जानवरों से होली मिलकर शेरखान वापस &lt;span class=""&gt;मांद &lt;/span&gt;में चला गया । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सारे जानवर खुशिया मना रहे थे । दोनो &lt;span class=""&gt;दुष्ट &lt;/span&gt;दोस्तों को एक पेड के पास बाँध दिया था । सब एक साथ बोल रहे थे बुरा न मानो होली है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू ....&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-1140632567245283709?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/1140632567245283709/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=1140632567245283709' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/1140632567245283709'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/1140632567245283709'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/03/blog-post_10.html' title='जंगल की होली'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SbZ5c7OypnI/AAAAAAAAAeo/rluTT_OBBZQ/s72-c/bechara_sher.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-2183568803594701482</id><published>2009-03-07T00:32:00.000-08:00</published><updated>2009-03-07T01:20:11.545-08:00</updated><title type='text'>मंगलू की सीख</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SbI7F0arRvI/AAAAAAAAAaw/oIA8AxM_IY8/s1600-h/1081685-Camel-farming-0.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5310371881779152626" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SbI7F0arRvI/AAAAAAAAAaw/oIA8AxM_IY8/s200/1081685-Camel-farming-0.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सहारा रेगिस्तान के पास एक गाँव &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;नन्हा मंगलू अपनी &lt;span class=""&gt;माँ &lt;/span&gt;के साथ रहता था । एक दिन मालिक की बेटी की शादी हुई तब , मालिक ने करीब सौ ऊँट बेटी की विदाई के समय भेंट कर दिए , मंगलू अपनी माँ से अलग हो गया , माँ ऊंटों के झुंड के साथ दूर चली गई । एक दिन मालिक ने मंगलू को आंसू बहते हुए देखा , कभी वह झाडियों में घुस जाता , कभी जंगल में भटक जाता , मालिक ने उसे एक बुजुर्ग ऊँट के साथ बाँध दिया , तब से वह और अधिक रोने लगा । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक दिन बूढे ऊँट ने मंगलू की पूरी दास्तान सुनी और उसे रस्सी खोलकर आजाद कर दिया । कहा जाओ तुम अपनी माँ को खोज लो । नन्हा ऊँट इधर -उधर भटकता रहा और एक दिन माँ के पास जा पहुँचा । उसकी माँ अन्तिम घडियां गिन रही थी , बच्चे को देखते ही वह ठीक होने लगी और मंगलू को पास बुलाकर जिन्दगी कुछ फलसफे समझाने लगी । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;उसने बताया &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;तुम्हारा भाई उत्तर &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;दिशा में गया है , मेरे मरने के बाद तुम उसके पास चले जाना । उसकी गर्दन पर लंबे बाल हैं , तुम उसे पहचान लोगे , किसी &lt;span class=""&gt;रेत &lt;/span&gt;के टीले पर मत सोना , लोगों के पड़ाव के पास भी मत जाना , हमेशा ढलानों के दक्षिण में ही सोना । भाई के साथ जैसा भाई कहे वैसा ही करना । हमेशा काफिले के बीच में ही रहना , इतना कहते ही माँ की आँखें बंद हो गईं । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;दूसरे दिन मंगलू भाई की तलाश में गया । उसने माँ के कही हर बात का उल्टा ही किया , जबकि माँ की कही एक -एक बात उसे याद थी । उसने टीले के ऊपर सोना चाहा लेकिन जब रेत आंखों में घुसने लगा तब वह जगह छोड़ी । पढाव के पास गया और सो नही पाया क्योंकि कीडे मकोडों ने सोने ही नही दिया , फ़िर उसने माँ की कही हर बात पर ध्यान दिया । चार दिन बाद वह अपने भाई से मिल गया । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;अब मंगलू खुश था उसने काफिले से बाहर ही चलना शुरू किया , पर जब ऊंटों ने उसे टाँगें &lt;span class=""&gt;मारना &lt;/span&gt;शुरू की तब उसे समझ आया &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;झुंड के बीच में ही चलना चाहिए , माँ की हर बात अब उसके &lt;span class=""&gt;जहन &lt;/span&gt;में बैठ चुकी थी । भाई के साथ खुशी से रहने लगा । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;हमें अपने बड़ों की बातें ध्यान से सुनकर उनपर अमल करना चाहिए । कभी लापरवाही नही करनी चाहिए । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू ....&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-2183568803594701482?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/2183568803594701482/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=2183568803594701482' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/2183568803594701482'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/2183568803594701482'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/03/blog-post_07.html' title='मंगलू की सीख'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SbI7F0arRvI/AAAAAAAAAaw/oIA8AxM_IY8/s72-c/1081685-Camel-farming-0.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-5759636514021854568</id><published>2009-03-06T23:40:00.000-08:00</published><updated>2009-03-07T00:30:50.870-08:00</updated><title type='text'>शैतान चिडिया</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SbIwRKZ3FKI/AAAAAAAAAao/xvgWeWDd7Ig/s1600-h/tweety.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5310359982031967394" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 150px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SbIwRKZ3FKI/AAAAAAAAAao/xvgWeWDd7Ig/s200/tweety.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक घने जंगल &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;रानी नाम की एक शैतान चिडिया नीम के पेड पर अपना घर बना कर रहती थी । उसके पास ही और भी पंछी रहते थे , सब उसकी हरकतों से परेशान हो जाते थे । एक बार मोती नाम के हाथी की पीठ पर उसने खरोंच मार दी , &lt;span class=""&gt;हाथी &lt;/span&gt;को दर्द होने लगा , मोती ने सोचा &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;इस रानी को तो सबक सिखाना ही पड़ेगा तभी चिरकुट नाम के बन्दर ने मोती &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;पीठ पर उछल कूद शुरू करदी जिसके कारण मोती को बहुत कष्ट हुआ । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;शाम को मोती के आदेश पर एक सभा का आयोजन किया गया , वहां सभी पशु पंछियों को आना पड़ा , दादू नाम के शेर ने मंच पर अपना आसन जमा लिया , बड़े ध्यान से सबकी शिकायत सुनी गईं , मोती को समझाया गया &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;हम सब मिलकर उस शैतान चिडिया और चिरकुट को दंड देंगे । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सभी ने मिलकर सोचा कि उन दोनो से कोई बात नही करेगा और बुरे वक्त में भी साथ नही देंगे । लेकिन एक दिन नीम के पेड पर बहुत साडी चिडिया मिलकर शोर कर रहीं थीं , चिरकुट को वह अच्छा नही लगा , उसने सोचा क्यों न इन चिडियों का घर ही उजाड़ दूँ , बहुत शोर करतीं हैं और &lt;span class=""&gt;सारे &lt;/span&gt;घोंसले चिरकुट ने तहस -नहस कर दिए , शाम को जब रानी ने अपने घर का बुरा हाल देखा तो , भागती हुई दादू के पास गई , लेकिन किसी ने भी उसकी पुकार नही सुनी , रो रोकर उसका हाल बुरा हो गया तब उसे समझ आया कि मुझे चिरकुट के साथ मिलकर कोई गलती नही करनी चाहिए थी । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रानी सबके पास गई और अपने बुरे कर्म के लिए माफ़ी मांगने लगी , मोती के पास जाकर सॉरी बोला और कहा कि अब कभी किसी को भी परेशान नही करुँगी , कृपया मेरे बच्चों &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;खातिर मेरा घर बनवा दीजिये , और चिरकुट को भी हम सब मिलकर ठीक कर देंगे । तब से सब लोग मिलकर रहने लगे । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;हमें कभी भी किसी साथी को तंग नही करना चाहिए । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू .....&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-5759636514021854568?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/5759636514021854568/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=5759636514021854568' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/5759636514021854568'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/5759636514021854568'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='शैतान चिडिया'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SbIwRKZ3FKI/AAAAAAAAAao/xvgWeWDd7Ig/s72-c/tweety.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-4641901981425533191</id><published>2009-02-16T02:08:00.000-08:00</published><updated>2009-02-16T02:10:22.873-08:00</updated><title type='text'>दास्ताँ -ये -चोरी</title><content type='html'>&lt;a name="3297633942152822902"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://renu-sharma.blogspot.com/2009/02/blog-post_15.html"&gt;दास्ताँ -ये -चोरी&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SZfsne5YFDI/AAAAAAAAAXY/y-1q8nKavPw/s1600-h/DSC00443.JPG"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;चमचमाता सूरज खिड़की से सीधे भीतर आकर मेरे तकिये पर प्रहार कर रहा है , अब तो उठ जाओ , कब तक सोती रहोगी और मुझे आँखें मलते हुए ही भास्करदेव को प्रणाम कर बिस्तर छोड़ना पड़ा । कल सोते -सोते एक बज गया था । आज एक ऐसे परिवार से मिलना है जो पिछले तीन माह से चोरी हो जाने की पीड़ा को झेल रहा है । कल स्टोरी बनाकर अख़बार के पेज तक पहुंचानी है । शीघ्रता से तैयार होकर गाड़ी उठाई और चलने को हुई , तभी फोन आ गया , सरिता जी , जरा जल्दी करियेगा , वरना पेज पर कुछ और डालना पड़ेगा । हाँ , ठीक है, कहकर मैं निकल गई ।परिवार अभी गाँव से शहर आकर बस गया है । कहने को तो छोटा परिवार है , लेकिन मुफलिसी में भी यदि कोई धोखा देकर चोरी कर ले जाय तो , कितनी पीड़ा होती होगी , मैं समझ सकती हूँ । एक बार मेरी फीस कॉलेज मेंकिसी शैतान लड़की ने पार कर दी , तब मैं न तो माँ से कह पाई कीफीस के पैसे दुबारा दे दो , और न बाबा को बता पाई कि बाबा किसी ने फीस चोरी करली । मैं जानती थी , अदनी सी सरकारी नौकरी में बाबा हम दो भाई बहन के साथ कितनी मुश्किलों में महीने भर का खर्चा वहन करते थे । किसी से उधर लेकर फीस जमा कर दी और अपने जेब खर्च से चुकती रही , जेब खर्च भी तो दस बीस रूपये से अधिक नही मिलता था । माँ मुझे कभी - कभी पैसे दे देती थी , बेटी !! रख ले , बाहर जाती है कभी काम आयेंगे ।&lt;br /&gt;विचारों की उधेड़ बुन के साथ में उनके घर तक पहुँच गई। दरवाज़े की घंटी बजाई, एक बुजुर्ग से पुरूष ने द्वार खोला। मै समझ गई पिता ही होंगे। मैं, सरिता, अखबार से । हाँ ,आइये ,आपने कहा था आएँगी। जी, और मैं एक कमरे में कुर्सी पर देवी सी स्थापित हो गई। हाथ में कागज़ कलम थे। उनकी पत्नी शकुंतला भी पानी लेकर आई , बेटी नयना को कहा, जा बेटी चाय बना ला। मैं, उनकी आत्मीयता पर गदगद थी। खैर, हम लोगों का बातचीत का सिलसिला शुरू किया। पिता लाल जी, अधीर हो रहे थे, अपनी पीड़ा बांटने के लिए, वही पहले बोले। दीदी, तीन महीने पहले हमारी चोरी हो गई, हमारी एक छोटी सी दूकान थी, दिनभर में गाडियों की मरम्मत कर, पंचर जोड़कर, घर के खर्च लायक पैसे जोड़ लेता था। लेकिन दुसरे लोगो की बैटरी, गाडिया जो काम के लिए रखी थी, सब उड़ा ले गए। इसी बीच पत्नी बोल पड़ी, हमने तो इनसे कहा था , किसी का सामान न रखो, पर सुनते ही नही, अरे !! तुम चुप रहो, हम बताते हैं। हमारा बेटा शेहेर में था जब उसे पता चला तो पुलिस थाने में रिपोर्ट करा दी। पुलिस वाले पूछने लगे किस पर शक है, तब हम का कहें, किससे झगडा मोल लें, पर क्या करें एक कबाडी पर ही शक था सो सबके कहने पर उसका नाम बता दिया।बेटे ने जब पुलिस थाने में दबाव बनवाया तब जाकर कबाडी से पूछ - ताछ की गई, एक दिन दीदी, दरोगा साब घर भी आ धमके, अब तो मोहल्ले वाले चमक गए की हम लाल जी बड़ा आदमी हूँ। मुझे भी कुछ गाँव वालों की नजरो में इज्ज़त मिल गई। अरे!! दीदी का कहें, इनकी मति मारी गई, बा कबाडी का नाम ले लिया, क्यूँ अरे! नम्बर एक का बदमाश है, हम तो मना कर रहे थे, छोडो अब न मिली कोई सामान, पर कौन सुने हमारी।&lt;br /&gt;तभी नयना बोल पड़ी- दीदी, पापा ने चोरी के चक्कर में हजारो रुपये फूक दिए सो अलग, वो कैसे ? हम लोग उनकी नोक झोंक पर हँसते भी जा रहे थे। मैं अपनी हँसी रोक नही पा रही थी । एक बार कबाडी को पुलिस पकड़ कर ले गई , पापा ने घर आकर बताया तो , माँ ने कहा - हे ! ईश्वर उस कबाडी को पुलिस न पकड़े तो अच्छा , कोई निर्दोष न पकड़ा जाए । हमने तो उसे चोरी करते देखा तक नही , अब देखो दीदी , चोर को हमारी माँ ही बचा रहीं थीं । पंडित , बाबा , फ़कीर , झाड़ -फूक कहाँ -कहाँ जाकर नाक नही रगडी , पर कुछ भी नही हुआ । एक बार एक साथी की गाड़ी में दो लीटर पैट्रोल भरवाया और चल दिए , एक बाबा कहता था कि उस पर देवी आती है , सब बता देगी , तीन बार तो हमे दस किलोमीटर तक एक खेत पर ले गया , कोई नही आया फ़िर बोला चलो नर्मदा नहा कर आते हैं , तब आएगी । नर्मदा नहा कर गए तब एक देवी की जगह जिन्न आ गया , हम लोग डर गए और उसे वहीं छोड़ कर भाग लिए ।&lt;br /&gt;किसी ने बताया कि एक आदमी हाथ में चमेली का तेल लगाकर सब बता देता है , हाथ पर फ़िल्म बन जाती है , उसमें सब दीखता है । न जाने कितने बच्चों के हाथ में चमेली का तेल लगाया पर कुछ भी नही हुआ । कुछ ने कहा फलां जगह माल दवा है । इस बीच पुलिस शांत थी क्योंकि थाने का इंचार्ज चोर से दस बीस हजार रुपये खा चुका था । एक दिन थाने में कबाडी को रखा उसकी खातिरदारी की और छोड़ दिया । जब माँ को पता चला तो , मन्दिर जाकर परसाद चढा दिया , अच्छा हुआ वह छूट गया । सब हंसने लगे उनकी बातों पर ।&lt;br /&gt;मैं , लगातार ठहाके लगा रही थी क्योंकि चोरी का रंज उनके चहरे से गायब हो चुका था , अब उस ख़राब समय का सब मिलकर मजाक उड़ा रहे थे । बेटी नयना , बड़ी खुश थी शहर आकर । मैं भी , थोडी हिल -मिल गई थी । और बताइए क्या हुआ ? अरे !! हाँ , एक बार किसी ने बताया जा बेटा !! आज की रात सोकर उठोगे तो सपने मैं सब दिख जाएगा , कहाँ सामान है ? कहाँ चोर है ? मैं डर गया था । थाने वाले साब ने कह दिया था , जब सपना आए तो मुझे आकर बताना सबसे पहले । वे लोग तो अपना उल्लू सीधा कर रहे थे । दो रात का समय था हमारे पास , घर वाले तो सारी रात खर्राटे भरते रहे लेकिन मेरी आंखों में नींद नही थी । सुबह बेटी दौड़ती हुई आई , पापा क्या सपना देखा ? बताओ तो , मैं अचरज में था , हंस दिया , बेटा मुझे तो रात भर नींद ही नही आई । सपना कैसे आता ? तभी शकुंतला बोल पड़ी -हमने कहा था न , कुछ नाटक मत करो , देखा गांठ की नींद और चली गई । हम साब लोग फ़िर देर तक हँसते रहे । कई बड़े अफसरों से शिकायत की लेकिन न चोर पकड़ा और न सामान ही पता चला ।&lt;br /&gt;अब हताश होकर गाँव ही छोड़ दिया है । शकुंतला बोल पड़ीं - भला हो चोरी का जो सब शहर में आ गए वरना मेरे भगवान जी रोज परेशान होते थे । वो कैसे ? नयना बोली - दीदी ! जब भइया लोग शहर में थे तब , माँ भगवान से रोज कहतीं - जाओ शहर जाओ , बच्चों का ख्याल रखो । और जब भइया लोग गाँव में होते तब कहतीं , अब चार दिन की छुट्टी जहाँ मन हो घूम आओ । लालजी बोल पड़े - इनकी तो लीला ही निराली है न चोर पकड़ने दिए और न कुछ करने दिया । अरे !! आप क्या जानो , एक तो चोरी हो गई ऊपर से हजारों रुपये खर्च कर दिए । जब देखो तब किसी बाबा , फ़कीर के पास जाना होता था । चाय के दौर चलते रहे , मैं , छोटे से खुशहाल परिवार के साथ अपने को भूल ही गई । कभी लालजी की बात सुनती , कभी शकुंतला जी की , कभी नयना की और कभी ठहाकों में हम साब अपना मैं तिरोहित कर रहे थे । समझ ही नही आ रहा था इस कहानी में पीड़ा है , दर्द है , या दर्द से निबटने की दावा है ।&lt;br /&gt;एक -एक लम्हे जिंदगी जीने का जज्बा रखने वाले लोग रीते होकर भी भरे हुए थे , प्यार , संवेदना और इंसानियत से । सनातनता सबमें समाई थी , टूटकर फ़िर से जुड़ने की कला कोई इनसे सीखे । हमारे सरकारी रवैये की ढुल -मुल बदनीयती को उजागर करती इनकी पीड़ा कैसे किसी अफसरशाही की कार्यप्रणाली पर भरोसा कर सकती है । ख्हैर .....ऐसे दरियादिल लोग इन घूंस खोर बड़े चोरों के मोहताज भी नहीं । ईश्वर से दुआ करते हुए कि यह परिवार यूँ ही हँसता मुस्कराता रहे , मैं उठ खड़ी हुई अपनी मंजिल की ओर । रेनू .....&lt;br /&gt;Posted by Renu Sharma at &lt;a class="timestamp-link" title="permanent link" href="http://renu-sharma.blogspot.com/2009/02/blog-post_15.html" rel="bookmark"&gt;1:59 AM&lt;/a&gt; &lt;a title="Email Post" href="http://www.blogger.com/email-post.g?blogID=8722025933352975722&amp;amp;postID=3297633942152822902"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a title="Edit Post" href="http://www.blogger.com/post-edit.g?blogID=8722025933352975722&amp;amp;postID=3297633942152822902"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="comments"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;1 comments:&lt;br /&gt;&lt;a name="c5736208736840194901"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/00019337362157598975" rel="nofollow"&gt;vandana&lt;/a&gt; said...&lt;br /&gt;bahut sahi kaha aapne.&lt;br /&gt;&lt;a title="comment permalink" href="http://renu-sharma.blogspot.com/2009/02/blog-post_15.html?showComment=1234767000000#c5736208736840194901"&gt;February 15, 2009 10:50 PM &lt;/a&gt;&lt;a title="Delete Comment" href="http://www.blogger.com/delete-comment.g?blogID=8722025933352975722&amp;amp;postID=5736208736840194901"&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-4641901981425533191?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/4641901981425533191/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=4641901981425533191' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/4641901981425533191'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/4641901981425533191'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/02/blog-post_16.html' title='दास्ताँ -ये -चोरी'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-3663697971807537519</id><published>2009-02-09T03:21:00.000-08:00</published><updated>2009-02-09T03:55:54.314-08:00</updated><title type='text'>मुसीबत</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SZAZXL8V1nI/AAAAAAAAAXA/iPpm4Jl7Dqc/s1600-h/birdie.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5300764647548638834" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SZAZXL8V1nI/AAAAAAAAAXA/iPpm4Jl7Dqc/s200/birdie.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक बार की बात है , जंगल &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;घनघोर बारिश हो रही थी । सारे जानवर अपने घरों में आकर छुप गए । तभी सोना नाम की चिडिया ने सबके पास आकर कहा - अगर इसी तरह बारिश होती रही तब हम लोग बहार कैसे निकल सकेंगे । भूख से सबका बुरा हाल था , फिरनी खरगोश को उसके बच्चे परेशान कर रहे थे , &lt;span class=""&gt;माँ &lt;/span&gt;हमें भूख लगी है , फिरनी उन्हें तसल्ली दे रही थी ,बेटा ! बारिश रुकने दो फ़िर कुछ करती हूँ । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सभी दुखी थे पर गूंजा मोर को कोई परवाह ही नही थी । बारिश दूसरे दिन भी नही थमी गूंजा फ़िर भी नाच रहा था । उसे बच्चों की भी चिंता नही थी । जंगल में बाढ़ की स्तिथि पैदा हो गई , सब लोग ऊँची जगह पर चले गए , गूंजा को तब भी कोई चिंता नही हुई । नदी का पानी गूंजा के घर तक आ गया , दो छोटे बच्चे परेशान थे , बचाओ !! बचाओ !! चिल्ला रहे थे । उनके पास भोलू भालू आ गया और अपने साथ सुरक्षित स्थान पर ले गया । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;भालू मोर के बच्चों को शेरू की गुफा में ले गया , जंगल की दशा सुधरने में सारे जानवर लगे हुए थे । लेकिन गूंजा अभी भी नाचने में मस्त था । लम्बू जिराफ ने उसे &lt;span class=""&gt;फटकार &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;लगाई &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;सब लोग बाढ़ से दुखी हैं और तुम यहाँ नाच रहे हो ? देखो , लम्बू कितना सुहाना मौसम है , मुझे इसका आनंद लेना दो , तभी फिरनी खरगोश वहां भागती हुई आई , अरे !! गूंजा तुम्हारे घर में पानी भर गया है , क्या !!! वहां तो मेरे बच्चे थे , मोर घबरा गया जल्दी से घर &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;तरफ़ भागा । वहां बच्चे नही थे , शेरू ने गूंजा को डांटते हुए कहा - जब नाच रहे थे तब बच्चों की चिंता नही थी । उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;भोलू ने तुम्हारे बच्चों को सुरक्षित &lt;span class=""&gt;निकाला । &lt;/span&gt;महाराज गलती हो गई , अब आगे से ऐसा नही होगा । मेरे बच्चों को बचाने के लिए शुक्रिया । गूंजा अपने बच्चों को लेकर गया और नया घर बनाने में जुट गया । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मुसीबत में दूसरों का साथ देना चाहिए । मुसीबत आने पर एकजुट होकर सामना करना चाहिए । &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-3663697971807537519?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/3663697971807537519/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=3663697971807537519' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/3663697971807537519'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/3663697971807537519'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/02/blog-post_09.html' title='मुसीबत'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SZAZXL8V1nI/AAAAAAAAAXA/iPpm4Jl7Dqc/s72-c/birdie.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-630166641350129118</id><published>2009-02-06T00:42:00.000-08:00</published><updated>2009-02-06T01:34:18.631-08:00</updated><title type='text'>बेचारा शेर</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SYwCrNV5onI/AAAAAAAAAWg/Fh-8y8aqrUI/s1600-h/DSC01938.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5299613802847380082" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SYwCrNV5onI/AAAAAAAAAWg/Fh-8y8aqrUI/s200/DSC01938.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;चीनू नाम का एक शेर शिकार की खोज मैं भटकता हुआ एक खेत &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;आ गया और बारिश में फंस गया , अपने को छुपाने के लिए एक किसान की झोंपडी के पीछे छुप गया , आज , रोजी दादी का मिजाज भी ठीक नही था । उसकी झोंपडी भी &lt;span class=""&gt;चू &lt;/span&gt;रही थी । वह अपने घर का &lt;span class=""&gt;सामान &lt;/span&gt;कभी इधर खिसकती कभी उधर , हर तरफ़ पानी टपक रहा था । उसने एक बड़ा बक्सा खिसका कर दीवार से सताया तो दीवार ही हिल गई , शेर दीवार से सता &lt;span class=""&gt;हुआ &lt;/span&gt;ही बैठा था । वह घबरा गया , उसने सोचा कोई भयानक जीव होगा जो आवाज कर रहा है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;तभी भोला किसान भी घर में आ गया , वह भी थोड़ा नाराज था , उसका गधा कहीं चला गया था । अचानक उसने झोंपडे के बाहर किसी जानवर को बैठे हुए देखा और बोला - ये रहा , &lt;span class=""&gt;दुष्ट!! &lt;/span&gt;शेर के पास जाकर चिल्लाया - तुम यहाँ बैठे हो , चलो , एक तमाचा जड़ दिया , कान पकड़कर कहा - चुपचाप चल , नही तो सारी हड्डियाँ तोड़ दूंगा । शेर बहुत डर गया , उसने सोचा यही वह भयंकर जानवर होगा । शेर भोला के पीछे आ गया , बाहर ही एक रस्सी से शेर को बाँध दिया और अन्दर जाकर सो गया । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सुबह जब भोला की पत्नी रोजी ने बाहर आकर देखा तो चीख पड़ी , भोला दौड़ कर आया , क्या हुआ । पूरा गाँव जुट गया , अब क्या होगा ? शेर भी बुरी तरह डर गया था , उसने रस्सी को दांत से चबा डाला और दहाड़ता हुआ जंगल में भाग गया । कुछ देर बाद भोला ने झोंपडे से झांक कर देखा तो हैरान रह गया , &lt;span class=""&gt;बाहर &lt;/span&gt;आकर गाँव वालों को अपनी बहादुरी की कहानी जरा बढाकर बताने लगा । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;क्या तुमने , सचमुच ही शेर को बाँध दिया , बड़ी हिम्मत है । सब लोग भोला से मिलने आते रहे । अरे !! उसको तो लात भी मरी थी । तमाचा भी मारा था , सब लोग भोला की तारीफ करते रहे । बोला मन ही मन सोचता रहा यदि शेर दुबारा आ गया तब क्या होगा ? &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;अति बहादुरी दिखाना भी हमारे लिए खतरा पैदा कर सकता है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू ....&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-630166641350129118?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/630166641350129118/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=630166641350129118' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/630166641350129118'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/630166641350129118'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/02/blog-post_1455.html' title='बेचारा शेर'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SYwCrNV5onI/AAAAAAAAAWg/Fh-8y8aqrUI/s72-c/DSC01938.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-4143185446598833503</id><published>2009-02-06T00:02:00.000-08:00</published><updated>2009-02-06T00:39:35.016-08:00</updated><title type='text'>लोमडी और कठफोडवा</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SYv2DI-bbhI/AAAAAAAAAWY/JUO_2pmdWFw/s1600-h/pic5.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5299599920340889106" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 136px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SYv2DI-bbhI/AAAAAAAAAWY/JUO_2pmdWFw/s200/pic5.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;नंदन वन &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;साही &lt;/span&gt;नाम की एक लोमडी रहती थी , वह मौका मिलते ही सभी जानवरों को बेवकूफ बनाया करती थी । सब लोग उसे चालाक लोमडी या साही कहकर बुलाते थे । एक दिन गाना गाते हुए साही कहीं जा रही थी , तभी शिकारी के खोदे हुए गड्डे में गिर गई । जोर से रोने लगी , तभी रिबू नाम के एक काठफौड्वे ने साही से पूछा - अरे ! मौसी यहाँ क्या कर रही हो ? कुछ नही , गरमियां आ रहीं थीं इसलिए &lt;span class=""&gt;कूआ &lt;/span&gt;खोद रही थी । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बड़ी अच्छी बात है , क्या एक और कूआ खोद दोगी , हाँ , क्यों नहीं , बस मेरे लिए कुछ लकडियाँ ले आओ । साही की बातों में आकर रिबू लकडियाँ गिराने लगा । उन लकडियों पर चढ़कर साही गड्डे से बाहर आ गई । देखो मौसी ! मेने तुम्हारी मदद की अब तुम , मेरे लिए कूआ खोद दो , हाँ , ठीक है । पहले कुछ खाना खिला दो , फ़िर तुम्हारा काम हो जाएगा । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;तभी रिबू ने देखा एक किसान बैलगाडी में गन्ने का रस भरकर ले जा रहा था । रिबू ने एक घडे में छेड़ कर दिया , सारा रस नीचे गिर गया और साही ने पेट भरकर रस पी लिया । अब तुम , कुछ नाच गाना दिखा दो , मेरा मन कर रहा है । रिबू समझ गया &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;साही उसे पागल बना रही है , अब तो , इसे सबक सिखाना ही पड़ेगा । बस इतनी बात है , चलो साही मेरे साथ चलो । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;दोनो गाँव तक आ गए , रिबू ने देखा एक किसान अपने घोडे को पानी पिलाने ले जा रहा है , पर वह घर का दरवाजा बंद करना भूल गया है । यही मौका है साही को मजा चखाने का । साही तुम यहाँ बैठ जाओ &lt;span class=""&gt;मैं , &lt;/span&gt;अभी आता हूँ । रिबू घर के अन्दर लगे पेड पर बैठकर ठग -ठग बोलने लगा , घर &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;सोहा नाम का कुत्ता बैठा था वह बाहर आ गया , लोमडी को देखकर भोंकने लगा । अचानक कुत्ता उस पर झपट पड़ा । उस हमले से घबरा कर साही जान बचाकर भाग गई । रिबू उसके पीछे उड़ता हुआ गया , बोला - क्यों साही जी , दूसरों को बेवकूफ बनाने का नतीजा देख लिया न ! &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;दूसरों को बेवकूफ बनाने वाला स्वयं ही बेवकूफ बन जाता है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू .....&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-4143185446598833503?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/4143185446598833503/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=4143185446598833503' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/4143185446598833503'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/4143185446598833503'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/02/blog-post_06.html' title='लोमडी और कठफोडवा'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SYv2DI-bbhI/AAAAAAAAAWY/JUO_2pmdWFw/s72-c/pic5.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-3290400455478793686</id><published>2009-02-05T03:33:00.000-08:00</published><updated>2009-02-05T05:04:42.021-08:00</updated><title type='text'>बड़ा आँगन</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SYrdJsA40cI/AAAAAAAAAWQ/IRtXKAQqXx0/s1600-h/sVillageKidsPlaying.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5299291070058254786" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SYrdJsA40cI/AAAAAAAAAWQ/IRtXKAQqXx0/s200/sVillageKidsPlaying.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बड़ा आँगन पुराने घरों की वह आराम &lt;span class=""&gt;गाह &lt;/span&gt;हुआ करता था ,जहाँ बड़ी -&lt;span class=""&gt;बूडी , &lt;/span&gt;बहुएं , बेटियाँ और नन्हे -मुन्ने बच्चे रोजमर्रा की जिन्दगी से ऊब कर , कुछ समय के लिए हास -परिहास , खेलकूद , उछलकूद और गाँव से लेकर शहर तक की बातें किया करते थे । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;हमारे आँगन &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;एक नीम का पुराना पेड था और सबके बैठने का ठिकाना भी , जब होश संभाला तब भी , आँगन की नाली में ही सु -सु के लिए दादी भेजती थी । सावन के महीने में हम लोग नीम की डालियाँ बाँट लिया करते थे और मूंज की मजबूत रस्सी से झूला डाल कर बरसते पानी में भी झूला करते थे । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;जब भी नीम के पेड पास होती ऐसा लगता मानोउसकी एक -एक डाली मुझसे बातें करती है . पत्तियां झुककर कुछ &lt;span class=""&gt;सुनाना &lt;/span&gt;चाहतीं हैं । पकने पर निबोरी तोड़कर खाती तो लगता जैसे &lt;span class=""&gt;सारी &lt;/span&gt;मिठास इसी में डाल दी है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;हर रोज आँगन में जाकर मस्ती करने का हम सब बेसब्री से इंतजार करते , मेरा भाई हमेशा सरे कंचे जीत लेता , जब हार सहन नही होती तो आखिरी दांव पर बीच खेल में कंचों को लूट लिया जाता । झगडा इस कदर बढ़ जाता &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;दादी को आना पड़ता । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;गुडिया &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;सगाई हो या टिप्पा खेलना , गिल्ली डंडा हो या धेरी फोड़ , सिकंतरी हो या कुछ और सारे खेल दिन भर आँगन में ही खेलते रहते । मिटटी खोदकर टिप्पा खेलने की जगह बना ली गई थी , उसके ऊपर कोई पैर रख देता तब झगडा होता , बाबा को लाकर दिखा दिया था , बाबा देखो ये हमारा खेल है , हमेशा यहीं रहेगा , यह कंचे की जगह है , यह गुल्ली की । बाबा हमारी नादानी पर हंसते फ़िर कहते बेटा यहाँ तो कुछ भी स्थाई नही है । सब तुम्हारा रहेगा , हमेशा और अन्दर आ जाते । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;आँगन ही चौबारा था , जब तक हम सब लोग एक दूसरे को देख न लेते चैन ही नही पड़ता था । &lt;span class=""&gt;मैं &lt;/span&gt;सिर्फ़ यह देखने के लिए दूसरे घरों &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;टाक लगाती थी पता चले वे लोग इस समय क्या कर रहे हैं । बड़ा मजा आता था , फिजूल हरकतों में , हमारी दीवार से लगा एक मानसिक रूप से कमजोर बुआ का घर था , उनका नाम शरवती था , हम लोग हास -परिहास करते रहते थे । बुआ अपने भावों को हाथ पैरों की मुद्रा बनाकर स्पष्ट करती रहती थीं । हम बार -बार पूंछते बुआ क्या कर रही हो ? उन्हें तंग करते रहते थे , &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;शरबती बुआ का गला बड़ा सुरीला था , पुराने सावन की मल्हारें , फिल्मी गाने , और न जाने क्या -क्या उन्हें याद था , हम जिद करते बुआ गाना सुना दो और वे गाने लगतीं .... अफसाना लिख रही हूँ , दिले बेकरार का ... आंखों में रंग भरके तेरे इंतजार का ....अफसाना लिख रही हूँ , जाने किसका इंतजार था उन्हें , &lt;span class=""&gt;माँ &lt;/span&gt;अक्सर उनके लिए खाना भेजा करती थी । कभी कभी तो उनके साथ बैठकर खा भी लेती थी । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;दूसरी बुआ जब मिलतीं तब देश -विदेश से लेकर गाँव नगर से लेकर , देश के हालत पर भी बातें हो जातीं , जब पूरे विश्वास से उनकी बात का जवाब &lt;span class=""&gt;मैं &lt;/span&gt;देती तब वे कह उठतीं तू तो गजब करेगी , कितना स्पष्ट बोलती है , झुकने की बात तो करती ही नही है । यही क्रम रात भर भी चलता रहता , वहां से किसी का उठने का मन नही होता । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;आज कॉलेज मैं क्या हुआ ? किस टीचर ने क्या पहना था , आदि बेसिर पैर की बातें हमारे मनोरंजन &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;शामिल रहतीं । दिन भर के कूदे कचरे को गप्पों के माध्यम से निकलकर हलके हो जाया करते थे । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बड़ा आँगन कितना बड़ा था , कितना अपना था , हमराज था , कितने उतर चढाव हमारे साथ उसने भी झेले । जब आपस में झगडा हो जाता तब तब एक वीरानी सी घेर लेती आँगन में आकर बैठते लेकिन बात किसी से नही होती , कई बार अकेले ही आँगन में जाकर नाचने लगाती , खुश होती और कहती देखो आँगन कोई साथ दे या न दे तुम मुझसे नाराज नही होना , मुझे तुमसे प्यार है , तुम्हारे साथ मेरी यादें जुड़ी है , तारों की शपथ लेकर प्यारी सी पप्पी आँगन में फैलाकर अपने कमरे में चली जाती । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;शादी के बाद उसी आँगन से विदा होकर ससुराल चली गई , अब वो आँगन नही रहा क्योंकि बंटवारा जो कर लिया सबने अपने हिस्से का आँगन बाँट लिया । लेकिन आज भी मेरी यादों में आँगन जिन्दा है , नीम का पेड कट दिया गया है लेकिन आज भी उसकी हरियाली नया स्पंदन पैदा कर्तियो है , शरबती बुआ का गाना याद आता है ....अफसाना लिख रही हूँ ...दिले बेकरार का , आंखों में रंग भरकर तेरे इंतजार का ......&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;विशाल आँगन में कुटुंब भर के बच्चों का खेलना , एक दूसरे को जोड़ता है , संयुक्त परिवार में गूंजती किलकारियां , अठखेलियाँ , नोकझोंक जीवन पर्यंत सबको गुदगुदाती है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू ....&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-3290400455478793686?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/3290400455478793686/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=3290400455478793686' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/3290400455478793686'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/3290400455478793686'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='बड़ा आँगन'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SYrdJsA40cI/AAAAAAAAAWQ/IRtXKAQqXx0/s72-c/sVillageKidsPlaying.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-7981117292464507702</id><published>2009-01-27T00:46:00.000-08:00</published><updated>2009-02-05T03:30:52.342-08:00</updated><title type='text'>शहतूत का पेड</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SYrMIjbCB1I/AAAAAAAAAWI/MBFKIx4xeMQ/s1600-h/taj_mahal.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5299272358874449746" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SYrMIjbCB1I/AAAAAAAAAWI/MBFKIx4xeMQ/s200/taj_mahal.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;ताज देखना है तो , चलो खेत पर , ताज का शार्टकट दीदार सिर्फ़ हमारे शहतूत के पेड से ही सम्भव था । गर्मी की छुट्टी &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;गाँव आने वाले बच्चों से एक रुपये के टिकिट के साथ हमारा गाइड ग्रुप दोपहर में खेतों की घास भरी &lt;span class=""&gt;मेंड़ &lt;/span&gt;से दौड़ता हुआ चल देता था । &lt;span class=""&gt;मेड &lt;/span&gt;पर लम्बी घास इतनी पैनी होती थी &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;कभी -कभी पैरों में कटने से खून भी निकल आया करता था ।लेकिन मुहब्बत के परचम कीदूर चमकती सफ़ेद परछाई को देखने के लिए ये सब मुश्किलें मामूली बातें हुआ करतीं थीं । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;शहतूत के पेड के पास पुराना ट्यूबवेल था , जहाँ बैलों की &lt;span class=""&gt;जोड़ी,&lt;/span&gt; चमडे के मोटे थैले में पानी भरकर हौदी में भर देती थी और वहाँ से नालियों से पानी निकलकर खेतों की मेडों से होता हुआ सिंचाई करता था । कई बार बैल और पुरहे के बीच की &lt;span class=""&gt;रस्सी &lt;/span&gt;पर हम झूला झूलते थे । बाबा देखते ही चिल्लाते - छोरी मरेगी क्या ? प्यार भरी डांट &lt;span class=""&gt;फटकार &lt;/span&gt;तो सैकड़ों बार लगा करती &lt;span class=""&gt;थी &lt;/span&gt;जिसका कोई असर हमारे ऊपर नही । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक बार ताज देखने के साथ ही शहतूत के पेड पर &lt;span class=""&gt;हुल्लक &lt;/span&gt;डंडा खेलने का विचार किया गया , हम चार लोग थे , सब लोग इस बात पर सहमत हुए &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;जो दो फुट लंबा डंडा लेकर दौनों पैरों के बीच से दूर खेत &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;फैंक कर पेड &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;डाल &lt;/span&gt;पर चढ़ जाएगा , उसे ताज दिखाया जाएगा । इस खेल में दाम देने वाला जब तक डंडा लेकर आता बाकी सदस्य शीघ्रता से पेड पर चढ़ जाते । डंडे को एक गोला खींच कर उसके बीच में रखकर इंतजार किया जाता , ऊपर से कूदकर जो डंडा पकडेगा उसे दाम देने वाला पकड़ लेगा । यही &lt;span class=""&gt;क्रम &lt;/span&gt;हर खेलने वाले पर चलता रहता । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;शहतूत का पेड ऐसे पूर्वज के सामान था जिसकी हर डाली ऐसी प्रतीत होती &lt;span class=""&gt;मानो &lt;/span&gt;कोई बच्चों को सभालने के लिए बाँहें फैलाये खडा हो । मीठे रस भरे शहतूत का स्वाद इतनी मादकता लिए था &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;ऊपर चढ़ने के बाद खेल का तो ध्यान ही नही रहता और हम शहतूत तोड़कर खाते रहते । अचानक डंडे का घेरा खली देख हम दो लोग एक साथ पेड से कूद गए , मेरे पैर में मोच आ गई । आह उह का सिलसिला शुरू हो गया । घर से चार पञ्च किलोमीटर दूर हम लोग घबरा गए , चुपचाप स्वाफी से पैर को बाँध दिया और पप्पू &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;पीठ पर लाद कर घर लाया गया ।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सब परेशान थे अब क्या होगा ? खूब मार पड़ेगी , लेकिन तभी राम खिलाड़ी मालिश करने वाला आता दिखाई दे गया , बाबा जरा देखना तो नाली में पैर मुड गया है , बाबा ने देखते ही दौड़ लगा दी , अरे !! बिटिया क्या हुआ ? सब ठीक हो जाएगा , चिंता न करो , बातें बनते हुए ही उन्होंने मेरा पैर ठीक कर दिया बस एक जोर का झटका लगा था , मुझे राम खिलाड़ी बाबा के अनछुए स्पर्श की &lt;span class=""&gt;छुअन &lt;/span&gt;आज भी याद है । क्या जादू था उन हाथों में , मेरी पीड़ा एक पल में छू मंतर हो गई । हम सब विजय के साथ मुस्करा रहे थे । क्योंकि घर में किसी को नही पता चला &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;हम क्या खुरापात करके आ रहे हैं । जल्दी से फ्रॉक में सेर भर अनाज भरकर बाबा को दे दिया , अरे बिटिया रहने दे , बाबूजी ने तो खेत दिया है , रोटी उन्ही &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;दी खा रहे हैं , खुश रहो और हजारों आशीर्वाद देते हुए आंखों से ओझल हो गए । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;शहतूत का पेड न होता तो हम कभी उसकी फुनगी पर न चढ़ते , ताज की चमक न देख पते , मीठे शहतूत को दिल में न बसा &lt;span class=""&gt;पाते ,&lt;/span&gt; कितनी बार चार रुपये तक कम लिए ताज दिखने के बहने से । हम सब झट से पेड पर चढ़ जाते और उतर जाते , जुटे हुए खेत में कूदते तो ऐसा लगता मानो हम गद्दे पर कूद रहे हैं , भीनी खुशबू आज भी चारो तरफ़ फ़ैल जाती है , मेरी स्मृतियों में शहतूत का पेड आज भी खड़ा है । प्यार का संगमरमरी महल दिलों में सजाने के लिए । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मानवीय रिश्तों की तरह ये विरत प्रकृति भी हम सबसे रिश्ता जोड़ती है , शहतूत का पेड एक मीठे फलदार वृक्ष के अलावा एक दोस्त भी बन गया था । वो आज भी हमारा मित्र है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू ....&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-7981117292464507702?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/7981117292464507702/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=7981117292464507702' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/7981117292464507702'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/7981117292464507702'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/01/blog-post_3124.html' title='शहतूत का पेड'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SYrMIjbCB1I/AAAAAAAAAWI/MBFKIx4xeMQ/s72-c/taj_mahal.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-7406826027961047136</id><published>2009-01-24T01:39:00.000-08:00</published><updated>2009-01-26T09:11:20.753-08:00</updated><title type='text'>भलाई का प्रतिफल</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SX3sU2dBVcI/AAAAAAAAAUQ/o7IHOBZCyS4/s1600-h/DSC01401.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5295648579816347074" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SX3sU2dBVcI/AAAAAAAAAUQ/o7IHOBZCyS4/s200/DSC01401.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक था कालू गधा , अपने मालिक गबरू के साथ मिलकर दिन भर कपडे ढोता था । मालिक रात &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;उसे आजाद कर देता था कियोंकि उसे लगता था &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;दिन भर मेरे साथ रहकर ऊब जाता होगा , आजाद रहेगा तो दिन भर अच्छा काम करेगा । कालू पूरी रात इधर -उधर घूम कर मस्ती करता था , सबेरा होते ही गबरू के पास वापस आ जाता था । इसी कारण धोबी उस पर पूरा विश्वास करता था । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक बार उसकी दोस्ती &lt;span class=""&gt;जारा &lt;/span&gt;नामकी सियार से हो गई , कालू किसी भी खेत की बाड़ तोड़ने में माहिर था । जारा उसके इस हुनर पर फ़िदा हो गई , कालू के साथ मिलकर रात भर दीनू के खेत से खरबूजा खाया करते थे , सुबह होते ही दोनो अपने -अपने रास्ते चले जाते । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक रात कालू ने जारा से कहा देखो रात कितनी सुहानी है , खरबूजों की सुगंध फ़ैल रही है क्यों न &lt;span class=""&gt;मैं &lt;/span&gt;तुम्हें गाना &lt;span class=""&gt;सुनाऊं? &lt;/span&gt;बताओ तुम्हें क्या सुनना है , किस फ़िल्म का गाना सुनोगे , बोलो - जारा ने कहा दोस्त क्यों अपने साथ मेरे लिए भी आफत मोल ले रहे हो , हम यहाँ महफ़िल ज़माने नही , चोरी से खाना खाने आते हैं । चोर तो सबसे छिप कर रहते हैं , ऊपर से आपका बेसुरा गाना सुनकर खेत का मालिक दीनू आ गया तो हम कहीं के नही रहेंगे । इसलिए शांत भाव से खरबूजा खाओ और निकल लो । कालू बोला - तुम जंगल &lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;रहते हो इसलिए सुर का ज्ञान नही है , तुम सरगम के बारे में क्या जानो ? शायद तुम ठीक बोलते हो , फ़िर भी गाना तो तुम्हें भी नही आता , तुम तो रैकते हो , अरे !!! तुम पागल हो क्या ? तुमने मेरा गाना नही सुना इसलिए ऐसी बात करते हो , जारा ने मान लिया &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;अब कालू नही मानेगा और इसका गाना शुरू होते ही दीनू आ जाएगा और हमारा काम तमाम हो जाएगा । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;जारा ने कहा -देखो कालू भाई मुझे तो जान प्यारी है , इसलिए खेत के बाहर जा रहा हूँ , तुम पूरी आवाज खोलकर &lt;span class=""&gt;गाओ । &lt;/span&gt;जारा बहार आकर बैठ गई , कालू ने बहुत ही बेसुरी आवाज में चीखना शुरू कर दिया । दीनू दौड़ता हुआ आया और खेत में कालू को देखकर मारना शुरू कर दिया , मार -मार कर बेहोश कर दिया , कालू के गले में एक मोटा लकड़ी का टुकडा बाँध दिया और दीनू वहीं सो गया । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;दीनू के सोते ही कालू उठकर बैठ गया , कालू को मार का कोई अफ़सोस नही था , उखल के साथ ही कालू बाहर जाने लगा तब जारा ने कहा - दोस्त !! मेरे इतना मना करने पर भी तुम नही माने , अब देखो न कितना सुंदर हार गले में आ पड़ा है । तभी किसी ने कहा है कि जो मूर्ख लोग होते हैं वे दोस्त का उचित कहा भी नही मानते । दोस्त उनकी भलाई करना चाहता है लेकिन बात न मानाने पर बुरा फल मिलाता है जैसे कालू गधे को मिला । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू ......&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-7406826027961047136?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/7406826027961047136/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=7406826027961047136' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/7406826027961047136'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/7406826027961047136'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/01/blog-post_24.html' title='भलाई का प्रतिफल'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SX3sU2dBVcI/AAAAAAAAAUQ/o7IHOBZCyS4/s72-c/DSC01401.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-2121834184466327723</id><published>2009-01-22T01:59:00.001-08:00</published><updated>2009-01-22T02:01:07.761-08:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SXhDqqfLLsI/AAAAAAAAATA/2SAV8cqZCaY/s1600-h/baba.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5294055762212630210" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 134px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SXhDqqfLLsI/AAAAAAAAATA/2SAV8cqZCaY/s200/baba.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;पुरबिनी दादी&lt;br /&gt;पुराने खंडहर जैसे बने दुमंजिले मकान में पुरबिनी दादी अपने सैनिक रहे पति के साथ रहती थी । धीरे-धीरे दोनों जीवन की उस दहलीज पर खडे थे जहाँ कमर झुक जाती है , बाल पक जाते हैं , चेहरा झुर्रियों से ढक जाता है , शरीर दिन -पर दिन शिथिल पड़ता जाता है , एक ऐसे सहारे की आवश्यकता पड़ती है जो पत्नी पति को दे सकती है और पति अपनी पत्नी को । उस मोड़ से जीवन की विदाई निकट मानी जाती है ।&lt;br /&gt;मैं , अक्सर अपने पिछवाडे वाली खिड़की से उन दोनों की बातचीत सुना करती थी , कभी -कभी उनका लडाई -झगडा इतना बढ़ जाता था कि दादी चुपचाप ऊपर वाले कोठे पर चढ़ जाती और नीचे नही उतरती । बाबा नीचे से चिल्लाते , बुढिया नीचे आजा , मैं ऊपर नही चढ़ सकता , तुझे मनाऊं कैसे , आजा मेरा हुक्का भर दे और तब तक बुलाते रहते जब तक रोते -रोते लाल आँखें किए दादी नीचे नही आ जाती ।&lt;br /&gt;हर बार की बारिश में उनके मकान का एक हिस्सा ढह जाता ठीक वैसे ही जैसे कि उनके जीवन का अन्तिम समय और पास आ गया हो । मुझसे छोटी बहन चित्रकला में पारंगत थी , हम उससे कहते इनके घर का स्कैच बना ले और लम्बी दाढ़ी वाले स्मार्ट बाबाका भी । लेकिन खिड़की से सरे काम करना मुश्किल थे । एक रोज तेज बारिश आंधी में उनके घर का आगे का हिस्सा भी ढह गया । दौनों घर के कोठे में सो रहे थे । रात भर बैचेनी से निकली , सुबह होते ही दौड़कर गई जाकर देखा दोनों ठीक से तो हैं ।&lt;br /&gt;पुराने घर का पुराना रास्ता तो ईश्वर कि कृपा से बंद हो गया था । अब एक ऊँची -नीची पगडण्डी सी बन गई थी गिरी दीवार और आँगन के बीच । बाबा लाठी का सहारा लेकर उसी रस्ते से आया जाया करते । माँ, कहती मुझे तरस आता है , ये कहीं गिर गए तो कौन सभालेगा ? लेकिन वो भी क्या करे ,कभी तो , घर से बाहर निकलने का मन करेगा ही । उनका हाल-चाल जानने का लिए खिड़की बोनी पड़ रही थी । एक दिन तेज बारिश के कारण हमारी दीवार भी गिर गई , हम सभी बेहद खुश हुए , घर के बुजुर्ग चिंतित थे क्योंकि चोरों के लिए रास्ता खुल गया था । हम लोग माँ के पीछे पड़ गए थे कि पीछे की दीवार में एक दरवाजा निकलवा दें। ऐसा नही था कि दादी को संतान नही थी , दो बेटी एक बेटा था । एक बेटी राजिस्थान के किसी गाँव में रहती थी कभी -कभी आकर माँ के हाल जन लेती थी , दूसरी बेटी पास ही थी लेकिन कम आना होता था । बेटा सरकारी अस्पताल में स्टोरकीपर था , सरकारी आवास का सुख भोग रहा था , उसे कभी समय नही मिलता था कि माँ बाप को देख सके । वृद्धावस्था में भी दादी इतनी खूबसूरत थीं कि अपनी जवानी के समय तो पूरी जापानी गुडिया जैसी दिखती होंगी । हम अक्सर उनसे बातें किया करते थे , एक दिन बुआ ने बताया कि दादी से बाबा ने लव मैरिज की है , जब बाबा सेना में थे तब पहाडी इलाके में जाना होता था , उस समय अंग्रेजों का राज था , महीनों तक एक ही जगह पर रहना पड़ता था , बाबा की पहली पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी , साल भर बाद बाबा घर वापस आए तब उनके साथ एक सुंदर सी दुल्हिन थी , गाँव वाले उन्हें देखने के लिए दौड़ पड़ते थे । पडौस वाली महिलाएं उनका गाँव , घर , माता पिता सब पूछती थीं लेकिन दादी कभी भी नही बताती थी कि वे कहाँ से आईं हैं । हमारे पापा भी चाहते थे कि पीछे दरवाजा बन जाए , हम सभी को उनकी चिंता रहती थी , और एक दिन दरवाजे के साथ ही दीवार बन गई । हमारी चहल कदमी बाबा -दादी के पास आसन हो गई । उनकी जिंदगी के खूबसूरत पलों को मैं जानना चाहती थी । बाबा अपने मैडल भी दिखाते थे , उन्होंने दो लडियां भी लादिन थीं । बाबा हथियारों की साफ़ -सफाई करते थे । उनके पास बैठने पर समय पंख लगाकर उड़ जाता था । दादी धार्मिक संस्कार वाली महिला थीं । रामायण , महाभारत के किस्से उन्हें कंठस्थ थे । हर दिन दोपहर में माँ के पास बैठकर कहानियाँ सुनाया करतीं थीं । पूरब की भाषा बोलतीं थीं , माँ उनकी हर बात समझतीं थीं क्योंकि माँ कानपूर की थीं । तीस सालों में भी दादी ने ब्रज भाषा को नही अपनाया , हम लोग उन्हें परेशां करते थे कि दादी का कत्तल बानी { क्या कर रही हो } वे धीरे से मुस्करा जातीं थीं । जब उनकी तबियत ख़राब होती , माँ के पास आकर दवा ले जातीं थीं । बाबा अक्सर दादी से पैसों के पीछे लड़ा करते थे , पैशन से ही उनका खर्चा निकलता था । जिसमें बाबा के हुक्के का खर्च , दादी की बीडी का खर्च भी शामिल था । पूरा सामान दादी कंट्रोल की दुकान से लाती थी , कभी जब बाबा उनसे नाराज होते तब सैनिक जैसी गर्मी दिखाकर दादी को मार दिया करते थे , बेचारी दादी , जोर से चीखना शुरू कर देती , हम लोग दौड़ कर जाते और दादी को बचाकर ले आते , गुस्से में दादी घर नही जाती , बाबा को गाली देती , उनके मरने की कामना करती , अपने आने को कोसती , वो कौन सा बुरा समय था जब इस बुड्ढे के साथ आ गई । लेकिन दूसरे ही पल घर की तरफ़ मुड जातीं । काम करने लग जाती । इस बार ठण्ड जाने कैसी आई , बाबा बीमार हो गए , होते भी क्योनाहीं दो मंजिले घर की जगह अब एक टूटी -फूटी कोठरी ही बची थी । सहारे के लिए कर्मठ बुढिया थी जिसने प्यार की परिभाषा को सही अर्थ दिया था । अपना सब कुछ भूल गई थी , एक पुरानी रजाई कब तक , बूढी हड्डियों को गर्मी दे पति । दादी दवा लेन की बात करती तो बाबा अपना बक्सा नही खोलने देते , कोई बेईमानी कर लेगा , जाने क्या उनके दिमाग में घूमता था । दादी दुखियारी गाय सी इधर से उधर रंभाती फीती थी किसी तरह बाबा ठीक हो जाय । बेटे को ख़बर कर दी गई , बेटियाँ आकर बाप को अन्तिम विदाई कर गईं । बेटा नही आया और एक दिन बाबा चिरनिद्रा में चले गए । कुछा समय बाद उनका बक्सा खोलकर देखा गया , उसमें कुछा सरकारी कागज , दो तमगे , एक सर्टिफिकेट , एक बीडी का बण्डल , थोडी सी हुक्के की तम्बाकू यही उनकी जमा पूँजी थी । दादी अब निरी अकेली रह गई , उन्हें लगता बाबा ही तो थे जिनके कारन वे यहाँ थीं । लेकिन धीरे -धीरे कुछ सामान्य हो गईं । पेंशन के कागज दादी के नाम से बनते ही नाती पन्तियों ने आकर दादी को घेर लिया । बेटा भी घर आ गया कियोंकि अब रिटायर हो चुका था । घर भी बनवा लिया गया , दादी बड़े मजे से जीवन गुजार रही थीं । उम्र तो बीत ही रही थी , इस बार की बारिश में दादी बीमार पड़ गईं । कुछ दिनों तक माँ के पास आकर दवा ली गई , अब बिस्तर में जा गिरी दादी को घर वालों ने भी नकार दिया , माँ उनसे मिलने चली गईं तब , मेरे लिए जाने कितनी दुआएं उनके दिल से निकलीं , माँ से जाने क्या -क्या रामायण , महाभारत की कथा सी बोलती रहीं । सुबह माँ को पता चला दादी नहीं रहीं । एक ऐसा खालीपन हम सबमें समां गया कि हमारा पीछे का दरवाजा भी बेकार हो गया , माँ ने बड़ा सा ताला लगा दिया । बढ़ई परिवार में रहने वाली दादी से कैसा अटूट रिश्ता था जो आज चिरस्मृति में बदल गया है । मानवीय रिश्तों का खोखलापन , संवेदनशून्यता और अपने रिश्तों पर प्रश्नचिह्न लगाती पुरबिनी दादी ऐसे रिश्तों के बीच अपनी बानी रहीं जहाँ उनका कोई अपना न था । उनके लोग लालची बन गए । परायों के बीच अमर हो गईं पुरबिनी दादी । रेनू ....... &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-2121834184466327723?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/2121834184466327723/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=2121834184466327723' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/2121834184466327723'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/2121834184466327723'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/01/blog-post_22.html' title=''/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SXhDqqfLLsI/AAAAAAAAATA/2SAV8cqZCaY/s72-c/baba.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-6674923828666373511</id><published>2009-01-14T03:16:00.000-08:00</published><updated>2009-01-14T03:44:16.073-08:00</updated><title type='text'>रिश्तों के नासूर</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SW3PY6HQuAI/AAAAAAAAARs/ztcqh-pE7Xc/s1600-h/Pratiksha2-W.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291113164053723138" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 196px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SW3PY6HQuAI/AAAAAAAAARs/ztcqh-pE7Xc/s200/Pratiksha2-W.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;गुनी उठ जा , तुझे कॉलेज जाने मैं देर होगी , कितनी बार कहा है किअलार्म लगा लिया करो पर सुनती ही नही । अब मैं , ऊपर नीचे बार -बार नही आ जा सकती , ललिता लगातार बोलती जा रही है । उधर चूल्हे पर चाय बनने रख दी है , लकडी गीली है , छोर से पानी टपक रहा है । ललिता तुम !! धीरज राखो , मैं उसे जगा दूंगा , सुबह से बिटिया के पीछे पड़ी हो , न चाय पिलाई न पानी पूछा , अरे !! आप क्या बात करते हो बिहारी जी के मन्दिर कीआरती हो रही है , और बिटिया बिस्तर पर पड़ी है । यह कोई एक घर की कहानी नही है , हजारों घरों मैं सुबह से यही सब चलता है । कहीं पानी की खींचा तान होती है , कहीं दैनिक क्रिया के लिए लम्बी लाइन मैं खड़े होना पड़ता है । शहर मैं जाकर पढ़ाई करना कोई आसान काम नही है । गुनी को सुबह दिल्ली तक भागना , रात को लौट कर आना , प्रतिदिन यही करना पड़ता है । ललिता कई बार कह चुकी है बेटा !! दीना से बात करले , एक साल उसके पास पढ़ले , तुहारे बाबा से कहूं बात करें , नही माँ ! मैं सब देख लुंगी , आज शाम से ही पानी बरस रहा है , दोनो ही बेटी के लिए चिंतित हैं , गुनी का सारा समय आने जाने मैं निकल जाता है , दीना से बात करो , हाँ , कल एक बोरा गेहूं भिजवा देता हूँ , बहु तो अच्छी है , सब सभाल लेगी । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मन्दिर तक जाना मुश्किल हो जाता है , गलियों मैं कीचड़ हो जाता है , मुझे सुबह उठा देना , इतना कहकर बाबा सो गए । दूसरे दिन बाबा दीना के पास चले गए , अरे !चाचा , कैसी बात करते हो , गुनी कोई पराई है ? आपने कैसे सोचा कि मैं ,अपने पास रखने को मन कर सकता हूँ । मुझे याद है जब हम गाँव आते थे , छोटी सी गुनी इधर - उधर फुदकती रहती थी । दिल्ली आए ही मुझे सात साल हो गए । आप चिंता मत करो चाचा ! मैं आकर ले आऊंगा , अशोक कहाँ है ? विशाखापत्तनम मैं है अभी , बहुत कम आ पाता है , चाचा एक बार गाँव के तालाब मैं मुझे तैराकी सिखाने ले गया था , कहता था - भइया भैंस पर मैं बैठ जाता हूँ , पानी के अन्दर रहूँगा , आप डरना मत , बस भैंस की पुँछ पकड़कर रखना , छोड़ना मत , अपने दोस्तों को बता दिया कि जब दीना पानी मैं आ जाय तब , भैंस को पानी मैं बिठा देना , मुझे तैरना नही आता था , कीचड से सन जाता था , सारे दोस्त ठहाका मारकर हँसते थे । एक बार तो मेरी जान पर बन गई थी , हाँ , मुझे याद है , गाँव मैं गुड बंटवाया गया था ,पुराने दिन भी क्या दिन थे , चाचा इस बार होली पर सब गाँव मैं इकठ्ठा होंगे , सीमा चाचा के पैर छूने झुकी ही थी , बाबा हजारों आशीर्वाद देते हुए बाहर आ गए । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;गुनी , जबसे दिल्ली आई है , पढ़ाई के लिए समय मिल जाता है । भाभी के साथ रसोई मैंभी समय देती है । दीना रात को देर से लौटता है , शायद दोस्तों के साथ पार्टी करता होगा , सीमा , खाली समय मैं फिल्मी पत्रिका देखती रहती है , दीना , जाने किस बात पर सीमा से उलझ पड़ता है , सीमा और गुनी के कमरे के लिए एक ही दरवाजा है , उसे पता है कि रात मैं दरवाजा बंद नही करना है ।लेकिन गुनी को दीना की झिक -झिक समझ नही आती , कई बार भाभी से पुँछ चुकी है , क्या भइया को उसका आना पसंद नही या और कोई बात है ? सीमा सिर्फ़ आंसू बहाने के अलावा कुछ नही बोलती ।धीरे -धीरे पढ़ाई मैं अवरोध आ रहा है । अचानक रात मैं किसी के सिसकने की आवाज आई , गुनी , उठ बैठती है , भाभी की आवाज है शायद , पर कुछ समझ नही आता , सीमा बाहर छत पर रो रही थी , गुनी उसके पास जाकर बैठ गई , भाभी ! आपके चहरे पर यह निशान कैसा ? सीमा मुंह छिपाकर रोटी है , अगर तुम नही बताओगी तो भइया से बात करुँगी , बोलो क्या बात है ? सीमा अपने को रोक नही पाई और गुनी को सारी बात बता दी । तुम्हारे भइया रोज रात को शराब पीकर आते हैं , हर दिन उन्हें पत्नी नही एक वैश्या चाहिए , घर -परिवार के साथ रहते हुए भी उन्हें अंग्रेजी उन्मुक्तता चाहिए , परिवार की मरियादा मंजूर नही , भाभी , शायद मेरे कारण ऐसा हो रहा है ? क्या पहले भी यही सब चल रहा था , हाँ , रोज - रोज की चिक चिक से परेशान हो गई हूँ , इसीलिए सोचा था तुम आजोगी तब शायद सब ठीक हो जाए ? लेकिन दीना तो कुछ समझते ही नही , भाभी मैं कल ही चली जाउंगी , नही गुनी तुमसे इसका कोई मतलब नही है , मैं , अब तुम्हारे भाई के साथ नही रहना चाहती , मेरे ऊपर हाथ उठाकर , बहुत अपमान किया है , मैं कल माँ के पास चली जाउंगी , तुम यहीं रहो और पढ़ाई करो , आठ साल हो गए सहते हुए , सीमा उठी और अपने कपड़े बैग मैं रखने लगी , गुनी हतप्रभ सी सब देख रही थी , उसे दीना के ऊपर बहुत गुस्सा आ रहा था । गुनी सुबह उठी और कॉलेज आ गई , दीना सो रहा था , डरती हुई घर वापस गई , किचिन का काम संभाला , दीना के लिए भी खाना बनाया और पढ़ाई करने लगी क्योंकि दीना ऑफिस गया था । भाभी के जाने के बाद गुनी परेशां थी , क्या मालूम भाभी से दीना की बात हुई या नही , सात बजे , भाई आ गया सीधा आकार मैं चला गया , गुनी चाय बनाकर ले आई , भाभी से बात की , देख गुनी तू नही जानती इसलिए चुप रह , तुमने भाभी को क्यों मारा ? तुम बहुत ख़राब हो , भाभी को लेकर आओ वरना मैं बाबा से सारी बात बता दूंगी , ठीक है कल बात कर लूँगा , अच्छा अब खाना तो खिला दे , गुनी खाना लगाकर वहीं ले आई , भद्दी सी पत्रिका निकलकर खाना खाने लगा , कभी गुनी को देखता और कभी पत्रिका को , किसी तरह खाने की थाली लेकर गुनी बाहर निकल गई और पढने लगी । भइया आप सो जन कल मेरा टेस्ट है इसलिए अभी पढ़ना है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक राहत भरी सुबह के साथ गुनी कॉलेज चली गई , लौट कर दीना के कमरे की तलाशी ली , हर तरफ़ अश्लील मैगजीन बिखरीं पड़ीं थीं , शराब की बोतलें बिखरी हुईं थीं , सब कुछ ठीक करने के बाद पढने बैठ गई , टेस्ट नही होता तो माँ के पास चली जाती , क्या करे समझ नही पा रही थी ।सीमा से भी कोई बात नही हुई , देर रात दीना भाई घर पधार गए , हलक तक चढाई हुई थी , भइया क्यों इतनी पीते हो ? तुमसे चला नही जाता , शर्म नही आती है ? और खाना लगाकर उसके कमरे मैं रखकर आ गई , गुनी आ तो , सुन मेरी बात , तेरी भाभी को बांहों मैं लो , तो बिदकती है , देख तो लडकियां क्या -क्या करतीं हैं और मुझे पागल कहती है , गुनी इस समय थर -थर काँप रही थी , भइया सुबह बात करेंगे और अपने बिस्तर पर आकर गिर पड़ी , सीमा की तकलीफ उसके सामने घूमने लगी , कितना दुष्ट है भाई । गुनी अभी सोने का प्रयास कर ही रही थी कि उसकी पीठ पर गरम हथेलियों की सरसराहट दौड़ गई , डर कर उछल गई , सीधी होकर बैठना चाह रही थी कि दीना उसके ऊपर झुक गया और दबाने का प्रयास करने लगा , गुनी को साँस लेने मैं मुश्किल हो रही थी ,&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;चीख भी नही पा रही थी , बाहर झमाझम बारिश हो रही थी , कोई कैसे सुन पता उसकी आवाज ?भाई जैसे पवित्र रिश्ते को दीना बूँद -बूँद बहा रहा था । गुनी का अपनापन एक दरिन्दे के हाथों स्वाहा हो रहा था । रिश्ते का खोखलापन रिस रहा था , बिस्तर पर बेहोश पड़ी गुनी , छत-बिछत लाश जैसी लग रही थी । साबुन के पानी के साथ गुनी अपने आंसू भी बहती रही , इस स्याह रात मैं न गुनी के बाबा आ सके , और न परमात्मा ही । सोच रही थी घर के पीछे से जाने वाली ट्रेन के नीचे लेट जायेगी , बाबा को क्या मुंह दिखायेगी ? पढ़ाई करने आई थी , यहाँ अपने ही भरोसे से लुट गई , सीमा की मजबूरियों पर उसे रोना आ रहा था , पराई बेटी , हमारे घर में इतनी यातना झेल रही है , माँ को क्या कहूँगी ? इसी उधेड़ बुन में कॉलेज के लिए निकल गई । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;आज सुबह से कविता को खोज रही हूँ मिलती नही है , तभी पता चला मैडम ! चाय वाले से झगड़ रहीं है । गुनी उसे पकड़ कर एक पेड के नीचे एकांत में ले गई , वहां साडी आपबीती उसे सुना दी , बता दिया की यदि रात को मर जाऊँ तो बाबा को बता देना कि पढ़ नही पा रही थी । बोल देना में ग़लत नही हूँ । कविता सुकर सन्ना रह गई , गुनी तुम इतनी हिम्मत वाली होकर भी ऐसी बातें करती हो , देखो , ये मरने -मरने का नाटक बंद करो और मेरे घर चलो । अभी एक माह की बात है मेरे साथ रहकर परीक्षा देना समझी !, ओए उसी समय घर से सामान लेकर गुनी कविता के पास आ गई । दो दिन तक , डरी सहमी सी रहने के बाद माँ के पास चली गई , माँ को सारी बात बता दी , माँ का कलेजा फट गया , बिलख पड़ी , मुझे क्या पता था , में ही बार -बार कह रही थी कि गुनी को दीना के पास भेज दो पढ़ लेगी । हाय ! अब क्या करुँ ? बाबा को बताया तो , अभी गोली चल जाएँगी , मर जाएगा दीना , उसकी बिधवा सीमा बेचारी कैसे जियेगी , बेटा !! अब जो होना था हो ,गया अपने सीने में छुपा कर रख इस राज को । एक महिना कविता के साथ निकाल ले , उसका बड़ा उपकार होगा हमारे ऊपर । औरत अपने वजूद के बिखरने के बाद भी घर -परिवार , रिश्ते , और अपनों को टूटने नही देना चाहती , अस्मिता लुटाने की तीस जीवन भर माँ को सालती रही , उसे लगा जैसे बेटी नही वह ख़ुद बेआबरू हो रही थी । रिश्तों की आग में दहकती रही जीवन भर , एक नासूर से उसके दिल से चिपक गए थे । बेटी , को ब्याह दिया गया खुश है , पर माँ , सुलगती रहती है इन दोगले रिश्तों के बीच , जाने कब , माँ मुक्त हो पायेगी इस पीड़ा से । रेनू शर्मा .....&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-6674923828666373511?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/6674923828666373511/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=6674923828666373511' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/6674923828666373511'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/6674923828666373511'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/01/blog-post_14.html' title='रिश्तों के नासूर'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SW3PY6HQuAI/AAAAAAAAARs/ztcqh-pE7Xc/s72-c/Pratiksha2-W.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-5113538730567841104</id><published>2009-01-04T01:08:00.000-08:00</published><updated>2009-01-09T01:27:27.401-08:00</updated><title type='text'>दोस्ती का कमाल</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SWcPfYltu6I/AAAAAAAAARM/lc2aP15we3U/s1600-h/DSC02299.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5289213319220935586" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SWcPfYltu6I/AAAAAAAAARM/lc2aP15we3U/s200/DSC02299.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;वन विहार मैं घने जंगल के बीच , एक बरगद के विशाल पेड पर चुनमुन चिडिया अपने बच्चों के साथ रहती थी । पास के पेडों पर और भी बहुत सारे जानवर रहते थे । सभी एक दूसरे का ख्याल रखते थे , शाम को जब चुनमुन लौट कर आ जाती सारे बच्चे खेलने निकल जाते थे , देर तक सब लोग मस्ती करते रहते । अचानक एक दिन चुनमुन ने देखा , वृक्ष की जड़ के पास एक काला नाग आकर रहने लगा है , सभी लोग चिंतित हो गए , शाम को सभा बुलाई गई । चिडिया हीरा को रखवाली करने का जिम्मा दिया गया । &lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक दिन सभी ने विचार किया &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;हम अपना घर बदल लें , तब ठीक रहेगा । तभी चुनमुन ने कहा - घर बदल कर हमारी समस्या का हल नही निकल सकता , हमें नाग राज से बात करनी चाहिए । सभी को चुनमुन कि बात भा गई , मुखिया होने के नाते मोटी ने कहा मैं , बात करूँगा । &lt;/div&gt;&lt;div&gt;दूसरे दिन सब लोग एक साथ नाग के पास गए और नम्रता पूर्वक कहा - नाग राज आप इस स्थान से कहीं और जाकर रहने लगें , हमारे बच्चे खेल नही पाते हैं । नाग ने जोर से फुंफकार &lt;span class=""&gt;मारी , &lt;/span&gt;जाओ ,यहाँ से , इस जगह पर मेरा हक़ है , भागो नही तो , तुम्हारे बच्चे जिन्दा नही रह पाएंगे । सब लोग डर गए , तभी हीरा ने कहा - अब हम लोगों को कुछ और उपाय करना चाहिए , क्यों न हम रामू &lt;span class=""&gt;नेवले &lt;/span&gt;के पास चलें , हाँ , यह सही रहेगा । चुनमुन तुम जाकर रामू से मिलो , हम बच्चों की सुरक्षा करेंगे । &lt;/div&gt;&lt;div&gt;दूसरे दिन चुनमुन अपने बचपन के दोस्त रामू की खोज पर निकल गई , रास्ते भर सबसे पूछती रही , किसी ने रामू को देखा है , तभी जंगल के उस पार , एक पीपल के पेड के नीचे रामू का घर दिखाई दे गया , साथ मैं गिलहरी भी चल रही थी , चुनमुन को देखते ही , रामू खुश हो गया , आने का कारन पूछा , उसे नाग पर बड़ा क्रोध आया , तुम चिंता मत करो , चुन्नी ! मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ , उसकी बुद्धि ख़राब हो गई है । &lt;/div&gt;&lt;div&gt;रामू ने आते ही पहले सभी लोगों से बात की , हीरा , &lt;span class=""&gt;मोती, &lt;/span&gt;रीबी सब एक स्थान पर जमा हो गए । सब लोग एक साथ नाग के बिल के &lt;span class=""&gt;बाहर &lt;/span&gt;आकर शोर मचाने लगे , तभी नाग बाहर आ गया , क्यों , शोर हो रहा है ? तब रामू ने कहा - तुम यहाँ से चले जाओ , तुम कौन होते हो मुझे भगाने वाले ? अरे !! जहरीले नाग !! प्यार से सुनले , वरना तेरा बुरा हाल हो जाएगा , नाग ने जोर से फुंफकार मारी , &lt;span class=""&gt;नेवला &lt;/span&gt;सतर्क था , उसने फुर्ती से उसकी गर्दन पर वार किया , सब लोग पीछे हट गए । &lt;/div&gt;&lt;div&gt;नेवला क्रोध से तमतमा गया , अब बोलो जाते हो या नही , अरे !! भाई छोडो , मैं चला जाऊंगा पर एक बात का ध्यान रखना यदि मुझे किसी ने तंग किया तो परिवार सहित मुरब्बा बना दूंगा । अरे !! जा विषधर !! तुझे छोड़ दिया । अब पलट कर मत आना । नाग , डर कर जंगल के रास्ते कहीं गायब हो गया । सब लोग खुशी से झूम गए । नेवले को बधाई देने लगे । चुनमुन ने अपने दोस्त रामू के लिए बहुत स्वादिस्ट भोजन तैयार किया और दोस्ती को हमेशा के लिए कायम रखने के लिए सभी ढेर सारे उपहार दिए । &lt;/div&gt;&lt;div&gt;हमें भी दोस्ती की कद्र करनी चाहिए । बुरे समय मैं दोस्त की सहायता करनी चाहिए । सभी लोगों को मिलजुल कर रहना चाहिए । &lt;/div&gt;रेनू शर्मा .....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-5113538730567841104?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/5113538730567841104/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=5113538730567841104' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/5113538730567841104'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/5113538730567841104'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/01/blog-post_04.html' title='दोस्ती का कमाल'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SWcPfYltu6I/AAAAAAAAARM/lc2aP15we3U/s72-c/DSC02299.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-1314745465836224820</id><published>2009-01-03T23:58:00.000-08:00</published><updated>2009-01-04T01:03:40.899-08:00</updated><title type='text'>नई  सरकार</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SWB54c8oamI/AAAAAAAAAQ8/fqicIdTqnKw/s1600-h/1193594710uk28S8.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5287359973283097186" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 157px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SWB54c8oamI/AAAAAAAAAQ8/fqicIdTqnKw/s200/1193594710uk28S8.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;घने जंगल मैं हजारों जानवर रहा करते थे , कई बरसों से &lt;span class=""&gt;काली &lt;/span&gt;शेर के आधीन रहते हुए उन्हें भरपूर शिकार नही मिल पा रहा था । सभी ने मंत्रणा की &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;हमें &lt;span class=""&gt;नई &lt;/span&gt;सरकार बनानी चाहिए , सब लोग अरावली पर्वत पर महा सम्मलेन के लिए एकत्र हो गए । वहां बारहसिंघे , हिरन ,चीते , गैंडे , बन्दर , गोरिल्ले , खरगोश , हाथी और बहुत सरे पक्षी इधर -उधर उछल रहे थे । मोर पंख फैलाकर अपनी सुन्दरता दिखा रहा था । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सबके बीच आकर काली ने गर्जना &lt;span class=""&gt;की , &lt;/span&gt;किसी बात पर सब चर्चा कर रहे थे , हाथी बोला इस बार मैं कुर्सी पर बैठूँगा , तुम सब मुझे ही वोट देना , मैं , सबसे विशाल हूँ , शक्तिशाली हूँ और बुद्धिमान भी हूँ । तुम सब मेरी पीठ पर बैठ कर सैर भी कर सकते हो , सब लोग खुश हो गए , तालियों से हाथी का स्वागत किया । मैं इन्सान से भी तुम सबको बचा सकता हूँ । हाथी की बात सुनकर सफ़ेद भालू बोला - अरे ! मैं जानता हूँ , इन्सान कितना जालिम हो सकता है , हम जानवरों को गुलाम बनाकर रखते हैं , अपना घर &lt;span class=""&gt;चलाते &lt;/span&gt;हैं पर हमें खाने को भी नही देते । मुझे सरकार चलाने दो , एक मौका देकर देखो । गिलहरियाँ हंसने लगीं , बाज बोला मैं , सरकार चलाने के योग्य हूँ कियोंकि आकाश मैं उड़ते हुए सब पर नज़र रखता हूँ , काली भाई भी नही कर सकते , इतना सुनते ही काली ने जोर से दहाडा , सब भागने लगे ।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;गंभीर गर्जना करते हुए हीरा शेर सामने आया और बोला - देखो भाइयो !! आप लोगों ने काली की सरकार देख ली अब मेरी शरण मैं आ जाओ , क्या समझे , देखो मेरा रूप , यौवन और शक्ति । किसी भी जानवर को भूखा नही सोने दूंगा , पानी के लिए हम मिलकर खड्डे खोद लेंगे , गाय , बकरी , चिडिया सभी ने इसका समर्थन कर दिया । हम सभी एक ही बिरादरी के जानवर हैं इसलिए हम सबको मिलकर ही अपनी रक्षा करनी होगी । सभी ने गाय माता की बात को स्वीकार किया । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;हमारी सलाहकार के रूप मैं हम गाय माता को वोट करते हैं , सभी जानवर खुश हो गए , वोट डालने की क्रिया चालू हो गई , जो हीरा से भय खाते थे सबने वोट डाल दिया , भालू , हाथी बड़े जानवर अभी हीरा की मिन्नत का इंतजार कर रहे थे , ऊँचे मंच पर जाकर हीरा ने सबका शुक्रिया अदा किया , जोरदार तालियों से हीरा का नई सरकार के लिए चयन कर लिया गया । हीरा ने हाथी को बुला कर कहा - आप हमारे महा मंत्री हैं , सभी लोग आपकी आज्ञा लेकर ही कार्य करेंगे , भालू मास्टर जी ! आप हमारे रक्षा मंत्री हैं , सभी छोटे जानवर आपके साथ मिलकर कार्य करेंगे , सबने तालियों से स्वागत किया । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बन्दर मामा को जंगली सुरक्षा का अधिकारी नियुक्त किया गया , काली भाई &lt;span class=""&gt;को &lt;/span&gt;विरोधी पार्टी का जिम्मा सौपा गया । इस तरह सभी को कुछ न कुछ काम दे दिया गया । पूरा जंगल तालियों की गडगडाहट से गूँज रहा था , सभी लोग खुश थे , आज तो जश्न की रात थी , हीरा के राजा बनते ही , सारे जानवर उसकी सेवा मैं आ गए , नई सरकार का गठन होते ही सब लोग फुर्ती मैं आ गए । बच्चों को स्वादिष्ट , नरम शिकार खिलाया गया । सभी ने जम कर भोजन किया और दुसरे दिन तक के लिए सभी आजाद होकर मस्ती करने लगे । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;हमें भी इन जानवरों से सबक लेना चाहिए , एकता मैं ही अस्तित्व कायम रहता है । &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-1314745465836224820?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/1314745465836224820/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=1314745465836224820' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/1314745465836224820'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/1314745465836224820'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/01/blog-post_03.html' title='नई  सरकार'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SWB54c8oamI/AAAAAAAAAQ8/fqicIdTqnKw/s72-c/1193594710uk28S8.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-5225269806128145980</id><published>2009-01-03T23:53:00.000-08:00</published><updated>2009-01-03T23:57:03.739-08:00</updated><title type='text'>मैं आजाद हूँ</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SWBrnahvXEI/AAAAAAAAAQ0/B0YZkTTYyEA/s1600-h/indian-girl-flowers.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5287344287412870210" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 143px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SWBrnahvXEI/AAAAAAAAAQ0/B0YZkTTYyEA/s200/indian-girl-flowers.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;युगों से स्त्री ऐसे चोराहे पर खड़ी है जहाँ से , कौन सा रास्ता उसके वजूद के लिए मुड़ता है कहना मुश्किल है ।अपनी अशिक्षा मिटने के लिए बी .ऐ .पास किया कोई कह नही सकता पढ़ी - लिखी नही थी । अज्ञान को मिटाने के लिए पूजा -पाठ , धर्म -कर्म न जाने कितने व्रत -उपवास किए , नौ दिन तक निर्जला माता के सामने प्रायश्चित भी किया , पर कोई समझ नही पाया कि मैं जानती हूँ कि ईश्वर एक है , हम सब उसकी संतान हैं , हमारे कर्मों पर ही संसार की दंड प्रक्रिया निर्भर है और कर्म फल के अनुसार ही जन्म भोग रही हूँ , मुझे पक्का विश्वास है शायद इसीलिए नारी जन्म लिया , कागजी धनवान परिवार मैं , तीसरी बार विवाह कर संतान जोड़ने वाले पिता की पांचवी बेटी के रूप मैं जन्म पा गई । जाने कितने जन्मों की सजा एक साथ पा रही हूँ ।ऐसा भी नही था कि मुझे बोलने नही दिया गया , या लिंग भेद भाव की शिकार हुई लेकिन जाने क्यों , हमारी परम्परा , संस्कृति बेटी को दोयम दर्जे की जिंदगी जीने को मजबूर करती है । सोचती थी शादी के बाद पति का घर मेरा अस्तित्व स्वीकार करेगा , मुझे मेरा होने का अहसास कराएगा , नन्हे बच्चे मां कहकर बुलाएँगे तब सब भूल कर आसमान मैं उड़ जाउंगी , पति हर पल मेरी साँस के साथ जीयेगा , मेरी साँस के साथ मिट जाएगा , लोग मेरी खुश हाल जिन्दगी से ईर्ष्या करेंगे , तब मैं उन्हें बताउंगी देखो इस तरह जीया जाता है । कितना खुश होती थी सोचकर । मेरी खुशियाँ सिर्फ़ सपनों तक ही सीमित रह गई , रात ढलते ही जिन्दगी की भाग दौड़ मुझे अधमरा कर देती थी । मेरे विवाह का जाने कैसा योग था , एक गरीब पंडित जो शास्त्रों का तुच्छ ज्ञाता था , संस्कृत मध्यमा तक शिक्षित , कथा -प्रवचनों , देवी -देवताओं की आराधना , मन्दिर , देवालय , शिवालय की साफ़ सफाई , व्यवस्था प्रबंध कर ही घर का खर्च निकाल पता था । ऐसा भी नही था कि पिता अच्छा वर नही देख सकते थे या विवाह का खर्च वहां नही कर सकते थे , जाने क्यों , जब विवाह योग बना तब तक मेरी उम्र यौवन पार कर गई थी , तो जो सामने पीड़ित सा मिल गया , बेटी सँभालने तैयार हो गया उसी को बेटी ब्याह दी गई । पंडित ने सोचा होगा , धनवान परिवार है ,जीवन नैया तो दान -दक्षिणा से ही पार लग जायेगी लेकिन हर सोचा हुआ नही होता । पंडित के गाँव चली गई , रोज दक्षिणा से पेट भरने वाला परिवार भाई -भाभी द्वारा निर्वासित कर दिया गया । बेल पर छूटे कैदी सी , सुबह की किरण के साथ काम करना शुरू करती रात को कोठरी मैं ओंधे मुह गिर पड़ती , यही दिनचर्या बन गई थी । किसी तरह पति को समझा पाई और शहर आ गई । शहर की रौशनी अधिक दिनों तक मास्टरी के काम मैं उजाला नही फैला सकी । फ़िर पंडिताई शुरू की गई , परन्तु वृन्दावन के पंडों ने उसकी दाल नही गलने दी । पिता के घर शरण ली , उनके दरवार मैं गुहार लगा दी कि आपने वडा किया था नौकरी और घर देने का , तो अब हमें जरूरत है दे दीजिये । हर पिता की तरह वह तैयार थे पर , सौतेले भाई -बहिन को मुझसे जायदा दौलत का मोह था । मुझे धूल के हवाले कर भाई सड़कों पर मुझे घसीटता रहा , मान -अपमान का सरे आम बाजार भाव होता रहा , लोग तमाशा देखते रहे , बड़े घरों के लोग कैसा तांडव करते हैं यह सबने दिखा दिया । सारे रिश्ते भूल कर मैं दर -दर भटकती रही । ऐसी जगह तलाशती रही जहाँ काम मिले , घर मिले , रोटी मिले । जिन भाई -बहिनों के साथ मैंने चालीस बरस तक एक थाली मैं खाना खाया , एक बिस्तर पर कुत्ते के बच्चों की तरह सो कर गुजारे वही आज मुझे बेदखल कर किनारा कर गए । चाहती तो पैतृक संपत्ति पर अधिकार जाता सकती थी पर कानून के लिए भी तो धन चाहिए । मैं , माता -पिता से रोटी का हक़ भी नही पा सकी । बचपन मैं बड़ी शरारती थी । कभी पिता से कुछ नही माँगा , विवाह मैं देर हुई तब भी नहीं कहा कि आप , कुछ करते क्यो नहीं , रोटी कपड़े के अलावा कोई जरूरत ही नही थी , बस कभी -कभी किताबें पड़ती थी ,माँ जब गिर गई थीं , तब दिन रत उनके बिस्तर से लगी रहती थी । आज किन गलियों मैं भटक रही हूँ किसी को परवाह नहीं । कई बरसों तक पंडित भी प्रयास करता रहा शायद सब ठीक हो जाएगा , लेकिन उसने भी मान लिया कि दुनिया के मेले मैं हम दोनो को बंजारों कि तरह भटकना पड़ेगा । व्रत -उपवास , निराहार और सूखी रोटी खाकर दिन कटते गए । जाने कितनी रातें फांका मैं कट गए , कभी लगता मुझे कोई ढूँढ ले और कह दे कि घर चलो ।माँ , मुझे आवाज लगायेगी , पर किसी ने कभी नही पुकारा । पता चला , पिता नही रहे , तब बेशर्मी का परदा चढाये घर गई , ऐसा लगा जैसे अनजानों के बीच आई हूँ , किसी ने बात नही की , किसी ने नही पूछा कहाँ रह रही हूँ या क्या खा रही हूँ । सभी को खुली , खाली आंखों से देख रही थी , कहीं एक बूँद प्यार नही दिखा , पिता से बेटी होने का हक़ जो मांग बैठी थी । अपने खून के लिए खून के आंसू बहाकर खून का पानी बनते देख , मैं , पूरी तरह रीती होकर वापस आ गई । सपनों मैं जीवन की रंगीनियाँ तलाशने वाली मैं , अब सपनों से भी डरने लगी । पंडित अपनी भडांस मेरे सूखे , टूटे जिस्म पर निकलता था , कभी घर से निकल देता , फी वापस ले आता , मैं , वृन्दावन की गलियों मैं मुंह ढक कर भीख मांगने लगी । कभी उन बदनसीब औरतों पर रहम खाती थी कि उनके घर वाले कैसे हैं जो उन्हें भटकने के लिए छोड़ देते हैं । अब मैं भी , समझ गई हूँ , बस जिस्म फरोशी नही कर सकती , क्योंकि संस्कार आत्म हत्या की इजाजत तो देते हैं पर कुकर्म की नही । भीख मांग सकती हूँ पर आत्म हत्या भी नही कर सकती क्योंकि सुना है की आत्मघात करने वालों की मुक्ति नही होती , इस जीवन का कष्ट भोग लेती हूँ शायद ईश्वर सहन शीलता का फल भी देगा ही । शरीर भी अब काम नही करता , खांसी बंद नही होती , बुखार भी नही उतरता , फ़िर भी पंडित के साथ लगी रहती हूँ । बचपन की एक सहेली से बात हो जाती है , चार दिन से बिस्तर से उठ नही पाई , डॉक्टर ने पंडित को बता दिया है की पंडिताइन को आखिरी स्टेज की टी .बी है । कभी भी विदा हो सकती है । पंडित घबरा गया है , घर पर ही रहता है । पैसा नही तो दवा नही , पंडित इधर -उधर से मांग लेता है । पचास बरस मैं ही सौ बरस जी ली । पंडित !! अच्छा हुआ बच्चा नही हुआ , वरना तुम बंध जाते । मुझे फोन करना है , ले चलो । पंडित मुझे ढोकर फोन बूथ तक ले आया , कागज की चिट से पहले एक भाई से बात की फ़िर सहेली को फोन लगा लिया , मीरा ! मैं गिलहरी बोल रही हूँ , जाने क्या -क्या बोलती गई , भूखी शेरनी जब शिकार पर जाती है पूरी उर्जा लगा देती है मैं भी बूँद -बूँद निचुड़ कर बात करती जा रही थी । पंडित मुझे सहारा देकर घर ले आया , जीवन भर की खाली होकर बिस्तर पर लुडक गई । पंडित पगलाया सा आधी रात को पड़ोसियों की सांकल से जूझ रहा था । कभी ग्लूकोस मांगता , कभी गंगाजल । मैं उसका हाथ पकड़कर इस दुनिया से चले जाना चाहती थी , ईश्वर से बोल रही थी मुझे कभी जनम नही देना , बेटी तो कभी नही । शिवरात्रि की घनघोर अँधेरी रात मैं इस दुनिया से मैं आजाद हो गई । बेडियों मैं जकड़ी हुई थी , अब आजाद हूँ। रेनू शर्मा ...&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-5225269806128145980?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/5225269806128145980/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=5225269806128145980' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/5225269806128145980'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/5225269806128145980'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='मैं आजाद हूँ'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SWBrnahvXEI/AAAAAAAAAQ0/B0YZkTTYyEA/s72-c/indian-girl-flowers.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-5328122983880558351</id><published>2008-12-08T05:37:00.000-08:00</published><updated>2008-12-08T07:07:07.512-08:00</updated><title type='text'>मुखौटा</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ST02yxvIsVI/AAAAAAAAAOM/TQ6-XL5KnQI/s1600-h/hanumanji.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5277434584320487762" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 132px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ST02yxvIsVI/AAAAAAAAAOM/TQ6-XL5KnQI/s200/hanumanji.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बादलों का जमाबडा &lt;span class=""&gt;बढ &lt;/span&gt;रहा है , न अभी तक गुडाई हुई है , न बीज - खाद मिल पाया है , किसान परेशान हैं , सरकारी बीज - खाद विभाग के ऑफिस पर अभी तक ताला &lt;span class=""&gt;जड़ा &lt;/span&gt;है । साहब ! कितनी बार शिकायत किये हैं , पर सुनवाई नही है । पैसा - टका होता तो हम ख़ुद ही कर लेते । साब ! पैसा दिवा देते तो अच्छा होता । क्या - क्या समस्या है बता दो , साब ! हमारा गाँव दूसरे गाँव से बीस किलोमीटर दूर है , यहाँ बिजली भी नहीं है , कम से कम कच्ची सड़क बनवा देते तो अच्छा था । साब ! स्कूल तो है पर मास्टर खेत का काम ही करता रहता है , बच्चे का करें स्कूल जाकर , &lt;span class=""&gt;हमार &lt;/span&gt;औरतिया डलिया बना लेत है , चटाई बना लेत है , साब ! कोई शहर मैं खरीद ले तो अच्छा होता । हम कहाँ जाई , &lt;span class=""&gt;केका &lt;/span&gt;बेचीं , कछु समझ नाही पडत है । ठीक है , सब सहूलियत मिल जायेगी । हम सरकार से बात करेंगे । अरे ! गुप्ता जी !! जरा कागज बनाइये । कृषि विभाग को फोन लगाइए , पता करिए यहाँ किसकी जिम्मेदारी है । बनवारी लाल शर्मा चमचमाती लाल बत्ती गाड़ी मैं बैठे और शहर निकल गए । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बड़े अच्छे साब हैं , अब देखना हम सबकी समस्या मिट जाएँगी । अरे ! का अच्छी होई , गाड़ी मैं बैठ्वे वाला क्या जाने हमार दुःख , अरे ! कैसी बात करते हो ? कालू देखना , कल से ही खेत का काम शुरू हो जाएगा । खेत जोते तो आठ दिन हो गए , ऑफिस खुले तब न , तलहटी मैं जुटे खेत पेंटिंग जैसे सुंदर लगतें हैं । कहीं आम के घने बाग़ हैं , कहीं गन्ने की खेती लहरा रही है , कहीं दूर तक मिटटी की खुशबू उठती है , जब दो चार बूंदें आसमान से टपकतीं हैं । कहते तो आदिवासी इलाका हैं , लेकिन सब लोग शहरी खाने के आदि हैं , बनवारी लाल शर्मा आदिवासी कल्याण समिति के अध्यक्ष हैं । दूसरे दिन ही अफसर सलाम ठोकने आने लगे , क्यों भाई !! भानु कहाँ गायब था ? सर ! शहर से आने मैं समय लग जाता है , सड़क नही है , साइकिल से आना पड़ता है , आप लोग क्या चाहतें हैं &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;इनकी सुविधाएँ बंद &lt;span class=""&gt;करदीं &lt;/span&gt;जाय ? सरकार के पास भेजने ,बजट के लिए खाका बनाइये । आनन् - फानन मैं मंत्रणा &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;जाती है , जरुरी कामों की लिस्ट बनती है , रुपयों का गणित बनातें हैं और कागज़ साहब के हवाले कर दिए जातें हैं । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक माह के भीतर शर्मा जी ने कच्चा रास्ता बनवा दिया , पक्की बनने मैं समय लगेगा , उनके आते ही आदिवासी उत्सव आयोजन करने लग जातें हैं , साब का ध्यान रखा जाता है , शर्मा जी ने सरकार तक उनकी पहुँच बना दी है , उनके लिए तो बनवारी लाल ही उनकी सरकार हैं । सरकार अगर हुक्म दे तो छमिया भी उनकी सेवा मैं हाजिर की जा सकती है , लेकिन शर्मा जी इतने तो मर्द हैं &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;अपनी प्रतिष्ठा के लिए किसी नजराने से काम नहीं चलाएंगे । धीरे - धीरे लोग उनकी काबलियत के कायल हो रहें हैं । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;ब्रह्मचारी गाँव का मुखिया है , शर्मा जी के खाने - पीने का ध्यान रखता है , इस बार साब ! दिनों बाद आए ? हाँ , सोच रहा हूँ यहीं घर बना लूँ , यहाँ से जाने को मन ही नही करता । पता &lt;span class=""&gt;लगाना &lt;/span&gt;कोई जगह बेचना चाहे तो , हम ले लेंगे । साब , आप जितना चाहें रहें । अभी हम ठहरे हैं , पुँछ कर बता देना ? जी साब । ब्रहम चारी जनता है उसके अलावा किसी और के पास जमीन है ही नही , मिठुआ के पास बात रख दी गई , क्यों न आम का बाग़ ही साब को दे दिया जाय , पैसा पूरा मिल जाएगा और ऊपर से आम बेचने कि मुसीबत भी मिट जायेगी । साब ने बोला था , बाग़ तो तुम्ही देखोगे मैं तो जमीन का मालिक बनूँगा देखना तो तुम्हे ही है । क्या कहीं , इन्सान इतने बरस से हमारा भला कर रहा है , हमारे लघु उद्योग चल निकलें हैं , मैं हाँ ही बोल दूंगा । बापू पैसा कहाँ रखेगा ? साब बोल रहा था , शहर चल कर बैंक मैं खाता खुलवा देगा , कभी भी पैसा डालो कभी भी निकालो । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;शर्मा जी ने आज शाल कंधे पर डाल रखा है , &lt;span class=""&gt;हाँ , &lt;/span&gt;बात पक्की है ? मुबारक हो , शाम को शहर चलतें हैं , मिठुआ भी आया है , चार लाख रुपये बैंक मैं जमा हो गए , बाग़ के कागज साब के पास छले गए , गाँव आकर ब्रहम कुछ परेशान सा है , हे ! शीतला माता ! अब जो हुआ सो हुआ , माफ़ करना , शर्मा जी का मकसद पूरा हो चुका था , उन्हें प्रकृति कि खूबसूरत वादी मैं एक आशियाने कि जरूरत थी तो मिल गया । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक सैधांतिक इन्सान भी हर पल मुखोटा बदलता रहता है , भोले - भले इन्सान इनके भरम का शिकार हो जातें हैं , जाने कितने साब , आदिवासियों को लूट रहे होंगे । सरकारी काम का हवाला देकर । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रेनू शर्मा .......&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-5328122983880558351?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/5328122983880558351/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=5328122983880558351' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/5328122983880558351'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/5328122983880558351'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='मुखौटा'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/ST02yxvIsVI/AAAAAAAAAOM/TQ6-XL5KnQI/s72-c/hanumanji.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-2962651420710741038</id><published>2008-11-23T02:53:00.000-08:00</published><updated>2008-11-23T04:11:46.682-08:00</updated><title type='text'>नौकरी</title><content type='html'>सुबह  सात बजे से चंपा घर का सारा काम सँभालने लग जाती है , चाय लेकर जगाती है मैडम !! उठो सबेरा हो गया ,तब जाकर आँख खुल पाती है , बच्चों का टिफिन बना दिया , जी ,साहब ने नाश्ता किया जी ,  दोपहर मैं आने का बोल रहे थे , अरे !! एक तो बज रहा है !! जल्दी से बाथरूम मैं घुस जाती है  । चंपा नही होती तब क्या होता ? क्या इतनी देर तक सो पाती ? देर रात तक खाना - पीना चलता रहता है , कभी कोई साहब खाने पर आ गए , कभी कोई । क्या करुँ नींद भी तो पूरी नही हो पाती । सुदर्शन बहुत ध्यान रखते हैं । छोटे  कपड़े  धोकर बाल्टी बाहर सरका दी ,चंपा ले जा , सुखा दे । हर दिन इस तरह ही निकलता जाता है । दो बजे सुदर्शन आतें हैं अभी खाना नही हो पता , बच्चे भी आ जाते हैं , उनका पूरा काम चंपा ही करती है । जब काम जादा लगता है तब , सरजू भी साथ आता है , सरकारी दफ्तर मैं चपरासी है , लेकिन साहब का खाना बनाने आ जाता है ।&lt;br /&gt;काफी समय से सरजू सुबह से आकर काम करता है और चला जाता है , चंपा नही आती ,कभी शाम को आती है , बता रही थी बच्चे अकेले थे , तो साथ ले आती ।  दुसरे दिन से बच्चे भी आने लगे , सुबह के नास्ते से लेकर रात के खाने तक सब यहीं चल रहा  है , कपड़े भी सब बाँट लेतें हैं , चंपा अब कभी - कभी ही आती है , कह रही थी नई नौकरी करने लगी है , घर का खर्च नही चल पाता ,  ठीक  है ,&lt;br /&gt;कुछ समय बाद ... सरजू बिस्तर पर मेरी पायल राखी थी तुमने देखी , हाँ , सामने अलमारी मैं राखी हैं , लापरवाही का खामियाजा अब मिलने लगा है , कुछ गहने तो मिल ही नहीं रहे हैं , कई बार सुदर्शन की जेब से पैसे गायब हो जाते हैं , वो समझते हैं मैं निकाल  लेती  हूँ , कभी पूछते भी नहीं , मन्दिर की दराज मैं पैसे दाल देती हूँ तो वहाँ से भी गायब रहते हैं । कोई भी सामान तभी नही मिलता , जब कोई रिश्तेदार मिलने आता है , चंपा पर शक नही कर पाती ,सरजू तो बोल कर पैसे ले लेता है , चंपा !! रसोई मैं पैसे  रखे थे तुमने लिए क्या ? मैं  क्यो  लेती मैडम !! ऊपर से भगवान देखता , सच बोलती बाई !! मांग लुंगी पर यैसे नही लेगी , अच्छा जा , पूछा ही तो है , क्यों नाटक करती है ।&lt;br /&gt;सरजू बता रहा था , चंपा किसी बंगले पर खाना बनाती है पर वहाँ सिर्फ़ साहब ही रहता ,  कभी - कभी साहब के दोस्त भी खाने को आते , तो साहब जादा पैसा देता , रात को भी वहीं  रुकने को बोलता , मना किया काम छोड़ दे नही मानती , बच्चे अंग्रेजी स्कूल मैं पढने जाते हैं , रोज नई साडी बदलती है , लड़की अंग्रेजी मैं बात करने लगी है , उसे भी अपने साथ काम पर ले जाती है , कह रही थी ,आज पार्टी है साहब ने कहा था बेटी को भी ले आना , मैडम !! मेरा कहा नही सुनती , क्या करुँ&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; दो दिन पहले पाँच हजार रुपये  रखे थे अभी तो कोई मिलने भी नही आया , चंपा ही आई थी , सरजू को बता दिया की चंपा ही चोरी भी कर रही है , सरजू घर गया तो ताला लगा था , साहब के घर की चाबी भी चंपा के पास है लेकिन पीछे वाले दरवाजे की  । दोनो रात भर घर नहीं आईं , पता चला की साहब गर्म मिजाज वाले हैं , चंपा और बेटी उनकी इश्क पोशी के लिए तैयार हो जातीं हैं , सोनू अब , बाहर भी जाने लगी है , साहब ने उसका काम चलवा दिया है , बेटी के मोबाईल पर पूरा सौदा पक्का हो जाता है , दोनो साहब के घर ही रहने लगीं हैं कभी , झुग्गी मैं आतीं हैं हाल चाल जानने के लिए , वे जानती हैं सरजू तो घोडे के पीछे लगी मक्खी सा भिनभिना रहा होगा , पर कोई बात नहीं ।&lt;br /&gt;जिस्म और दौलत का खेल  साहब  की छत्र छाया मैं बेबाकी से चल रहा है , न समाज का भय , न परिवार का , सुबह का अख़बार उठाया तो चंपा का नाम लिखा था , पुलिस की छापा मारी का शिकार हो गईं थीं , जेल भेज दिया गया , क्या यही नई नौकरी करती थी सोनू और चंपा ? सरजू बुत बना खड़ा रह गया , शर्मिंदा था उस पत्नी के लिए जो अपनी ही बेटी को नर्क मैं झोंक चुकी थी , अब तो कोई अपना भी नहीं और न , अपना परिवार रहा , दस बरस बाद पता चला , चंपा तो नही रही पर सोनू ने किसी बुढ्ढे से शादी करली है । जाने कोन सा रास्ता होगा , उसके आगे औरत जाने का साहस नही करे ,  मर्यादाओं का मजाक नही बना पायेगी  ।&lt;br /&gt;रेनू शर्मा ..........&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-2962651420710741038?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/2962651420710741038/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=2962651420710741038' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/2962651420710741038'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/2962651420710741038'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2008/11/blog-post_23.html' title='नौकरी'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-6888867839420594846</id><published>2008-11-18T01:10:00.000-08:00</published><updated>2008-11-18T02:22:15.236-08:00</updated><title type='text'>के .डी .मामा</title><content type='html'>वसुंधरा अब समझने लगी है कि जीवन संघर्ष का ही दूसरा नाम है , जब घुटन बढ जाती है तब कुछ लिखने बैठ जाती है ।  एकाकीपन की छटपटाहट को  निकलने के लिए लिखते समय कभी रो भी लेती है ।मामा जब आते ,आंखों के गीले किनारे उन्हें समझ आ जाते , प्यारा सा समाधान बताते , एक प्याला चाय पीते और चले जाते ।जब भी वसु , परेशां होती , मामा अचानक दरवाजे की घंटी बजा देते ,  हँसते हुए वसु की पीड़ा दूर कर देते , कहने लगते मैं जानता हूँ , तुम समझती हो कि तुम जिन्दगी को समझने लगी हो , लेकिन तुम ग़लत हो , जिन्दगी हर पल बदलती रहती है , तुम किसी इन्सान को भी नही बदल सकती हो , भाग्य और कर्म जब तक  साथ  नहीं होंगे  तुम कुछ भी नहीं कर सकती हो । हर इन्सान स्वयम ही स्वयं को बदल सकता है । वसु , सोचती इन्हें कैसे पता मैं क्या सोच रही हूँ ?जब वसु फुर्सत मैं होती तब पत्रिका लेने मेरे पास आ जाती थी , हम कहानियो और लेखों पर बहस किया करते थे , दूसरे दिन कुछ नया लिखकर मुझे दिखा देती ।  हम फ़िर नई बहस मैं जुट जाते ।&lt;br /&gt;दुबले ,पतले , लंबा कद , मर्दानगी का दंभ लिए , स्वाभिमानी और रिटायर होने के बाद की पीड़ा को छू मंतर करने अपने लोगों के हाथ देख कर भविष्य बताया करते थे , वसु , उनसे झगड़ती थी , आप मुझे कुछ नहीं बताते , पिता की तरह सुनते और घीरे से बताते बेटा चिंता मत कर सब ठीक होगा ।  वसु , अपने आदर्शों पर , संसकारों के मोतियों से बुनी शांत , जिंदगी चाहती थी जहाँ , आध्यात्म हो , एकांत हो , मीठे रिश्ते हों । मामा , उसे निर्लिप्त रहने का उपदेश देकर चले जाते ।&lt;br /&gt;वसु , आज चाय के साथ पकोडे भी बना रही है , तभी घंटी बजती है , मैं खोल दूंगा ,लेखा , आई है । मामा बोल पड़े - क्या तुम जनवरी मैं पैदा हुई हो ? हाँ !! मैं हतप्रभ सी मामा जी को देख रही थी , तुम इस वसु की दोस्त हो ? जो किसी को घास नही डालती , मैं तो , बूडा हो गया हूँ इसलिए चाय पिला देती है , वरना ..... वसु आ गई , मैं भी , अपना भविष्य जानना चाहती थी , लेकिन हिम्मत नही हुई । थोडी देर मस्ती भरी बातें की और वापस आ गई । कुछ समय बाद वसु ने बताया कि मामा , बता रहे थे कि तुम गाड़ी तेज चलाती हो , धीरे चलाया करो ।&lt;br /&gt;आकाश भी मामा के न आने से उदास हो जातें हैं , मामा हमेशा सही रास्ता दिखाते हैं , इस लोक से लेकर परलोक तक , जन्म मृत्यु सब बात चीत का हिस्सा बनता है , मामा  गृहस्थ के साथ ही एकांत मैं जीना चाहते थे , अचानक फोन की घंटी बज गई , वसु अपने पास बुला रही थी , कुछ पत्रिकाएं उठाकर निकल गई , शाम तक मैं नहीं गई ,तब वसु को पता चला मेरी गाड़ी स्लिप हो गई है ,वसु दौड़ती हुई अस्पताल पहुँच गई , मामा जी ने तुम्हें आगाह किया था न , अब हो गया न , घर ले चलो , मैं तुम्हारे पास ही रहूंगी , और मैं  वसु के घर आ गई ।  दो दिन बाद मामा आ गए , भाई !! बिस्तर  किसने बीमार कर दिया है ? जब मामा को पता चला की लेखा है तो , नाराज हो गए , मैं चलता हूँ , कोई मेरी बात नही सुनता , उनकी आदत थी दिल के पास आए लोगों के लिए बेचैन हो जाते थे । मामा जैसे बन्दे से मिलने के बाद किसी रिश्ते या दोस्त की आवश्यकता नही होती , मामा चले गए ।&lt;br /&gt;मामा करीब एक हफ्ते के लिए बाहर गए थे , तभी फोन की घंटी बज गई , हाँ जी , कोन बोल रहें हैं ? नहीं कैसे हो सकता है ? नही , यह सच नही हो सकता ? फोन पटक कर वसु सोफे मैं धंस गई , सर पकड़कर बैठ गई , नही , यह नही हो सकता ? मैं , बिस्तर पर पड़ी परेशां हो गई , वसु , तुम शिखा को फोन करो , लेकिन बात सच निकली , मामा को अटैक आया और वे कहीं दूर चले गए । वसु ,  आकाश के साथ मामा के घर चली गई । रात भर मैं मामा को  खोजती रही , सुबह वसु खाली सी होकर वापस आ गई । मामा की , यादों के साथ दो दिन और जीकर मैं वापस आ गई ।&lt;br /&gt;रेनू शर्मा ......&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-6888867839420594846?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/6888867839420594846/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=6888867839420594846' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/6888867839420594846'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/6888867839420594846'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='के .डी .मामा'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-5859474783515734842</id><published>2008-10-20T03:28:00.000-07:00</published><updated>2008-10-21T09:21:41.813-07:00</updated><title type='text'>बसंत</title><content type='html'>सब &lt;span class=""&gt;ओर &lt;/span&gt;बसंतोत्सव की बहार है , जिसे देखो वो वैलेंटाइन के लिए दीवाना हुआ जा रहा है । पच्चीस रूपये का कार्ड , बीस रूपये का गुलाब लेकर पच्चीस का युवा एसे अकड़ कर चल रहा है मानो दुनिया सिर्फ़ आस -पास सिमट आई हो । वी .आई .पी रोड पर मेरी गाड़ी आज तीस की स्पीड से लुड़क रही है , सोचता हूँ , हमारा भारत देश कितना समृद्ध है यहाँ , हर भाव , विचार , धर्म , जाती , सम्प्रदाय के लोगों के लिए उत्सव , आयोजन हैं , खुशियाँ समेटने के लिए अवसर हैं । आज के युवा बसंत उत्सव को तो जानना ही नहीं चाहते , दोस्ती ओर प्यार का आशय भी उनके लिए अलग है , लड़के लड़की की दोस्ती ही सर्वोपरि मानते है । मैं क्यों इन दकिया नूसी विचारों की गिरफ्त मैं उलझ रहा हूँ आज से पच्चीस बरस पहले मैं भी शगुन के प्यार मैं गिरफ्तार हुआ था , हर पल उसी के बारे मैं सोचा करता था , उसकी हर अदा मेरा ध्यान खींचती थी । उसके गाल पर लटकती बालों की &lt;span class=""&gt;लट &lt;/span&gt;अक्सर मुझे उलझा ल्रेती थी , न चाहते हुए भी कई बार उसे देखा करता था ओर शकुन भी जानती थी &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;मैं उसे घूरता हूँ । तब भी वह मेरे आस - पास ही तितली सी मडराती थी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार हम सैकडों साल पुराने राजाओं का इतिहास गुप्ता सर से सुन रहे थे , उन्हें तो सन , महीने , तारीख तक याद थे , पीछे बैठी शकुन सहेली के साथ खुराफात मैं मशगूल थी , राजा रानी कि तस्वीर बना कर मेरी तरफ़ फैक रही थी , मैं परेशां था वो एसा क्यों कर रही है ? कागज के टुकड़े राकेश जमा कर रहा था , घंटी बजने के बाद क्लास खाली हो गई तब भी कुछ बना रही थी , शरारत करने के बाद भी सबसे जायदा नम्बर उसी के आते थे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी जोर के झटके के साथ गाड़ी रुक गई , एक बच्चा दौड़ कर सड़क पार कर रहा था , मैं भाव शून्य सा हो गया , अरे !१ क्या बरसों पुराणी बातें सोचने लगा । अब तो शकुन जाने कहाँ होगी , बच्चे उसके आगे - पीछे &lt;span class=""&gt;मां , &lt;/span&gt;मां बुलाते होंगे , उसकी घुंघराली लट का जाने क्या हुआ होगा , हाँ एक बार याद है उसकी मां ने गाजर का हलुआ बनाया था , बड़ा सा टिफिन भर कर लाइ थी , हम सारे दोस्त कैंटीन मैं धमा चौकडी कर रहे थे , तभी दन दनाती शकुन शिखा के साथ हमारे पास आ गई , टिफिन रखते हुए मेरे कान मैं हौले से बुदबुदाई मोहन ! जन्मदिन मुबारक हो , इसमें हलुआ है खा लेना ओर फ्र्राटे से चली गई । &lt;span class=""&gt;मैं &lt;/span&gt;हतप्रभ सा उसे देखता रहा अरे !! मुझे तो याद भी नही था , सारे दोस्त उसी दिन से मुझसे चिड गए थे । सारा हलुआ उन मुर्गों ने चाट लिया । उस दिन लगा शायद शकुन मुझे चाहने लगी है , मैं तो घबरा ही गया था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाड़ी खडी करके बड़े तालाब के किनारे आ गया , कितना अच्छा लगता है जब रंग - बिरंगी रौशनियाँ पानी पर अपना प्रतिबिम्ब छोड़तीं हैं । पहाडी पर बने मकान , होटल सब पानी पर तैरते से लगते हैं । हवा भी तो कितनी ठंडी बह रही है , आज सारे दोस्तों को इंडियन कॉफी हॉउस मैं छोड़कर मैं यहाँ अकेला भटक रहा हूँ । मैं अभी तक शादी के बंधन मैं भी नही बाँध पाया , क्यों मां से हर रिश्ते के लिए मना करता रहा , मां नौकरी लगने दो , तब शादी करूँगा । शकुन का चहरा मेरे सामने घूमता था , उसे कभी कह नही पाया , शकुन मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ । कभी एकांत मैं बैठकर बातें नहीं &lt;span class=""&gt;की , &lt;/span&gt;तभी एक बच्चा मेरे सामने आकर पत्थर से टकराकर गिर गया , उसके घुटने मैं चोट लगी थी , मैं विचलित हो गया , जाकर गाड़ी मैं बैठ गया , अनमना सा गाड़ी चलाने लगा , सोच रहा था आगे जाकर चौराहे से वापस मोड़ लूँगा , तभी मेरे कानों किसी की आवाज आई शकुन ! बच्चे का ध्यान नही रख सकती थी ? मैं , अचंभित था , एसा क्यों सुना मेने , शायद इतनी देर से उसी के बारे मैं सोच रहा हूँ इसलिए ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाड़ी घुमाकर मैं वहीं आकर रुक गया , तालाब की तरफ़ देखा तो एक दुबली पतली महिला &lt;span class=""&gt;साडी &lt;/span&gt;मैं लिपटी हुई जाने क्या सोच रही है , एसा लगा कुछ खोज रही है , उल्जा सा चहरा , रिक्तता , आंखों मैं तलाश , निपट अकेले पण का अहसास है । वहीं रुक गया , उसे देखता रहा , कौन है यह ? अकेली क्यों खडी है ? मैं उसके पास जन ही चाहता था बच्चा उसके पास आकर बोला शकुन बुआ ! चलो मां बुला रही है । मैं सुनते हुए भी नही सुन पाया , शकुन बुआ !१ ओर उसकी गाड़ी के पीछे चलने लगा । मैं पागलों की तरह क्या कर रहा हूँ , कोई ओर हुआ तो आज मैं जरूर पिट जाऊंगा , पचास की उम्र मैं यह सब शोभा देता है क्या ? लेकिन क्या करून ? कितने बरसों बाद नाम सुना है , वही होगी पक्के से । लाल बत्ती पर गाड़ी आगे निकल गई अब क्या करून ? एक रेंस्तरा के सामने गाड़ी रुक गई , मेरी जान मैं जान आ गई , दूर गाड़ी रोककर मैं भी अन्दर चला गया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज मैं वही कर रहा हूँ जो पच्चीस सल् पहले करना चाहिए था , शकुन को खो दिया अब उसकी परछाई का पीछा कर रहा हूँ । ठीक सामने एक टेबल के किनारे जाकर बैठ गया , खुबसूरत परी सी , सादगी की मूरत , बिल्कुल शकुन जैसी लगती है लेकिन न लट बिखर रही है , न आँखें कुछ बोलती हैं , बड़ा भी कुछ सिमट गया है , चुपचाप बैठी है , कैसे पता चले , बच्चा बराबर शरारत कर रहा है , मैं घबरा रहा हूँ , जल्दी कॉफी खतम की ओर घर जाने का सोचने लगा , एक पेपर पर अपना फोन नम्बर लिखा बच्चे को देते हुए कहा अपनी बुआ को दे देना । मैं लपक कर वहाँ से निकल गया , पिटने जो डर था । सीधे घर आकर सास ली , दोस्तों को भूल गया ओर बसंतोत्सव को भी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेसुध सा अखबार पड़ रा था अभी रात का एक बज रहा था नींद नहीं आ रही थी , तभी फोन की घंटी बज गई , मैंने डरते हुए फोन उठाया , सोचा आज तो खैर नहीं पुलिस आती होगी , तभी परिचित सी आवाज मेरे कानों मैं रस घोल गई , मैं शकुन !! ओर साँसों की उथल - पुथल कके साथ ही मुझे आंसुओं की सरगम भी सुनाई दे रही थी । देर तक शकुन रोती रही , कुछ कह नही पाई , मैं उसे शांत करता रहा , कल मिलने का कहकर फोन रख दिया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा बसंत आज करीब होकर भी दूर था , मैं भी एक ग्रीटिंग कार्ड ओर गुलाब की तलाश  मैं शर्मा भर भटकता रहा ।&lt;br /&gt;रेनू sharma ......&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-5859474783515734842?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/5859474783515734842/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=5859474783515734842' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/5859474783515734842'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/5859474783515734842'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='बसंत'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-8415886599717251124</id><published>2008-09-02T05:21:00.000-07:00</published><updated>2008-09-02T07:55:04.875-07:00</updated><title type='text'>मां का दाह</title><content type='html'>बदहवास ही भटक रही थी कभी इस गली कभी उस गली , मां ने कहा था भाई सब्जी बेचने निकल गया है , सरकार का भोंपू अभी कह रहा था &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;दो घंटे &lt;span class=""&gt;मै &lt;/span&gt;गांव खहली कर दो वरना गाँव डूब जाएगा , फ़िर कभी किसी को शहर भागने का मौका नही मिलेगा । मां दो दिन से बुखार मै पड़ी है , उठ भी नही पा रही है , कह रही थी महुआ ! तू &lt;span class=""&gt;माही &lt;/span&gt;के साथ शहर निकल जा , मैं यहाँ बनी रहूंगी , एसी क्या आफत आ रही है । अरे !! कितना चढेगा पानी , क्या मार डालेगा ? तो वह भी देख लेंगे । मां &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;आँखें अलग सी चमक रहीं हैं , इसने तो पक्का इरादा कर लिया है यहीं रहेगी , हजार छोड़ कर नही जायेगी । मां ! यहाँ क्या &lt;span class=""&gt;गढा &lt;/span&gt;है ? बता दो , चलो खोद लेते हैं । अरे ! महू !! तुझे क्या बताऊँ , क्या - क्या गढा है यहाँ , तेरे बापू मुझे चौदह बरस की थी तब ब्याह कर लाये थे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब से घर मै आई सब रंगत बदल गई थी , हर दिन घर लीप - पोत कर साफ़ रखती थी , पडोसन झांक कर देखतीं थी , अरे! गोरी , तेरी बहु । बड़ी सुगड है , सास झट बोल पड़ती , का नज़र &lt;span class=""&gt;लगाओगी ? &lt;/span&gt;मेरी सोना को । बड़े भाग से बहु मिली है । तेरे बापू का धंधा भी दिन दूना रात &lt;span class=""&gt;चौगना &lt;/span&gt;बाद रहा था , कच्चे घर से एक कमरा पक्का कर लिया था , सब ठीक चल रहा था &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;तेरे बापू को खांसी ने घेर लिया , डाक्टर , &lt;span class=""&gt;बैद्य ,&lt;/span&gt;हकीम सबका इलाज करवा लिया लेकिन कोई उन्हें बचा न पाया , पाई - पाई इलाज मै चली गई । सास ने मुझे बहार नही जाने दिया , ख़ुद सब्जी का ठेला लगाने लगी और घर चल निकला ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माही अभी छोटा था , स्कूल जाता था इसलिए उसे दादी अपने साथ नही ले गई । अब जब दादी बीमार हो गई तब माही चोरी -चोरी ठेला ले जाने लगा , घर फ़िर चल निकला और एक दिन दादी भी हमें छोड़कर चली गई , बेटा कैसे छोड़ दूँ इस घर को ? हमारे बुजुर्ग तो यहीं बसते हैं । तू जा , माही को तेर कर ला , कह रहा था घंटे भर मै आ जायेगा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी सनकू कह रहा था महुआ , भाग चल , नाले मै पानी ऊपर आ गया है , बस गाँव मै भर जाएगा । हडबडाहट मै माही को बुला रही हूँ , लेकिन कोई किसी कि पुकार नही सुन रहा , इधर मां &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;चिंता है , दावा भी नही मिल पा रही है , सीना धौकनी सा धकधका रहा है , क्या करून ? कहाँ जाऊँ ? अरे ! सोनू , माही को देखा ? हाँ , बड़े मौहल्ले मै गया है ,जा बुला दे कहना मां , बुला रही है । तू मेरी मां को बता देना , हाँ जा । महुआ मां की तरफ़ पलट गई ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लौट कर आई गली मै पानी भर गया था , खाली - &lt;span class=""&gt;खाली &lt;/span&gt;आंखों को दरवाजे पर गडाये मां मुझे देख रही थी , महू ! आ गई , बेटा ! कमरे की छत पर मेरा पलंग जमा दे , पानी का घडा रख दे , आटा रख ले , सब ऊपर पटक दे । क्यों मां , हम हैं न , भाई भी आता होगा , तुम भी हमारे साथ चलोगी वरना सब यहीं रहेंगे । महुआ ! मैं जो बोलती वो कर , छत पर पूरा सामान भर दिया , छप्पर के ऊपर ट्रिपल लगा दिया , मां ! तेरा अंग जल रहा है , मुझे पकड़ ले चल ऊपर ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माही आधी से जयादा सब्जी बेच चुका था , आज तो मुह मांगी कीमत मिल रही थी , माही , मां कह रही थी तुम शहर चले जाओ । &lt;span class=""&gt;अरे ! &lt;/span&gt;मां क्या पागल हुई है ? मां को छोड़ कर हम कहीं नही जायेंगे , दरवाजा बंद कर दे ऊपर चल , पानी &lt;span class=""&gt;बड़ &lt;/span&gt;रहा है , तीन प्राणी पक्के कमरे की छत पर आ गए ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात भर बरसात की सरसराहट और बाढ़ की दहशत मै आँख खुली तो आधा घर पानी मै डूब चुका था , सामान लाश की तरह तैर रहा था । मां , दहक रही थी , , हकीम की दवा ने आज कुछ भी असर नही दिखाया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामने वाली गली से किसी के चीखने की आवाज आ रही थी , मां , बोल पड़ी जा माही , देख तो शायद मौलवी के घर है , मां पानी चढ़ रहा है , अरे ! जवान बेटा होकर एसी बात करता है ? ले डंडा लेजा , ठोकते जन , कनस्तर कमर मै बाँध ले , बेटा बुरे बख्त मैं एक दूसरे का साथ देना चाहिए , माही छत से ही पानी मै कूद गया , पता चला सांप का जोड़ा छप्पर पर आ गया है , बड़ी मुश्किल से मौलवी और उनकी बेगम को अपनी छत पर ले आया , बच्चे बहु सब उन्हें छोड़ कर चले गए ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महुआ ने मोटी रोटी बनाई , आम के आचार से सबने खा लिया , क्या पता कल क्या हो ? माही के सर से मौलवी का हाथ हटता ही नहीं , बार -बार उनकी आँखें भर आती हैं , &lt;span class=""&gt;सलमाबी , &lt;/span&gt;मां के पैर दबाने मै लगी है , माही की मां ! आज आपने बचा लिया वरना हम जाने कहाँ होते ? मां का कलेजा जल रहा था , महुआ चीनी घोल कर पिला दे , तभी दीवार गिरने की आवाज आई , सोना का कच्चा घर पानी के साथ बह गया था , साथ मै सब्जी का ठेला लुड़क रहा था , माही भागा , पर मां ने कहा जाने दे वीरा !! लालच मत कर ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो दिन तक सरकार का कोई नुमाइंदा हमारी ख़बर लेने नही आया , गाँव पानी से लबालब हो गया था , लोग भाग गए , पक्की छतों पर लोग शरण लिए थे , अब सोनू भी हमारी हिफाजत मै है , उसका परिवार भी उसे छोड़ कर चला गया , धीरे - धीरे &lt;span class=""&gt;आटा &lt;/span&gt;पानी सब ख़तम हो रहा है , मौलवी की छत पर आटा रखा है ,माही फ़िर पानी मै कूद गया , सांप का जादा अभी तक छत पर बैठा है , सोनू भी साथ चला गया , बेटा , आजा , क्यों जान मुश्किल मै डालता है । ले महुआ ! मां के लिया अदरक की काली चाय बना दे , मां ने तीन दिन से कुछ नही खाया , सलमाबी मां की खिदमद मै लगी रहतीं हैं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूर - दूर तक कोई मदद नही दिखाई देती , मां , कमजोर होती जा रही है , शाम होते ही पडौसी आवाज लगना शुरू कर देतें हैं , रात के वीराने मै पानी की सरसराहट खौफ पैदा कर देती है , मां आज बोल भी नही पा रही है , महुआ उसके पास बैठी है , पल -पल मै उसकी आँखें रिसने लगतीं हैं , माही कह उठता है , महू ! तेरे कारन ही &lt;span class=""&gt;बाड़ &lt;/span&gt;आ गई , वरना मै अच्छी खासी सब्जी बेच रहा था , मां , मुस्करादेती है , आफत मै भी जिन्दा दिली से बुरा समय बिता दे वही सफल इन्सान है । हर कोई परेशान है न जाने कल क्या होगा ? सोनू अपने घर वालों को गाली देता है &lt;span class=""&gt;साले ! &lt;/span&gt;मुझे छोड़ कर भाग गए , माही भइया ! तू नही होता तो क्या होता ? मैं तो नदिया मै समां गया होता ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी बड़ रहा है , सलमाबी , भय से काँप जाती है , अरे! चाची मै हूँ न , चिंता मत करो , सबको बचा लूँगा , बस मां की चिंता है कोई नाव आ जाए तो , शहर ले चलूँ , अब दावा भी कम नही कर रही है । मां आज , माही का हाथ पकड़े लेती है , एक ही पलंग पर तीन प्राणी सिमटें हैं , नीचे एक बोरे पर वोह तीन दुबके हैं , पाँच दिन से परेशां माही मां के पैरों मै ही सो गया है , महुआ भी मां से लिपटी है , बेबस घड़ी मै भी सबको नींद ने घेर लिया , तभी दबे पाँव काल की देवी आई , सोना को अपने साथ ले गई , किसी को पता भी नही चला ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माही नींद मै मां के पैर दबाने लगा , कुछ हलचल नहीं हुई , घबरा कर उठ गया , मां !! चली गई , महुआ , उठ , दीया जला , पानी ला , क्या भया ? आस -पास के लोग चिल्ला रहे थे , माही हम आ रहे हैं , सलाम बी चीख पड़ी , माही जोर से बोल रहा था कोसी मैया !! तुने मेरी मां को छीन लिया , बार बार मां से लिपटता रहा , महुआ ,सलमाबी से चिपक गई , मौलवी दौनों बच्चों को सीने से लगाये रहे , सुबह का इंतजार करने लगे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्हें तैरना आटा था सब माही की छत पर आ गए , उसे तसल्ली दी । तभी लाल रंग की एक नांव आती दिखाई दी , सबने कहा एक औरत मर गई है , भइया , कुछ रहम करो , कुछ ब्रेड , पानी की थैली , देकर आगे चले गए , कह रहे थे लौट कर आतें हैं , माही ने दो बांस की ठठरी बनाई , मां को उस पर बाँध लिया , धीरे से छत से पानी मै सरका दिया , उसके दोस्त भी माही के साथ हो लिए , धक्का देते हुए नदी की तरफ़ चल दिया , सब लोग चिल्लाते रहे बेटा ! मत जा , पानी का बहाव जादा है , पर मां को जल दाग देना मेरा कर्तव्य है , क्या करू ? मेरी मां चली गई , लहरों से लड़ता वीर माही अपनी मां को कोसी की जल धारा को समर्पित करके ही लौटा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी अभी भी नीचे नही उतरा है , बहन को लेकर जन चाहता है क्योंकि अब किसी और को नदिया मै बहाना नही चाहता , तीन प्राणी उसके संरक्षण मै पल रहे हैं , दस दिन तक छत पर मां का दसवां कर नांव के साथ मौलवी , सलमाबी और सोनू को शहर भेज दिया , महुआ के साथ पानी थमने का इंतजार करने लगा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रेनू शर्मा ....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-8415886599717251124?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/8415886599717251124/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=8415886599717251124' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/8415886599717251124'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/8415886599717251124'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2008/09/blog-post_02.html' title='मां का दाह'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-3447483580754817697</id><published>2008-05-24T06:03:00.000-07:00</published><updated>2008-08-02T01:13:19.628-07:00</updated><title type='text'>धूप-छाव</title><content type='html'>आज अधिक सर्दी के कारण कुहासा छाया हुआ है और सीमा का फोन ही नही आया, जाने उसे पार्टी में जाना है या नही। कितनी बार कहा है जब नही जाना हो , तो मुझे फोन कर दिया करो लेकिन ये सीमा है की लापरवाह हो गई है। तभी फोन घनघना उठा , चलो अच्छा हुआ। उसी का फोन होगा वरना और दो चार बातें सुन लेती मुझसे , रीना बुदबुदाती हुई गई और फोन उठा लिया ,"हेल्लो , सीमा ! यार क्या बात है ? सुनो तो , मैं आ रही हूँ, तुम तैयार रहना , देर ना करना बाहर आने मैं ", और सीमा ने फोन काट दिया।&lt;br /&gt;रीना एक पढी लिखी गृहणी है । करीब दस साल शादी हुए हो गए , बच्चे थोड़े बड़े हो गए तो किट्टी पार्टी मैं जाना शुरू कर दिया है। सीमा उसकी सहेली है दोनों साथ ही हर पार्टी मैं घूमती रहती हैं और सबके बारे मैं अपने विचार आपस मैं बाँट ती रहती हैं।&lt;br /&gt;रीना जल्दी से बेडरूम मैं गई और ड्रेसिंग टेबल पर रखी हुई सौंदर्य प्रसाधन का उपयोग कर बाहर आ गई। बच्चे अभी तीन घंटे बाद स्कूल से लौटेंगे तब तक तो दुनिया भर की मस्ती हो जायेगी। तभी नीचे हार्न सुनाई दिया और खटाखट सीढियां उतरती रीना गाड़ी में जा बैठी। आज मिस्सेज़ गुप्ता के घर पार्टी है , ड्राइवर को रास्ता बताकर दोनों पीछे बैठ कर एक दूसरे से , अच्छी लग रहीं हूँ की नही , ऐसा पक्का करने लगीं। सीमा कुछ मुँह सिकोड़ते हुए बोल पड़ी ,"यार क्या बताऊँ यह पार्टी वाली औरतें जाने क्या-क्या पहनकर आतीं हैं । उनके सामने तो अपन कितने साधारण लगते हैं न ,देखा नही , मिस्सेज़ मिश्रा को हर बार , एक सैट नया पहनकर दिखाती है जैसे इसके बाप का ज्वेलरी शोरूम हो। कितनी इत्रातीं हैं यह लोग, मेरा तो मन ही नही करता इन लोगों से बात करने का लेकिन क्या करूँ ,पार्टी की वजह से बोलना पड़ता है । देखना, मेरी साडी ठीक है ना , अरे! क्या है , तुम बोलती क्यों नही ? क्या साँप सूंघ गया ? रीना अभी उसे ऊपर से नीचे तक देख ही रही थी की बोली - "हाँ , तुम आदिवासी मजदूर जैसी दिख रही हो। क्योंकि हरी साडी के साथ लाल ब्लाउज़ पहन रख्खा है , यह कोई फैशन है ? तुम कुछ भी पहन लेती हो ।" अरे नही, ऐसी बात नही , असल में ब्लाउज़ प्रेस के लिए गया था तो मैंने यह पहन लिया ।&lt;br /&gt;अचानक गाड़ी के ब्रेक के साथ-साथ गई दोनों बाहर निकलीं और गुप्ता जी के घर में घुसती चली गयीं । "नमस्कार ,कोई और नही आया क्या ?" , नही ,आते ही होंगे, आइये बैठिये। दोनों एक कोने में लगे सोफे पर धंस गयीं। हम बैठे हैं आप तैयारी करिये, बस पानी भेज दीजिये । मिस्सेज़ गुप्ता अन्दर चलीं गयीं और आने वाली दस औरतों के लिए चाय-नाश्ते का इंतजाम करने।&lt;br /&gt;सीमा देख ,यह पेंटिंग कितनी अच्छी है न , कितना सुकून मिल रहा है । इससे देख,एक तरफ़ झरना , उची पहाडी , हरे-हरे वृक्ष, ठंडा सा मौसम , कितना रोमांचित है यह तस्वीर। सीमा हाँ , ही कह पायी की तभी इधर देखो , गुप्ता जी का बार। कीमती बोतल सजा रखीं हैं जिन में आधी-आधी सुरा मौजूद भी है चलो , कुछ हंगामा किया जाए और रीना ने उठ कर बीअर की बोतल खोलकर ग्लास बार लिया। सीमा अभी कुछ समझ पाती जल्दी से दो चार घूँट उडेल चुकीं रीना को धक्का देते हुए उसने ग्लास छीन लिया और चुप-चाप बाथरूम में ले जाकर कुल्ला करवा दिया और बची हुई बीअर सींक में उडेल दी और ग्लास वापस टेबल पर सजा दिया। करीब-करीब खींचतीं हुई रीना को बिठाया और कहा ,"तुम पागल हो गई हो, अभी घर जाना है बच्चे आते होंगे और तुम बावली हो रही हो। तबियत तो ठीक है ना ? क्या पति से अनबन हो गई है ?इतनी फटकार खाने के बाद सौरी बोलते हुए दरवाज़े की तरफ उठी थी की चमक - दमक से लबरेज और दस औरतें अन्दर आ धमकी ।&lt;br /&gt;सब एक से एक सुंदर साडियों में लिपटी हुई बैठती गयीं, कोई खिलखिलाकर हंस रही है सिर्फ़ औरो का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए , कोई सिर्फ़ मुस्कराहट से काम चला रही है। मिस्सेज़ गुप्ता सबका स्वागत करती हुई स्थान दे रहीं हैं बैठने के लिए। तभी सबकी तरफ़ मुखातिब हुई रीना को देखकर, अरे ! रीना क्या हुआ ? हमेशा खिलखिलाता चेहरा आज मुरझा क्यों रहा है ?चल, आजा मजे कर , भाड़ में जाने दे पति के टेंशन को। वापस जाकर देख लेना ,अभी पपलू खेल ,बीअर पी और बढिया नाश्ता कर, समझी क्या । मिस्सेज़ कक्कड़ एक साँस में सारी बात कह गयीं और चेहरे पर शिकन तक नही आई । एक गोला बनाया और ताश फैटना शुरू कर लिया । धीरे-धीरे खेल चरम पर चड़ता गया और हार-जीत की जशन चलता रहा । रीना अपने ख्यालों की दुनिया में भटकती रही । कभी ताश खेलते ग्रुप को ध्यान से देखती,कभी उनके श्रृंगार को , कभी मिस्सेज़ गुप्ता की उठा-पटक को और कभी सीमा को देखती जो बारी बारी से सबसे बातें कर रही थी। सीमा बराबर देख रही थी की रीना आज कुछ ठीक नही है और चुप-चाप उसको साथ लेकर बाहर आ गई।बोल, अब क्या है ?तू आज क्यों अपसेट है ? कुछ तो बता ,चल कहीं कॉफी पीते हैं , पास ही एक कॉफी हाउस में जाकर बैठ गयीं। हाँ , अब बोल कुछ नही यार , कल राज से मेरा झगडा हो गया । औरत को सिर्फ़ बिस्तर की चीज़ समझते हैं , उनके लिए इस्त्री का कोई अस्तित्व नही । जाने क्यों, बात -बात पर गुस्सा करने लगे हैं। उन्हें कुछ याद नही रहता की सुबह बच्चों को स्कूल भेजना है । अगर कुछ कहो तो नाराज होने लगते हैं , में दुखी हो गयीं हूँ । पढे -लिखे व्यक्ती हैं फ़िर क्यों ऐसा करतें हैं ?कुछ समझ नही आता। अच्छा ठीक है,चलो कॉफी ले लो । घर चलते हैं, बच्चे आते होंगे और दोनों सखियाँ घर आ गयीं । में चलती हूँ रीना तुमसे कल मिलूंगी , और सीमा चली गई ।&lt;br /&gt;एक अजीब से मुखौटे को पहने रीना बच्चों की मुस्कराहट का जवाब देती रही और घर के काम-काज से निब्रत हो अपनी डायरी लिखने बैठ गई । पार्टी की बातें लिखती रही, तभी चीनू बेटी ने पीठ पे बैठते हुए पूछा माँ क्या लिखती रहती हो । बेटा जब बड़े होगे तो समझ जाओगे की डायरी क्यों लिखतें हैं । बड़ा बेटा थोड़ा समझदार है वो शायद म की पीडा को समझता है । इसीलिए म को हर समय हँसाने की जुगाड़ में लगा रहता है । नए-नए चुटकुले सुनाकर माँ को १४ साल पहले वाली रीना बना देते हैं ,जो मस्त अल्लहड़ हमेशा हसने वाली , सबकी मदद करने वाली ,ज़िंदगी को अपनी तरह चलाने वाली,सबका आदर करने वाली ,भारतीय संस्कृति की अनुचरी है लेकिन, आज वो किटी -पार्टी मे चली जाती है । शायद अपने अतीत को खोजने के लिए&lt;br /&gt;कुछ समय पहले पार्टियों के नाम से नाराज़ होने वाली रीना आज मौका ढूंडती है वहाँ जाने का , अपनी-अपनी शान-शौकत की नुमाइश करने वाली महिलाओं से बड़ी नाराज़गी थी पर आज उनपर तरस आता है क्योंकि उन सब मे उसे रीना और सीमा की कहानी दिखाई देती है उनके हसी पहने चेहरों के पीछे का दर्द उसे महसूस होता है&lt;br /&gt;सीमा से पहली मुलाकात याद करते हुए कहती है , मुझे आज भी याद है सीमा एक शादी समारोह मेी मिली थी ,बेहद निराश , पतली -दुबली सी लड़की,साधारण सा सलवार-सूट पहने,एक कोने मे कुर्सी पर बैठी हुई थी  रीना के पास जाकर बैठने पर उसे कुछ खुशी हुई,जब बात चीत शुरू हुई तो उसके चेहरे की प्रसन्नता अभी बही दिखाई देती है लगातार मिलने का सिलसिला शुरू हो गया,सीमा घर आने लगी  दूसरी बार मिलने पर उसने बता दिया की उसका तलाक़ हो चुका है , पति के किसी दूसरी लड़की से संबंध थे भीख मेी दी गयीं खुशियाँ और दान की ज़िंदगी उसे रास नही आई  आज डिग्री कॉलेज मे सहाध्यापिका है  मस्त रहती है, अपना घर खरीद लिया है  गाड़ी है ,अपने छोटे भाई-बहेनॉ को पढ़ा रही है  रीना से दोस्ती कोई दिखावे की नही है  वे दिलोजान से चाहने वाली,समझने वाली , सही रास्ता दिखाने वाली दोस्त है  रीना भी समझती है की सीमा उसकी हर समस्या का हाल निकाल लेगी&lt;br /&gt;इन्ही विचारों में खोई रीना टीवी चेनल बदल रही थी की फ़ोन बजने लगा  सीमा ही होगी,उसे अब चैन कहाँ,जब तक दूसरे दिन मिलकर मुझे लेक्चर नही दे लेगी उसका खाना नही पचने वाला और फ़ोन उठाते ही दहाड़ उठी ," क्या बात है ?फ़ोन उठाने मे इतनी देर लगती है ? और सूनाओ कैसी हो ,क्या हो रहा था ?", तभी दरवाज़े की घंटी बज़ी शायद राज आए होंगे मे तुमसे बाद मे बात करती हूँ&lt;br /&gt;दरवाज़ा खोलते ही एक मुस्कराता हुआ चेहरा दिखाई दिया, चलो कहीं बाहर चलते हैं , आज बाहर मस्ती करेंगे बच्चों के साथ  रीना समझ ही नही पाई की यह वोही राज आई या कोई और ! तैयार होकर साथ चल पड़ी  हर पल सोचती रही इतना प्यार करने वाले,ध्यान रखने वाले व्यक्ति को क्या हो जाता है ?हरी-भरी ठंडी सड़क पर सरपट दौड़ती हुई कार का शीशा उपर चढ़ते हुए कुछ अपने को गार्मसा अनुभव करने लगी एक पल को ऐसा लगा मानो सर्द रात मेी किसीने लिहाफ़ उधा दिया हो  विचारों की उधेड़ बुन मे खोई रीना समझ ही नही पाई की राज गाड़ी रोक कर लगातार उसे देखते जा रहें  अरे ! आप क्या देख रहे हैं ? बच्चे कहाँ हैं ? वे सामने झूला झूल रहे हैं, तुम क्या सोच रहीं थी? कुछ नही , यूही ज़रा प्राकृति के साथ दूर चली गयी थी अपनी बात छुपाते हुए रीना राज के साथ चल दी ,सोचती रही मे कितनी नेगेटिव सोच रखती हूँ,ज़रा सी हलचल से परेशान हो जाती हूँ,अब ध्यान रखोंगी और धीरे से राज के कंधे पर सिर रख दिया&lt;br /&gt;सीमा सोचती रही की क्या परेशानी है जो रीना इस तरह परेशान हो गयी  दूसरे दिन शाम को सीमा घर आ गयी  कहिए मेडम! क्या हो रहा है ? कुछ नही खीर बना रही थी , राज को बहुत पसंद है ,बच्चे भी खा लेते हैं  अरे वाह! खीर तो मुझे भी पसंद है  हाँ ठीक है , बैठ जाओ , मिल जाएगी दो दिन पहले क्या हो गया था तुम्हे ? अरे छोड़ो सब, सबकुछ ठीक है , जब दिक्कत होगी तब तुझे बता दूँगी , और सीमा को खीर देने लगी  सीमा सोचने लगी, पति-पत्नी का रिश्ता भी कितना धूप-छाव जैसा होता है,कभी नाराज़गी और कभी ढेर सारा प्यार  कुछ समझ नही आता कब स्थिति बदल जाती है सीमा के खिले चेहरे की और देख कर लगा की मुझे चलना चाहिए फिर मिलने का कहते हुए मे चलने को हुई तो मेरे सीने से चिपकते हुए रीना बोली -"शुक्रिया सीमा! तुमने मुझे संभाल लिया वरना क्या होता " ठीक है ,तुम खुश र्म मे यही चाहती हूँ  हम फिर मिलेंगे और प्यार से उसका सिर सहला दिया , बस करो भाई अपने पातिदेव के लिए भी कुछ आलिंगन बचाकर रखो  सीमा शरमाते हुए मुझसे अलग हो गयी  अच्छाजी चलती हूँ ,उसकी आखें देर तक हसती रहीं जीवन एक संगर्श है वहाँ कभी कुशी कभी गुम आते-जाते रहते हैं  हमे परेशानियो मे कभी परेशान नही होना चाहिए  हमेशा सोच समझकर निर्णय लेना चाहिए&lt;br /&gt; रेणु शर्मा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-3447483580754817697?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/3447483580754817697/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=3447483580754817697' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/3447483580754817697'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/372305663424768855/posts/default/3447483580754817697'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/2008/05/blog-post_24.html' title='धूप-छाव'/><author><name>Renu Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07005735117071191731</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_ZbGnZPpROsU/SLJzLLg2G8I/AAAAAAAAADw/eADSfXyGYjQ/S220/mom.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-372305663424768855.post-2792377417774102844</id><published>2008-04-19T03:57:00.000-07:00</published><updated>2008-08-02T01:23:58.604-07:00</updated><title type='text'>बेटी</title><content type='html'>भारतीय समाज में बरसों से बेटी को ऊंचा स्थान प्राप्त है  बेटी को लक्ष्मी ,दुर्गा ,काली, कल्यानी आदि न जाने कितने रूपों में ढाला जता रहा है इसके बावजूद परिवार में बेटी पैदा होने पर एक साँस खींच ली जाती है अरे !बेटी हुई है ? जबकि बेटी पैदा करने वाली स्वयं एक बेटी होती है&lt;br /&gt;बाबूजी को &lt;span class=""&gt;तो &lt;/span&gt;छ: बार &lt;span class=""&gt;साँस &lt;/span&gt;खीचनी पड़ी क्योंकि एक के बाद एक छ: बेटियों &lt;span class=""&gt;से &lt;/span&gt;घर भर गया जबकि सोचते थे &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;चार-पाँच लड़के हों तो ज़मीन जायेदाद संभालेंगे बड़ी मुश्किल से दो &lt;span class=""&gt;सुपुत्र &lt;/span&gt;ही हाथ लग सके बेटियाँ भी यह सब अच्छी तरह समझती थीं &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;हम एक साथ क्यों आ गए ?बड़ी मुश्किल से बड़ी बेटी कि &lt;span class=""&gt;शादी &lt;/span&gt;हो गई बाबूजी सोचने लगे कि अब रास्ता आसान हो गया क्योंकि बड़ी बेटी शादी कि उम्र से थोडी बड़ी हो चली थी  सभी बहनें आपस में बात करतीं अब सब ठीक हो जायेगा&lt;br /&gt;दूसरी बेटी पढाई पूरी करके घर बेठी थी बाबूजी कहीं बाहर निकलने &lt;span class=""&gt;नही &lt;/span&gt;देते &lt;span class=""&gt;थे, &lt;/span&gt;सो कहीं चार पैसे &lt;span class=""&gt;कमाकर &lt;/span&gt;मस्ती की जाए  रोज़ सुबह &lt;span class=""&gt;उठाना,&lt;/span&gt; दैनिक कार्यों से निबटना और चाची के घर दौड़ लगा &lt;span class=""&gt;देना,&lt;/span&gt; शाम तक का समय वहीं &lt;span class=""&gt;उलटे-&lt;/span&gt;सीधे काम करते हुए निकाल देती थीं&lt;br /&gt;हम उम्र होने के &lt;span class=""&gt;कारण &lt;/span&gt;कभी पूछ बैठती कि-"क्यों &lt;span class=""&gt;बकरिया, &lt;/span&gt;तेरे लिए कोई लड़का देखा जा &lt;span class=""&gt;रहा &lt;/span&gt;है &lt;span class=""&gt;या &lt;/span&gt;नही ?" तो , स्पष्ट बता देती -" अरे!! हम तो ऐसी &lt;span class=""&gt;गाय &lt;/span&gt;हैं कि जिस खूंटे से बाँध दो, वहीं बंधी रहेंगी।देख रहे हैं, जाने कब सेट होगा।" तभी, तपाक से मैं बोल पड़ती कि- "गाय नही, बकरी। " क्योंकि फल, कच्ची सब्जी, जो भी खाने &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;चीज़ &lt;/span&gt;हो, सब &lt;span class=""&gt;कच्चा-&lt;/span&gt; पक्का खा जाया करती थी। तबसे हम चिढाने के लिए बकरिया कह देते, लेकिन उसने कभी बुरा नही माना। एक ठंडी साँस लेकर बेचारी हम सबके चेहरे ताकती और भविष्य के सुनेहेरे सपनों की गठरी से एक तिनका जैसा विचार हमारे सामने &lt;span class=""&gt;दाल &lt;/span&gt;देती। देख लेना, मैं तुम सबको अपने पास बुलाउंगी, मिलने आया करुँगी, तुम्हारे बच्चों के लिए गिफ्ट दिया करुँगी और जाने क्या क्या बोलती रहती। हम लोग उसका गर्भिला चेहरा घूरते और हँसने लग जाते।&lt;br /&gt;हम सबके बीच मुनिया इतनी अपनी थी &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;माँ - पापाजी उसके खाने का हिस्सा अलग निकाल कर रखते, कहीं जाना होता तो हमारे कपडे निकाल कर पहन लेती, हमने कभी नही &lt;span class=""&gt;टोका। &lt;/span&gt;कभी जब छ: लड़कियों की स्कूल फीस देनी &lt;span class=""&gt;होती &lt;/span&gt;टैब घर के खर्चे से तंग आकर बाबूजी फीस जमा करने से मन कर देते । तो, मुनिया को दुःख होता और माँ के पास आकर अपनी स्कूल फीस भरने का रोना रोने लगती। माँ जाने कैसी उदार हृदया &lt;span class=""&gt;थीं, &lt;/span&gt;स्वयं का खर्चा चलाना उस ज़माने में भारी पड़ता था , पुराने बक्से की टली में छुपे पैसे को बटोर कर मुनिया की फीस भर &lt;span class=""&gt;देती, &lt;/span&gt;उसे किताबें दिलवा देती। कभी हम कहते -माँ तुम इतना क्यों करती हो। तो कहतीं, ये बेटियाँ हैं, परायी हैं, दूसरे घर चली जाएँगी, एक दिन याद ही &lt;span class=""&gt;करेंगी &lt;/span&gt;की चाची हमारा कितना ध्यान रखतीं &lt;span class=""&gt;थीं, &lt;/span&gt;और अपने काम मैं मशगूल हो जाया करतीं थीं।&lt;br /&gt;मेरी शादी को १० बरस बीत गए लेकिन मुनिया का अभी तक कोई हिल्ला -हिसाब नही बैठ पाया था परिवार की एक शादी में सब मिले तो कुछ एकांत पल मुनिया के साथ बांटने को मिल गए  &lt;span class=""&gt;मिलते &lt;/span&gt;ही गले लग गई और देर तक रोते रही देखो , तुम सब तो अपने घर चली गयीं लेकिन में यहाँ ऐसा समय गुजार रही हूँ जैसे वैधव्य का सूनापन  उसका खाली चेहरा देखकर तरस आता , कभी सोचती -"हम सबने बचपन एकसाथ गुज़ारा है , एक साथ बड़े हो गए, पढे लेकिन यह क्या बात हुई की सबकी शादी हो गई पर मुनिया का रिश्ता नही बन पा रहा है " मन में लहर उठती और मुनिया कहती जाती अगर बेटा होता तो पिता की दौलत का एक हिस्सा पाकर ज़िंदगी बसर कर लेता , लेकिन बेटी होनी की एक सज़ा यह भी है की बाबूजी से कह भी नही सकती की मेरा हिस्सा दे दो , में अपने हिसाब से जी लेती &lt;span class=""&gt;हूँ &lt;/span&gt;यहाँ तो कैद की बुलबुल के समान न उड़ सकती हूँ , न पिंजरे में रहा जाता है  अपने जीते जी कहीं निकलकर बाप-दादा के नाम पर कीचड भी नही लगाना चाहती  ना पूजा -पाठ में मन लगता है , ना घर के काम में ही &lt;span class=""&gt;छोटे &lt;/span&gt;बहनें मुझे रोड़ा समझतीं हैं , कोसती हैं की -"अभागिन हूँ कहीं रिश्ता नही हो पा रहा है" मेरी वजह से वे भी इस घर में पड़ी हैं  अब तू ही बता में क्या करूँ ? मुझसे तो मरा भी नही जाता  देखतीं हूँ &lt;span class=""&gt;इश्वर &lt;/span&gt;कब तक परीक्षा लेगा&lt;br /&gt;फ़िर विवाह वाले महूरत वाले महीने शुरू हुए और एक आस जाग जाती है , शायद इस बार तो रिश्ता बन ही जायेगा लेकिन जाने क्या ग्रह-नक्षत्र हैं की कहीं जोडा बैठ ही नही रहा है  बाबूजी तो कोई कसर नही छोड़ रहे हैं  रोज़ सुबह निकल जातें हैं , &lt;span class=""&gt;रात &lt;/span&gt;को घर में घुसते &lt;span class=""&gt;हैं, &lt;/span&gt;मुझे उनपर भी तरस आ जाता &lt;span class=""&gt;है &lt;/span&gt;ऐसा कहकर मुनिया बाबूजी को साफ बचा ले जाती है  यह है बेटी का प्यार अपने बाप के लिए , जो किसी भी &lt;span class=""&gt;हां &lt;/span&gt;में कभी भी मिटाया नही जा सकता&lt;br /&gt;कई बार मेरी उसकी वार्ता लम्बी-लम्बी चलती , सारी रात हम सोते नही  बिना अवरोध के मुनिया अपने दिल की बातें मेरे ऊपर उदेलती जाती और में निशब्द सी हाँ हूँ करती जाती , कभी गर्दन तक बह आए उसके आंसुओं को पौन्छ्ती और शांत रहने का बोलकर, सब इश्वर पर छोड़ दे कहकर सांत्वना देती &lt;br /&gt;ससुराल वापस आकर में लंबे अरसे तक उन मुलाकातों को विस्मृत नही कर पाती और मुनिया के दुर्भाग्य पर चिंतन में लगी रहती  अभ मेरी दो बेटियाँ हैं, दोनों को मुनिया ने ऐसा प्यार दिया जैसे की उसकी बेटी हैं  माँ के घर जाकर उन्हें मुनिया के पास छोड़कर अपने ज़रूरी काम निबटाने बाज़ार चली जाया &lt;span class=""&gt;करती &lt;/span&gt;थी&lt;br /&gt;कभी जब घर के बरांडे में अकेली बैठी पौधों को निहारातीं हूँ तो लगता ई बेटियाँ भी इन हरे -भरे पौधों से कम नहीं  घर के नीम पर चिडिया के हर साल बनाए जाने वाले घोंसले से बेटी के जीवन का एक सच दिखायी पड़ता रहता &lt;span class=""&gt;है  &lt;/span&gt;अंडे से चूजे फ़िर छोटे-छोटे पंख और एक दिन चिडिया बन जो हवा में उडी तो दुबारा अपना घर बनाने ही खिड़की पर दिखायी &lt;span class=""&gt;पड़ती &lt;/span&gt;है&lt;br /&gt;मुनिया तो मेरी बचपन की सखी रही है , या कहूँ की मेरा बचपन उसके बिना अधूरा है  मुझे याद आता है ,माँ हमे दोपहर में सोने नही देती थी ,&lt;span class=""&gt;कहती-"&lt;/span&gt;तुम बेटी हो एक दिन अपना घर सम्भालोगी तो कढाई , बुनाई किया करो सब काम आयेगा " लेकिन ऊपर अपने कमरे में जाकर में चुपचाप कभी सो जाया करती तो मुनिया चुपके से मेरे सिरहाने कुर्सी खीचकर बैठ जाती , लगातार मुँह देहती रहती  मेरे करवट लेने पर कोई शाष्ट्रीय संगीत का राग छेड़ देती और पूरा होने तक सुनाती रहती, में सोचती मुनिया कितनी स्नेह से पगी माँ बनेगी और उसे छाए बनाने के लिए इशारा कर देती&lt;br /&gt;आज पन्द्रह साल बाद मुनिया से मिली, वही उदासी , वही शिकायतों की गठरी , माँ-बाबूजी के प्रति मन की कटुता , भाई-बहनों से हुई विरक्ति की कहानियां , वही एकाकीपन , घुटन , अनकही बातों की पीड़ा , जाने क्या-क्या बवाल लिए दरवाज़े पर खड़ी मिली  मेरा दिल उसके सामने नतमस्तक हो जाता है, यह है &lt;span class=""&gt;बेटी, &lt;/span&gt;भारतीय बेटी ,दर्द को सहन करने वाली प्रथ्वी जैसी विशाल हृदया बेटी , इश्वर उसके जैसे बेटी सभी को बना दे&lt;br /&gt;"मानवीय रिश्तों की मजबूती भारतीय परिवेश में रची बसी हुई है  &lt;span class=""&gt;पिता-&lt;/span&gt;बेटी का रिश्ता, भाई-बहन का &lt;span class=""&gt;रिश्ता,&lt;/span&gt;सखी का रिश्ता एक जादुई शक्ति से बंधे रहते हैं जिन्हें जीवन पर्यंत विस्मृत नही किया जा सकता  बेटी सबके लिए त्याग और सहन शक्ति की मिसाल बन जाती है  कष्ट सहकर भी बडों के मान को खंडित नही होने देती"&lt;br /&gt; रेणू शर्मा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/372305663424768855-2792377417774102844?l=renuskavitayein.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://renuskavitayein.blogspot.com/feeds/2792377417774102844/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=372305663424768855&amp;postID=2792377417774102844' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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